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गंगा माता की आरती: ॐ जय गंगे माता

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 2 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
काशी के दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती: बड़े दीपदान उठाए पुजारी, घाट पर भीड़ और नदी में नावें
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. पद 1

    ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता। जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥

    हे गंगा माता, आपकी जय हो। जो मनुष्य आपका ध्यान करता है, वह मनचाहा फल पाता है।

  2. पद 2

    चन्द्र-सी ज्योति तुम्हारी, जल निर्मल आता। शरण पड़े जो तेरी, सो नर तर जाता॥

    आपकी ज्योति चंद्रमा जैसी है और आपका जल निर्मल बहता है। जो आपकी शरण में आता है, वह (संसार-सागर से) तर जाता है।

  3. पद 3

    पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता। कृपा दृष्टि हो तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाता॥

    आपने राजा सगर के पुत्रों का उद्धार किया, यह सारा जगत जानता है। आपकी कृपा-दृष्टि तीनों लोकों को सुख देती है।

  4. पद 4

    एक बार जो प्राणी, शरण तेरी आता। यम की त्रास मिटाकर, परमगति पाता॥

    आरती कहती है कि जो प्राणी एक बार भी आपकी शरण में आता है, उसका यम (मृत्यु) का भय मिट जाता है और वह परम गति (मोक्ष) पाता है।

  5. पद 5

    आरती मातु तुम्हारी, जो नर नित गाता। सेवक वही सहज में, मुक्ति को पाता॥

    हे माता, आरती कहती है कि जो मनुष्य आपकी यह आरती रोज़ गाता है, वह सेवक सहज ही मुक्ति पा लेता है।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/ganga-aarti/

संक्षेप में

“ॐ जय गंगे माता” देवी गंगा की सबसे प्रचलित हिंदी आरती है। इसमें गंगा के निर्मल जल, राजा सगर के पुत्रों के उद्धार और शरण में आए लोगों को यम के भय से मुक्त करने की महिमा गाई गई है। यह कार्तिक पूर्णिमा, गंगा दशहरा और गंगा सप्तमी पर, गंगा स्नान के बाद और गंगा तट की आरतियों में गाई जाती है। इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है।

कुछ संस्करणों में शब्द थोड़े अलग मिलते हैं, जैसे टेक में ‘श्री जय गंगे माता’, पद 2 में ‘चंद्र सी जोत तुम्हारी’, पद 3 में ‘कृपा दृष्टि तुम्हारी’, पद 4 में ‘एक ही बार जो तेरी, शरणागति आता’, और पद 5 में ‘आरती मात तुम्हारी, जो जन नित्य गाता। दास वही सहज में, मुक्ति को पाता’। कुछ स्थानों पर आरती ‘हर हर गंगे, जय माँ गंगे’ के जयकारे से शुरू की जाती है। गाते समय पहली पंक्ति (टेक) हर पद के बाद दोहराई जाती है।

आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गंगा आरती कब गाई जाती है?

कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान और दीपदान के समय, ज्येष्ठ शुक्ल दशमी (गंगा दशहरा) और वैशाख शुक्ल सप्तमी (गंगा सप्तमी) पर, और गंगा तट की संध्या आरतियों में।

“पुत्र सगर के तारे” का क्या प्रसंग है?

वाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड) के अनुसार राजा सगर के साठ हज़ार पुत्र कपिल मुनि के क्रोध से भस्म हो गए थे। उनके वंशज भगीरथ की तपस्या से गंगा पृथ्वी पर आईं और उनके जल से उन पुत्रों का उद्धार हुआ।

क्या ‘जय जय भगीरथनन्दिनि’ भी गंगा की आरती है?

‘जय जय भगीरथनन्दिनि’ गोस्वामी तुलसीदास की विनय पत्रिका का गंगा-स्तुति पद है, जिसे कई जगह आरती के रूप में गाया जाता है। ‘ॐ जय गंगे माता’ उससे अलग, सरल हिंदी आरती है।

यह आरती किसने लिखी?

रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है। इसके किसी पद में किसी कवि का नाम (छाप) नहीं आता।

स्रोत

  1. परंपरागत आरती पाठ
  2. सगर-पुत्रों और गंगावतरण की कथा: वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड

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