चालीसातुलसी

तुलसी चालीसा

रचना: परंपरागत

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 5 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंदिर में संध्या आरती: पुजारी के हाथ में पाँच बत्ती वाला पीतल का दीपक, पीछे सजी प्रतिमाएँ और हाथ जोड़े भक्त
चित्र: AI से बनाया गया
PDF डाउनलोड करें

विज्ञापन

  1. दोहा

    श्री तुलसी महारानी, करूँ विनय सिरनाय। जो मम हो संकट विकट, दीजै मात नशाय॥

    हे श्री तुलसी महारानी, मैं सिर झुकाकर विनती करता हूँ। हे माता, मुझ पर जो भी कठिन संकट हो, उसे नष्ट कर दीजिए।

  2. चौपाई 1

    नमो नमो तुलसी महारानी। महिमा अमित न जाय बखानी॥

    हे तुलसी महारानी, आपको बार-बार नमस्कार है। आपकी असीम महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता।

  3. चौपाई 2

    दियो विष्णु तुमको सनमाना। जग में छायो सुयश महाना॥

    भगवान विष्णु ने आपको सम्मान दिया, इसलिए संसार में आपका महान यश फैला है।

  4. चौपाई 3

    विष्णुप्रिया जय जयति भवानि। तिहूँ लोक की हो सुखखानी॥

    हे विष्णुप्रिया भवानी, आपकी जय हो, जय हो। आप तीनों लोकों के सुख की खान हैं।

  5. चौपाई 4

    भगवत पूजा कर जो कोई। बिना तुम्हारे सफल न होई॥

    कोई भी भगवान की पूजा करे, वह आपके बिना सफल (पूरी) नहीं होती। (परंपरा में विष्णु की पूजा में तुलसी-दल आवश्यक माना जाता है।)

  6. चौपाई 5

    जिन घर तव नहिं होय निवासा। उस पर करहिं विष्णु नहिं बासा॥

    चालीसा कहती है कि जिस घर में आपका निवास (तुलसी का पौधा) नहीं होता, वहाँ विष्णु वास नहीं करते।

  7. चौपाई 6

    करे सदा जो तव नित सुमिरन। तेहिके काज होय सब पूरन॥

    जो सदा, प्रतिदिन आपका स्मरण करता है, उसके सब काम पूरे होते हैं।

  8. चौपाई 7

    कातिक मास महात्म तुम्हारा। ताको जानत सब संसारा॥

    कार्तिक मास में आपका विशेष माहात्म्य है, जिसे सारा संसार जानता है।

  9. चौपाई 8

    तव पूजन जो करैं कुँवारी। पावै सुन्दर वर सुकुमारी॥

    चालीसा के अनुसार जो कुँवारी कन्याएँ आपकी पूजा करती हैं, वे सुंदर और सुशील वर पाती हैं।

  10. चौपाई 9

    कर जो पूजा नितप्रति नारी। सुख सम्पत्ति से होय सुखारी॥

    जो स्त्री प्रतिदिन आपकी पूजा करती है, वह सुख और संपत्ति से सुखी रहती है।

  11. चौपाई 10

    वृद्धा नारी करै जो पूजन। मिले भक्ति होवै पुलकित मन॥

    जो वृद्ध स्त्री आपकी पूजा करती है, उसे भक्ति मिलती है और उसका मन आनंद से पुलकित होता है।

  12. चौपाई 11

    श्रद्धा से पूजै जो कोई। भवनिधि से तर जावै सोई॥

    जो कोई श्रद्धा से आपकी पूजा करता है, वह संसार-सागर से पार हो जाता है।

  13. चौपाई 12

    कथा भागवत यज्ञ करावै। तुम बिन नहीं सफलता पावै॥

    कोई भागवत कथा या यज्ञ कराए, आपके बिना वह सफल नहीं होता।

  14. चौपाई 13

    छायो तब प्रताप जगभारी। ध्यावत तुमहिं सकल चितधारी॥

    आपका प्रताप सारे जगत में छाया है। सभी चेतन प्राणी आपका ध्यान करते हैं।

  15. चौपाई 14

    तुम्हीं मात यंत्रन तंत्रन में। सकल काज सिधि होवै क्षण में॥

    हे माता, यंत्रों और तंत्रों (पूजा-विधियों) में भी आप ही हैं; चालीसा कहती है कि आपसे सब काम क्षण भर में सिद्ध होते हैं।

  16. चौपाई 15

    औषधि रूप आप हो माता। सब जग में तव यश विख्याता॥

    हे माता, आप औषधि का रूप हैं; सारे संसार में आपका यश प्रसिद्ध है।

  17. चौपाई 16

    देव रिषी मुनि औ तपधारी। करत सदा तव जय जयकारी॥

    देवता, ऋषि, मुनि और तपस्वी सदा आपकी जय-जयकार करते हैं।

  18. चौपाई 17

    वेद पुरानन तव यश गाया। महिमा अगम पार नहिं पाया॥

    वेदों और पुराणों ने आपका यश गाया है, पर आपकी अथाह महिमा का पार नहीं पाया।

  19. चौपाई 18

    नमो नमो जै जै सुखकारनि। नमो नमो जै दुखनिवारनि॥

    सुख देने वाली माता, आपको नमस्कार, आपकी जय हो। दुख दूर करने वाली, आपको नमस्कार, आपकी जय हो।

  20. चौपाई 19

    नमो नमो सुखसम्पति देनी। नमो नमो अघ काटन छेनी॥

    सुख और संपत्ति देने वाली, आपको नमस्कार। पापों को काटने वाली छेनी, आपको नमस्कार।

  21. चौपाई 20

    नमो नमो भक्तन दुख हरनी। नमो नमो दुष्टन मद छेनी॥

    भक्तों का दुख हरने वाली, आपको नमस्कार। दुष्टों का घमंड काटने वाली, आपको नमस्कार।

  22. चौपाई 21

    नमो नमो भव पार उतारनि। नमो नमो परलोक सुधारनि॥

    संसार-सागर से पार उतारने वाली, आपको नमस्कार। परलोक सुधारने वाली, आपको नमस्कार।

  23. चौपाई 22

    नमो नमो निज भक्त उबारनि। नमो नमो जन काज सँवारनि॥

    अपने भक्तों का उद्धार करने वाली, आपको नमस्कार। लोगों के काम सँवारने वाली, आपको नमस्कार।

  24. चौपाई 23

    नमो नमो जय कुमति नशावनि। नमो नमो सब सुख उपजावनि॥

    बुरी बुद्धि का नाश करने वाली, आपको नमस्कार, आपकी जय हो। सब सुख उपजाने वाली, आपको नमस्कार।

  25. चौपाई 24

    जयति जयति जय तुलसी माई। ध्याऊँ तुमको शीश नवाई॥

    हे तुलसी माता, आपकी जय हो, जय हो। मैं सिर झुकाकर आपका ध्यान करता हूँ।

  26. चौपाई 25

    निजजन जानि मोहि अपनाओ। बिगड़े कारज आप बनाओ॥

    मुझे अपना जन (भक्त) जानकर अपना लीजिए और मेरे बिगड़े काम बना दीजिए।

  27. चौपाई 26

    करूँ विनय मैं मात तुम्हारी। पूरण आशा करहु हमारी॥

    हे माता, मैं आपसे विनती करता हूँ, मेरी आशा पूरी कीजिए।

  28. चौपाई 27

    शरण चरण कर जोरि मनाऊँ। निशदिन तेरे ही गुण गाऊँ॥

    आपके चरणों की शरण में हाथ जोड़कर मैं आपको मनाता हूँ, और दिन-रात आपके ही गुण गाता हूँ।

  29. चौपाई 28

    करहु मात यह अब मोपर दाया। निर्मल होय सकल ममकाया॥

    हे माता, अब मुझ पर यह दया कीजिए कि मेरा पूरा शरीर (और मन) निर्मल हो जाए।

  30. चौपाई 29

    माँगूँ मात यह बर दीजै। सकल मनोरथ पूर्ण कीजै॥

    हे माता, मैं यह वर माँगता हूँ, इसे दीजिए: मेरे सब मनोरथ पूरे कीजिए।

  31. चौपाई 30

    जानूँ नहिं कुछ नेम अचारा। छमहु मात अपराध हमारा॥

    मैं पूजा के नियम और आचार कुछ नहीं जानता। हे माता, मेरे अपराध क्षमा कीजिए।

  32. चौपाई 31

    बारह मास करै जो पूजा। ता सम जग में और न दूजा॥

    जो बारहों महीने आपकी पूजा करता है, उसके समान संसार में दूसरा कोई नहीं।

  33. चौपाई 32

    प्रथमहि गंगाजल मँगवावे। फिर सुन्दर स्नान करावे॥

    (पूजा की विधि:) पहले गंगाजल मँगवाए, फिर (तुलसी को) अच्छी तरह स्नान कराए।

  34. चौपाई 33

    चन्दन अक्षत पुष्प चढ़ावे। धूप दीप नैवेद्य लगावे॥

    चंदन, अक्षत (चावल) और फूल चढ़ाए, और धूप, दीप और नैवेद्य (भोग) अर्पित करे।

  35. चौपाई 34

    करे आचमन गंगा जल से। ध्यान करे हृदय निर्मल से॥

    गंगाजल से आचमन करे और निर्मल हृदय से ध्यान करे।

  36. चौपाई 35

    पाठ करे फिर चालीसा की। अस्तुति करे मात तुलसा की॥

    फिर चालीसा का पाठ करे और माता तुलसी की स्तुति करे।

  37. चौपाई 36

    यह विधि पूजा करे हमेशा। ताके तन नहिं रहै कलेशा॥

    चालीसा कहती है कि जो इस विधि से सदा पूजा करता है, उसे कोई कष्ट नहीं रहता।

  38. चौपाई 37

    करै मास कार्तिक का साधन। सोवे नित पवित्र सिध हुई जाहीं॥

    जो कार्तिक मास का व्रत-साधन करता है और नित्य पवित्र होकर सोता है, वह सिद्ध हो जाता है। (इस चौपाई की दूसरी पंक्ति सभी स्रोतों में इसी रूप में है और अधूरी-सी लगती है।)

  39. चौपाई 38

    है यह कथा महा सुखदाई। पढ़े सुने सो भव तर जाई॥

    यह कथा (स्तुति) बहुत सुख देने वाली है; चालीसा कहती है कि जो इसे पढ़ता या सुनता है, वह संसार-सागर से तर जाता है।

  40. समापन दोहा

    यह श्री तुलसी चालीसा पाठ करे जो कोय। गोविन्द सो फल पावही जो मन इच्छा होय॥

    चालीसा कहती है कि जो कोई यह श्री तुलसी चालीसा पढ़ता है, वह गोविंद से वह फल पाता है जिसकी मन में इच्छा हो।

तुलसी चालीसा PDF डाउनलोड करें

विज्ञापन

अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/tulsi-chalisa/

संक्षेप में

तुलसी चालीसा तुलसी माता की स्तुति है, जो ‘श्री तुलसी महारानी, करूँ विनय सिरनाय’ दोहे से शुरू होती है। इसमें तुलसी को विष्णुप्रिया कहा गया है, कार्तिक मास में उनके माहात्म्य का उल्लेख है और अंत में तुलसी पूजा की सरल विधि है। परंपरा में कार्तिक मास, देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह पर, और रोज़ तुलसी पूजा के समय इसका पाठ होता है।

यहाँ रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार के ‘51 चालीसा संग्रह’ (छपी पुस्तक) का पाठ लिया गया है और उसे हिंदी पथ, आज तक और श्री मंदिर के पाठ से मिलाया गया है। इस पाठ में 38 चौपाइयाँ हैं। आज तक के पेज पर अंत में दो चौपाइयाँ और हैं (‘तुलसी मैया तुम कल्याणी…’ और ‘भाव ना तुझे माँ नित नित ध्यावे…’); ये छपी पुस्तक में नहीं हैं, इसलिए यहाँ नहीं दी गईं। छोटे पाठभेद: चौपाई 9 में आज तक ‘पूजन’; चौपाई 24 में हिंदी पथ ‘तुलसी माता’ (तुक नहीं मिलती), बाकी ‘तुलसी माई’; चौपाई 29 में पुस्तक ‘मांग मात’। चौपाई 13 में सभी स्रोत ‘छायो तब प्रताप’ छापते हैं; अर्थ ‘तव’ (आपका) मानकर किया गया है। चौपाई 37 की दूसरी पंक्ति सभी स्रोतों में एक जैसी है, पर छंद और तुक में अधूरी लगती है। ‘धन्य धन्य श्री तुलसी माता’ से शुरू होने वाली एक और तुलसी चालीसा भी मिलती है (द्रिक पंचांग पर); वह अलग रचना है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तुलसी चालीसा में कितनी चौपाइयाँ हैं?

छपे पाठ में आरंभ में एक दोहा, 38 चौपाइयाँ और अंत में एक दोहा है। कुछ वेबसाइटें अंत में दो चौपाइयाँ और जोड़ती हैं, जो छपी पुस्तक में नहीं हैं।

तुलसी चालीसा का पाठ कब किया जाता है?

इसे रोज़ तुलसी पूजा के समय पढ़ा जा सकता है। परंपरा में कार्तिक मास, देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है। चालीसा स्वयं कार्तिक मास के माहात्म्य का उल्लेख करती है (चौपाई 7 और 37)।

चालीसा में तुलसी पूजा की कौन-सी विधि बताई गई है?

चौपाई 32 से 35 में: गंगाजल से स्नान कराना, चंदन, अक्षत, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य चढ़ाना, गंगाजल से आचमन, ध्यान और फिर चालीसा का पाठ। अपने घर और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार विधि में अंतर हो सकता है।

तुलसी को विष्णुप्रिया क्यों कहा गया है?

परंपरा में तुलसी को विष्णु की प्रिया माना जाता है, और विष्णु की पूजा में तुलसी-दल चढ़ाया जाता है। चालीसा की चौपाई 2 से 5 में यही भाव है। तुलसी विवाह में तुलसी का विवाह शालिग्राम (विष्णु) से कराया जाता है।

तुलसी चालीसा किसने लिखी?

पाठ में किसी कवि का नाम नहीं आता, और रचयिता किसी प्रामाणिक स्रोत से ज्ञात नहीं है।

स्रोत

  1. परंपरागत पाठ
  2. रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार: ‘51 चालीसा संग्रह’, आरतियों सहित (2004), पृ. 226–229
  3. हिंदी पथ: तुलसी चालीसा
  4. आज तक: श्री तुलसी चालीसा
  5. श्री मंदिर: तुलसी चालीसा

कुछ गलत लगा? गलती बताएँ

पाठ का मिलान: archive.org, hindipath.com, aajtak.in, srimandir.com