सम्प्रदाय

गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय

संक्षेप में

गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय चैतन्य महाप्रभु (ब्रिटानिका के अनुसार 1485–1533) से चली कृष्ण-भक्ति की परंपरा है, जो 16वीं सदी से बंगाल और ओडिशा में फैली। “गौड़” बंगाल का पुराना नाम है। इसमें राधा और कृष्ण की उपासना होती है और भक्ति का मुख्य रूप हरि-नाम का सामूहिक कीर्तन (संकीर्तन) है। इसका दर्शन अचिन्त्य भेदाभेद है, जिसे चैतन्य के शिष्यों, वृंदावन के छह गोस्वामियों, ने ग्रंथों में लिखा। इसके मुख्य केंद्र नवद्वीप (जहाँ चैतन्य का जन्म हुआ), पुरी (जहाँ उन्होंने अंतिम वर्ष बिताए) और वृंदावन हैं। इस्कॉन (ISKCON) इसी परंपरा में है।

आराध्य
राधा-कृष्ण; मंदिरों में चैतन्य, नित्यानंद और अद्वैत के विग्रह भी
संस्थापक
चैतन्य महाप्रभु (पहला नाम विश्वम्भर मिश्र), 1485–1533; साथी नित्यानंद और अद्वैताचार्य
आचार्य
वृंदावन के छह गोस्वामी: रूप, सनातन, जीव, रघुनाथ दास, गोपाल भट्ट, रघुनाथ भट्ट; बाद में कृष्णदास कविराज, बलदेव विद्याभूषण
गुरु-परंपरा
कृष्ण, ब्रह्मा, नारद, व्यास, मध्व … माधवेंद्र पुरी, ईश्वर पुरी, चैतन्य (परंपरा के अनुसार)
दर्शन
अचिन्त्य भेदाभेद
सम्प्रदाय
परंपरा स्वयं को ब्रह्म (माध्व) सम्प्रदाय की शाखा मानती है; कुछ विद्वान इस पर प्रश्न उठाते हैं
मुख्य ग्रंथ
भागवत पुराण; रूप गोस्वामी के भक्तिरसामृतसिन्धु और उज्ज्वलनीलमणि; जीव गोस्वामी के षट्सन्दर्भ; हरिभक्तिविलास; कृष्णदास कविराज का चैतन्य-चरितामृत; बलदेव का गोविन्द-भाष्य
मुख्य केंद्र
नवद्वीप और मायापुर (पश्चिम बंगाल), पुरी (ओडिशा), वृंदावन (ब्रज)
तिलक
परंपरा के अनुसार गोपीचंदन (सफ़ेद मिट्टी) का वैष्णव तिलक, माथे के साथ शरीर के बारह स्थानों पर; इसके ठीक आकार का वर्णन स्रोतों में अलग-अलग है
मुख्य पर्व
गौर पूर्णिमा (फाल्गुन पूर्णिमा, चैतन्य का जन्मदिन, दोल यात्रा के दिन); जन्माष्टमी, राधाष्टमी, झूलन यात्रा, रास यात्रा; पुरी की रथयात्रा

गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय क्या है

इस परंपरा का केंद्र कृष्ण और राधा का प्रेम है, जिसका आधार भागवत पुराण है; एस. के. डे के अनुसार भागवत ही इसका मुख्य शास्त्र रहा। चैतन्य ने कर्मकांड से अधिक भाव-भरी भक्ति और हरि-नाम के गायन पर ज़ोर दिया। उनके अनुयायी उन्हें स्वयं कृष्ण मानते हैं; कृष्णदास कविराज के चैतन्य-चरितामृत में उन्हें “स्वयं भगवान” कहा गया है, और परंपरा उन्हें राधा और कृष्ण का संयुक्त रूप मानती है।

भंडारकर के अनुसार चैतन्य ने भक्ति के लिए जाति का भेद नहीं माना और सबको शिष्य बनाया। चैतन्य ने स्वयं प्रायः कुछ नहीं लिखा; डे के अनुसार आठ संस्कृत श्लोकों का शिक्षाष्टक ही उनका माना जाता है।

संक्षिप्त इतिहास

चैतन्य का जन्म बंगाल के नवद्वीप में फाल्गुन पूर्णिमा, शक संवत 1407 को हुआ; पिता जगन्नाथ मिश्र और माता शची थीं, और उनका पहला नाम विश्वम्भर था। गोरे रंग के कारण उन्हें गौरांग और गौरचंद्र भी कहते हैं। युवावस्था में वे न्याय और व्याकरण के अध्यापक थे। गया की यात्रा में उन्होंने ईश्वर पुरी से दीक्षा ली और लौटकर नवद्वीप में साथियों के साथ कीर्तन शुरू किया; नित्यानंद और अद्वैताचार्य उनके प्रमुख साथी बने।

लगभग 24 वर्ष की आयु में, 1510 में, कटवा में केशव भारती से संन्यास लेकर वे “कृष्ण चैतन्य” कहलाए। इसके बाद वे पुरी गए, कुछ वर्ष दक्षिण और उत्तर भारत की यात्रा की और फिर जीवन के अंतिम लगभग अठारह वर्ष पुरी में जगन्नाथ के पास बिताए। उनका देहांत 1533 में पुरी में हुआ।

चैतन्य ने रूप और सनातन को वृंदावन भेजा। वहाँ इन दोनों, उनके भतीजे जीव, रघुनाथ दास, गोपाल भट्ट और रघुनाथ भट्ट ने, जिन्हें छह गोस्वामी कहते हैं, सम्प्रदाय का दर्शन, भक्ति-रस का शास्त्र और पूजा-विधि संस्कृत ग्रंथों में लिखी, ब्रज के पवित्र स्थानों की पहचान की और बड़े मंदिर बनवाए। बंगाल में नित्यानंद ने समुदाय को संगठित किया। 18वीं सदी की शुरुआत में बलदेव विद्याभूषण ने ब्रह्मसूत्र पर गोविन्द-भाष्य लिखा।

इस्कॉन (International Society for Krishna Consciousness), जिसकी स्थापना ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने 1966 में न्यूयॉर्क में की, इसी परंपरा की संस्था है। इस्कॉन अपनी गुरु-परंपरा चैतन्य, छह गोस्वामियों और बाद के गौड़ीय आचार्यों से होकर प्रभुपाद तक बताता है, और इसका मुख्यालय मायापुर में है।

विश्वास और साधना

अचिन्त्य भेदाभेद: जीव गोस्वामी के अनुसार भगवान की शक्तियाँ और जीव भगवान से भिन्न भी हैं और अभिन्न भी, और यह संबंध मनुष्य के तर्क से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता, इसलिए “अचिन्त्य” (जिसका चिंतन न हो सके)। डे के अनुसार यही “अचिन्त्य” शब्द इस परंपरा को दूसरे वैष्णव सम्प्रदायों से अलग करता है।

संकीर्तन: चैतन्य अपने साथियों के साथ राधा-कृष्ण के पद और हरि-नाम गाते थे, और नगर में नाचते-गाते जुलूस (नगर-कीर्तन) निकालते थे। आज भी मंदिरों में ढोल और करताल के साथ कीर्तन पूजा का मुख्य अंग है। घर में तुलसी की माला पर हरि-नाम का जप (हरिनाम) होता है। गौड़ीय परंपरा और इस्कॉन में “हरे कृष्ण” महामंत्र का जप और कीर्तन प्रमुख है।

प्रमुख केंद्र

नवद्वीप (पश्चिम बंगाल) चैतन्य का जन्मस्थान है; गौर पूर्णिमा पर यहाँ मेला लगता है और चैतन्य के जीवन से जुड़े स्थानों की परिक्रमा होती है। पास के मायापुर में इस्कॉन का मुख्यालय और श्री मायापुर चंद्रोदय मंदिर है। पुरी (ओडिशा) में जगन्नाथ मंदिर के पास चैतन्य ने अपने अंतिम वर्ष बिताए। ब्रज में वृंदावन छह गोस्वामियों के कारण सम्प्रदाय का बौद्धिक और धार्मिक केंद्र बना।

स्रोतों में अंतर

  • जन्म का वर्ष: ब्रिटानिका और भंडारकर 1485 देते हैं; शक संवत 1407 की फाल्गुन पूर्णिमा ईस्वी गिनती में फ़रवरी 1486 पड़ती है, जैसा एस. के. डे (बी. मजूमदार के आधार पर, अनुमान के रूप में 27 फ़रवरी 1486) और द्रिक पंचांग लिखते हैं।
  • देहांत का वर्ष: ब्रिटानिका, भंडारकर और डे 1533 देते हैं (डे: आषाढ़, शक 1455, यानी जून-जुलाई 1533); द्रिक पंचांग 1534 लिखता है।
  • मध्व से संबंध: गौड़ीय परंपरा अपनी गुरु-परंपरा मध्व से माधवेंद्र पुरी और ईश्वर पुरी होकर चैतन्य तक मानती है। एस. के. डे के अनुसार यह बात पहली बार कवि कर्णपूर की गौरगणोद्देशदीपिका (शायद 1576 के बाद) में मिलती है; चैतन्य की प्रामाणिक जीवनियों और छह गोस्वामियों के ग्रंथों में मध्व-सम्प्रदाय से संबंध नहीं कहा गया, और जीव गोस्वामी ने बंगाल की परंपरा को दूसरे सम्प्रदायों के मतों से अलग बताया।
  • “अचिन्त्य भेदाभेद” नाम: डे इस सिद्धांत को जीव गोस्वामी के ग्रंथों में दिखाते हैं; फ़र्क़ुहार के अनुसार यह नाम 18वीं सदी की शुरुआत में बलदेव विद्याभूषण ने अपने गोविन्द-भाष्य में दिया।
  • तिलक: केनेडी गोपीचंदन से माथे और शरीर के बारह स्थानों पर तिलक का वर्णन करते हैं, पर उसका ठीक आकार नहीं बताते; हमें आकार का कोई एक भरोसेमंद वर्णन नहीं मिला।
संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 8 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय क्या है?

चैतन्य महाप्रभु से चली राधा-कृष्ण भक्ति की परंपरा, जो 16वीं सदी से बंगाल और ओडिशा में फैली। इसमें हरि-नाम का संकीर्तन प्रमुख है और इसका दर्शन अचिन्त्य भेदाभेद है।

“गौड़ीय” का अर्थ क्या है?

“गौड़” बंगाल का पुराना नाम है, इसलिए गौड़ीय यानी बंगाल का। यह नाम इसलिए पड़ा कि यह परंपरा बंगाल में चैतन्य से शुरू हुई।

छह गोस्वामी कौन थे?

रूप, सनातन, जीव, रघुनाथ दास, गोपाल भट्ट और रघुनाथ भट्ट। चैतन्य के इन शिष्यों ने वृंदावन में रहकर सम्प्रदाय का दर्शन और पूजा-विधि संस्कृत ग्रंथों में लिखी और ब्रज के तीर्थों की पहचान की।

अचिन्त्य भेदाभेद क्या है?

“अचिन्त्य भेद और अभेद”: भगवान की शक्तियाँ और जीव भगवान से भिन्न भी हैं और अभिन्न भी, और यह संबंध तर्क से पूरी तरह समझ में नहीं आता। यह गौड़ीय परंपरा का दर्शन है।

क्या इस्कॉन गौड़ीय वैष्णव है?

हाँ। इस्कॉन, जिसकी स्थापना ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने 1966 में की, चैतन्य महाप्रभु की गौड़ीय परंपरा में है और अपनी गुरु-परंपरा चैतन्य से जोड़ता है। इसका मुख्यालय पश्चिम बंगाल के मायापुर में है।

स्रोत

  1. एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका: “Chaitanya movement”, “Vaishnavism”
  2. सुशील कुमार डे: Early History of the Vaishnava Faith and Movement in Bengal (कलकत्ता, दूसरा संस्करण 1961), archive.org पर
  3. आर. जी. भंडारकर: Vaisnavism, Saivism and Minor Religious Systems (1913), § 66–68 “Caitanya”
  4. जे. एन. फ़र्क़ुहार: An Outline of the Religious Literature of India (1920), § 364–371
  5. मेलविल टी. केनेडी: The Chaitanya Movement (1925), पूजा, दीक्षा और पर्वों के अध्याय
  6. द्रिक पंचांग: “Chaitanya Mahaprabhu Jayanti” (गौर पूर्णिमा)
  7. ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद: Bhagavad-gita As It Is (1972), “The Disciplic Succession” और इस्कॉन केंद्रों की सूची
  8. विकिपीडिया: “ISKCON” (स्थापना का वर्ष, स्थान और मुख्यालय)

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