सम्प्रदाय

रामानंदी सम्प्रदाय (रामावत)

संक्षेप में

रामानंदी सम्प्रदाय, जिसे रामावत भी कहते हैं, रामानंद (ब्रिटानिका के अनुसार लगभग 1400–1470) से चली वैष्णव परंपरा है, जो विष्णु के अवतार श्रीराम और सीता की उपासना करती है। रामानंद ने अपना अधिकांश जीवन वाराणसी में बिताया और भक्ति का संदेश संस्कृत के बजाय लोकभाषा में दिया। ब्रिटानिका के अनुसार इसका साधु-समाज आज उत्तर भारत का सबसे बड़ा वैष्णव साधु-समाज है; इसके साधु वैरागी (बैरागी) कहलाते हैं, और अयोध्या और वाराणसी में इसके अनेक मठ हैं।

आराध्य
श्रीराम और सीता; साथ में लक्ष्मण और हनुमान
संस्थापक
रामानंद (रामानंदाचार्य), ब्रिटानिका के अनुसार लगभग 1400–1470; उनके गुरु राघवानंद
गुरु-परंपरा
श्रीराम, सीता, हनुमान, ब्रह्मा, वसिष्ठ, पराशर, व्यास, शुकदेव … हर्यानंद, राघवानंद, रामानंद (परंपरा के अनुसार); भक्तमाल रामानंद को रामानुज से पाँचवाँ बताता है
दर्शन
परंपरा के अनुसार रामानुज का विशिष्टाद्वैत; कुछ विद्वान इस पर संदेह करते हैं
सम्प्रदाय
श्री सम्प्रदाय (उत्तर भारत की चार सम्प्रदायों की गिनती में)
मंत्र
राम का षडक्षर (छह अक्षर का) मंत्र, जिसे परंपरा तारक मंत्र कहती है; फ़र्क़ुहार के अनुसार “ॐ रामाय नमः”; अभिवादन “जय श्रीराम”, “सीताराम”
मुख्य ग्रंथ
अध्यात्म रामायण; तुलसीदास का रामचरितमानस; नाभादास का भक्तमाल; रामानुज का श्रीभाष्य
मुख्य केंद्र
अयोध्या; वाराणसी (पंचगंगा घाट, रामानंद का स्थान); जयपुर के पास गलता
तिलक
वैष्णव ऊर्ध्वपुंड्र; फ़र्क़ुहार के अनुसार श्रीवैष्णव तिलक का थोड़ा बदला हुआ रूप; ठीक रूप का वर्णन स्रोतों में अलग-अलग है

रामानंदी सम्प्रदाय क्या है

फ़र्क़ुहार के अनुसार श्रीवैष्णव विष्णु के सभी अवतारों को पूजते हैं, पर रामानंद और उनके शिष्यों ने केवल राम और सीता, और उनके परिकर, की उपासना की; उत्तर भारत में परम ईश्वर के लिए “राम” नाम का चलन इन्हीं से जोड़ा जाता है। ग्रियर्सन के अनुसार रामानंद की शिक्षा के दो मूल सिद्धांत थे: पूर्ण भक्ति ईश्वर से पूर्ण प्रेम है, और ईश्वर के सभी सेवक भाई हैं।

ग्रियर्सन और भंडारकर के अनुसार रामानंद ने शिष्य बनाते समय जाति का भेद नहीं किया; उनके प्रसिद्ध शिष्यों में राजपूत पीपा, जुलाहे कबीर, नाई सेन, जाट धन्ना, चर्मकार रैदास और स्त्री पद्मावती गिने जाते हैं। फ़र्क़ुहार जोड़ते हैं कि यह छूट धार्मिक जीवन तक थी; रामानंद ने जाति को सामाजिक व्यवस्था के रूप में बदलने का प्रयास नहीं किया।

संक्षिप्त इतिहास

उत्तर भारत की परंपरा के अनुसार रामानंद का जन्म प्रयाग में एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ, उनका पहला नाम रामदत्त था, और वे पढ़ने के लिए वाराणसी गए। वहाँ वे रामानुज की परंपरा के आचार्य राघवानंद के शिष्य बने, जिन्होंने उन्हें दीक्षा देकर “रामानंद” नाम दिया। परंपरा बताती है कि लंबी तीर्थयात्रा से लौटने पर भोजन के नियमों को लेकर उनके गुरुभाइयों ने आपत्ति की, और राघवानंद ने उन्हें अपना अलग मार्ग चलाने की अनुमति दी। रामानंद वाराणसी के पंचगंगा घाट पर रहे।

रामानंद ने लोकभाषा में उपदेश दिया, और उनके अनुयायियों ने हिंदी की बोलियों में पद रचे। ग्रियर्सन के अनुसार रामानंद का स्वयं का लिखा बहुत कम बचा है; फ़र्क़ुहार के अनुसार उनका एक पद सिख ग्रंथ में मिलता है। उनके शिष्यों में कबीर, रैदास और सेन के नाम से अलग पंथ भी चले।

तुलसीदास (1532–1623) को ग्रियर्सन और फ़र्क़ुहार रामानंदी मानते हैं। फ़र्क़ुहार के अनुसार उनके गुरु नरहरि रामानंद से छठी पीढ़ी में थे; तुलसीदास ने रामचरितमानस 1574 में अयोध्या में शुरू किया और वाराणसी में पूरा किया। फ़र्क़ुहार यह भी लिखते हैं कि तुलसीदास पहले स्मार्त ब्राह्मण थे और उनके काव्य में शिव के प्रति गहरी श्रद्धा है। भक्तमाल के रचयिता नाभादास भी ग्रियर्सन के अनुसार रामानंद के पहले शिष्य अनंतानंद की परंपरा में थे।

विश्वास और साधना

परंपरा के अनुसार राम-मंत्र स्वयं श्रीराम ने सीता को दिया, सीता ने हनुमान को, और फिर यह ब्रह्मा, वसिष्ठ और आगे की गुरु-परंपरा से रामानंद तक पहुँचा; यह क्रम अनंतानंदाचार्य के “श्रीराममन्त्रराज-परम्परा स्तोत्र” में दिया गया है, जो इस परंपरा को “श्री सम्प्रदाय” कहता है। दीक्षा में गुरु शिष्य को राम-मंत्र देते हैं।

सम्प्रदाय के साधु वैरागी (राग से रहित) कहलाते हैं; फ़र्क़ुहार के अनुसार उन्हें अवधूत भी कहते हैं, और उनका अनुशासन शंकराचार्य के दशनामी संन्यासियों से कम कठोर है। ग्रियर्सन के अनुसार रामानंद के अनुयायियों पर लगभग एकमात्र कठोर नियम घूमते साधुओं के आतिथ्य का था। फ़र्क़ुहार लिखते हैं कि 1918 के प्रयाग कुंभ में संख्या में केवल दशनामी संन्यासी ही रामानंदी वैरागियों के बराबर थे। अनेक गृहस्थ, जो किसी सम्प्रदाय में दीक्षित नहीं हैं, राम और सीता की उपासना में रामानंद और तुलसीदास की परंपरा से प्रभावित हैं।

प्रमुख केंद्र

फ़र्क़ुहार के अनुसार रामानंदी वैरागियों के अनेक मठ अयोध्या, वाराणसी और दूसरे स्थानों पर हैं। ग्रियर्सन के अनुसार रामानंद वाराणसी के पंचगंगा घाट पर बसे, जहाँ उनके चरण-चिह्न आज भी दिखाए जाते हैं। अयोध्या में तुलसीदास ने रामचरितमानस शुरू किया, और फ़र्क़ुहार के अनुसार वहीं से वे राम-भक्ति का प्रचार करते रहे। राजस्थान में जयपुर के पास गलता सम्प्रदाय की पुरानी और प्रमुख गद्दी मानी जाती है।

स्रोतों में अंतर

  • रामानंद का समय: परंपरा (ग्रियर्सन और भंडारकर द्वारा उद्धृत) जन्म 1299 और देहांत 1410/1411 बताती है, जिससे 111 वर्ष की आयु बनती है, जिसे दोनों विद्वान असंभाव्य मानते हैं; फ़र्क़ुहार उनके शिष्यों पीपा और कबीर के समय के आधार पर लगभग 1400–1470 देते हैं, और ब्रिटानिका भी लगभग 1400–1470।
  • रामानुज से संबंध: अनुयायी और भक्तमाल रामानंद को रामानुज की परंपरा में पाँचवाँ मानते हैं; ब्रिटानिका के अनुसार कुछ विद्वानों ने, और 20वीं सदी की शुरुआत में कुछ रामानंदियों ने भी, इस संबंध पर प्रश्न उठाए। फ़र्क़ुहार मानते हैं कि श्रीवैष्णवों से कुछ संबंध निश्चित है, पर मंत्र, तिलक और भोजन के नियमों का अंतर देखकर उससे अधिक कहना कठिन है।
  • दर्शन: ग्रियर्सन लिखते हैं कि दर्शन रामानुज वाला ही है, और भंडारकर राघवानंद को विशिष्टाद्वैत का आचार्य बताते हैं; फ़र्क़ुहार के अनुसार इसका कोई सीधा प्रमाण नहीं है, और रामानंद से प्रेरित संतों में अद्वैत के शब्द बार-बार मिलते हैं।
  • प्रमुख शिष्य: ग्रियर्सन भक्तमाल के आधार पर बारह शिष्य गिनाते हैं (अनंतानंद, सुखानंद, सुरसुरानंद, नरहरियानंद, पीपा, कबीर, भावानंद, सेन, धन्ना, रैदास, पद्मावती, सुरसरी); भंडारकर तेरह नाम देते हैं, जिनमें योगानंद और गालवानंद हैं पर सुरसरी नहीं। भंडारकर यह भी लिखते हैं कि कबीर की रचनाओं में, जितनी उन्होंने देखीं, रामानंद का नाम नहीं मिलता।
  • मंत्र: फ़र्क़ुहार रामानंदी मंत्र “ॐ रामाय नमः” बताते हैं और लिखते हैं कि श्रीवैष्णवों का मंत्र “ॐ नमो नारायणाय” है, और रामानुज का मंत्र भी “ॐ रामाय नमः” बताना पुरानी भूल है। ग्रियर्सन के अनुसार “ॐ रामाय नमः” वह मंत्र था जो राघवानंद ने रामानंद को दिया, और रामानंद की अपनी दीक्षा का मंत्र “श्री राम” शब्द थे।
  • तुलसीदास: ग्रियर्सन और फ़र्क़ुहार उन्हें रामानंदी गिनते हैं; फ़र्क़ुहार यह भी लिखते हैं कि वे पहले पंचदेव-उपासक स्मार्त ब्राह्मण थे और उनके काव्य में शिव-भक्ति और अद्वैत के तत्व हैं। भंडारकर लिखते हैं कि तुलसीदास ने न कोई सम्प्रदाय चलाया, न कोई निश्चित वेदांत-मत रखा।
संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 6 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रामानंदी सम्प्रदाय क्या है?

रामानंद से चली वैष्णव परंपरा, जो श्रीराम और सीता की उपासना करती है। इसे रामावत और श्री सम्प्रदाय भी कहते हैं, और इसके साधु वैरागी कहलाते हैं।

रामानंद कौन थे?

वाराणसी में रहे एक वैष्णव संत, जिन्होंने राम-सीता की भक्ति लोकभाषा में सिखाई और हर जाति के शिष्य बनाए। ब्रिटानिका उनका समय लगभग 1400–1470 देता है; परंपरा उनका जन्म प्रयाग में मानती है और उनके गुरु राघवानंद बताती है।

क्या तुलसीदास रामानंदी थे?

ग्रियर्सन और फ़र्क़ुहार उन्हें रामानंदी मानते हैं; फ़र्क़ुहार के अनुसार उनके गुरु नरहरि रामानंद से छठी पीढ़ी में थे। साथ ही फ़र्क़ुहार लिखते हैं कि वे पहले स्मार्त थे और उनके काव्य में शिव के प्रति भी गहरी श्रद्धा है।

रामानंदी सम्प्रदाय का रामानुज से क्या संबंध है?

अनुयायी और भक्तमाल रामानंद को रामानुज की परंपरा में पाँचवाँ आचार्य मानते हैं, और परंपरा इसका दर्शन विशिष्टाद्वैत बताती है। ब्रिटानिका के अनुसार कुछ विद्वानों ने, और 20वीं सदी की शुरुआत में कुछ रामानंदियों ने भी, इस संबंध पर प्रश्न उठाए हैं।

रामानंदी साधुओं को वैरागी क्यों कहते हैं?

“वैरागी” का अर्थ है राग (आसक्ति) से रहित। फ़र्क़ुहार के अनुसार रामानंदी साधुओं को वैरागी और अवधूत कहते हैं, और उनके अनेक मठ अयोध्या और वाराणसी में हैं।

स्रोत

  1. एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका: “Ramananda”
  2. जॉर्ज ए. ग्रियर्सन: “Rāmānandīs, Rāmāwats”, Encyclopaedia of Religion and Ethics, खंड 10 (1918), पृ. 569–572
  3. जे. एन. फ़र्क़ुहार: An Outline of the Religious Literature of India (1920), § 292 और § 387–394
  4. आर. जी. भंडारकर: Vaisnavism, Saivism and Minor Religious Systems (1913), § 56–57 “Ramananda” और “Tulasidas”
  5. अनंतानंदाचार्य: श्रीराममन्त्रराज-परम्परा स्तोत्र (sanskritdocuments.org, “चतुःसम्प्रदाय दिग्दर्शन” से), और उसके साथ दी गई गुरु-परंपरा की सूची
  6. विकिपीडिया: “Ramanandi Sampradaya”, “Galtaji” (गलता की गद्दी)

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