चित्रगुप्त जी की आरती: ॐ जय चित्रगुप्त हरे

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 1 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
चित्रगुप्त पूजा: बही-खाता, कलम-दवात, “श्री” लिखा पन्ना, चावल, दीया और गेंदे के फूल
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. पद 1

    ॐ जय चित्रगुप्त हरे, स्वामी जय चित्रगुप्त हरे। भक्त जनों के इच्छित, फल को पूर्ण करे॥

    हे स्वामी चित्रगुप्त, आपकी जय हो। आप भक्तों के मनचाहे फल पूरे करते हैं।

  2. पद 2

    विघ्न विनाशक मंगलकर्ता, सन्तन सुखदायी। भक्तन के प्रतिपालक, त्रिभुवन यश छायी॥

    आप विघ्नों का नाश करने वाले, मंगल करने वाले और संतों को सुख देने वाले हैं। आप भक्तों के रक्षक हैं और आपका यश तीनों लोकों में फैला है।

  3. पद 3

    रूप चतुर्भुज, श्यामल मूरति, पीताम्बर राजै। मातु इरावती, दक्षिणा, वाम अङ्ग साजै॥

    आपका रूप चार भुजाओं वाला है, मूर्ति साँवली है और आप पीले वस्त्र (पीतांबर) में शोभित हैं। माता इरावती और दक्षिणा आपके साथ, वाम अंग में सुशोभित हैं; परंपरा इन्हें चित्रगुप्त जी की पत्नियाँ मानती है।

  4. पद 4

    कष्ट निवारण, दुष्ट संहारण, प्रभु अन्तर्यामी। सृष्टि संहारण, जन दुःख हारण, प्रकट हुये स्वामी॥

    हे अंतर्यामी प्रभु, आप कष्ट दूर करने वाले और दुष्टों का संहार करने वाले हैं। सृष्टि का संहार करने वाले और लोगों का दुख हरने वाले स्वामी, आप प्रकट हुए।

  5. पद 5

    कलम, दवात, शङ्ख, पत्रिका, कर में अति सोहै। वैजयन्ती वनमाला, त्रिभुवन मन मोहै॥

    आपके हाथों में कलम, दवात, शंख और पत्रिका (लेखा-पत्र) शोभित हैं। वैजयंती वनमाला पहने आपका रूप तीनों लोकों का मन मोह लेता है।

  6. पद 6

    सिंहासन का कार्य सम्भाला, ब्रह्मा हर्षाये। तैंतीस कोटि देवता, चरणन में धाये॥

    जब आपने (न्याय के) सिंहासन का कार्य सँभाला, तो ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए, और तैंतीस कोटि देवता आपके चरणों में दौड़े आए।

  7. पद 7

    नृपति सौदास, भीष्म पितामह, याद तुम्हें कीन्हा। वेगि विलम्ब न लायो, इच्छित फल दीन्हा॥

    आरती के अनुसार राजा सौदास और भीष्म पितामह ने आपका स्मरण किया, तो आपने बिना देर किए (वेगि) उन्हें मनचाहा फल दिया।

  8. पद 8

    दारा, सुत, भगिनी, सब अपने स्वास्थ के कर्ता। जाऊँ कहाँ शरण में किसकी, तुम तज मैं भर्ता॥

    पत्नी (दारा), पुत्र और बहन, सब अपने-अपने स्वार्थ के लिए काम करते हैं (‘स्वास्थ’ को यहाँ स्वारथ यानी स्वार्थ के अर्थ में लिया जाता है)। हे पालनहार (भर्ता), आपको छोड़कर मैं कहाँ, किसकी शरण में जाऊँ?

  9. पद 9

    बन्धु, पिता तुम स्वामी, शरण गहूँ किसकी। तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥

    हे स्वामी, आप ही मेरे बंधु और पिता हैं; आपके सिवा मैं किसकी शरण लूँ? आपके बिना कोई दूसरा नहीं, जिससे मैं आशा रखूँ।

  10. पद 10

    जो जन चित्रगुप्त जी की आरती, प्रेम सहित गावैं। चौरासी से निश्चित छूटैं, इच्छित फल पावैं॥

    आरती कहती है कि जो लोग प्रेम से चित्रगुप्त जी की यह आरती गाते हैं, वे चौरासी (लाख योनियों में जन्म-मरण के चक्र) से निश्चित रूप से छूट जाते हैं और मनचाहा फल पाते हैं।

  11. पद 11

    न्यायाधीश बैकुण्ठ निवासी, पाप पुण्य लिखते। हम हैं शरण तिहारी, आस न दूजी करते॥

    आप न्यायाधीश हैं, बैकुंठ में निवास करते हैं और (प्राणियों के) पाप और पुण्य लिखते हैं। हम आपकी शरण में हैं और किसी दूसरे से आशा नहीं रखते।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/chitragupta-aarti/

संक्षेप में

“ॐ जय चित्रगुप्त हरे” भगवान चित्रगुप्त की आरती है, जिन्हें परंपरा में यमराज के यहाँ सब प्राणियों के कर्मों का लेखा रखने वाला देवता माना जाता है। कायस्थ समाज उन्हें अपना आराध्य मानता है। यह आरती कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भाई दूज, यम द्वितीया) की चित्रगुप्त पूजा और कलम-दवात पूजा में गाई जाती है। इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है।

यहाँ वह पाठ दिया गया है जो अधिकांश स्रोतों में मिलता है। कुछ संस्करणों में शब्द अलग मिलते हैं, जैसे ‘कष्ट निवारक, दुष्ट संहारक’, ‘सृष्टि सम्हारन’ (सृष्टि को सँभालने वाले), ‘विश्व न्याय का कार्य सम्भाला’, ‘कोटि कोटि देवता तुम्हारे’, ‘नृप सुदास अरु भीष्म पितामह’ और ‘वेग, विलम्ब न कीन्हौं’; कहीं ‘शङ्ख’ की जगह ‘तलवार’ और ‘चौरासी से निश्चित छूटैं’ की जगह ‘चौरासी के छूटैं बंधन’ भी मिलता है। पद 8 का ‘स्वास्थ’ शब्द देखे गए सभी स्रोतों में इसी रूप में है, पर प्रसंग से उसका अर्थ स्वार्थ है। यह आरती ‘ॐ जय जगदीश हरे’ के छंद और धुन में गाई जाती है। गाते समय पहली पंक्ति (टेक) हर पद के बाद दोहराई जाती है।

आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

चित्रगुप्त जी की आरती कब गाई जाती है?

कार्तिक शुक्ल द्वितीया यानी भाई दूज (यम द्वितीया) को चित्रगुप्त पूजा में, जब कायस्थ परिवार कलम और दवात की पूजा करते हैं। दक्षिण भारत में चित्रा पौर्णमी पर भी चित्रगुप्त की पूजा होती है।

चित्रगुप्त कौन हैं?

परंपरा में चित्रगुप्त यमराज के यहाँ सब प्राणियों के अच्छे और बुरे कर्मों का लेखा रखने वाले देवता हैं। कायस्थ समाज उन्हें अपना आराध्य मानता है। आरती में उनके हाथों में कलम, दवात और पत्रिका का वर्णन इसी भूमिका से जुड़ा है।

इस आरती की कुछ पंक्तियाँ ‘ॐ जय जगदीश हरे’ जैसी क्यों हैं?

यह उसी छंद और धुन में गाई जाती है। पद 9 (‘बन्धु, पिता तुम स्वामी, शरण गहूँ किसकी...’) की पंक्तियाँ लगभग ज्यों की त्यों ‘ॐ जय जगदीश हरे’ के तीसरे पद में भी आती हैं।

इस आरती के रचयिता कौन हैं?

रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है। इसके किसी पद में किसी कवि का नाम (छाप) नहीं आता।

स्रोत

  1. परंपरागत आरती पाठ

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पाठ का मिलान: drikpanchang.com, kayasthasamaj.in, bhaktibharat.com