- दोहा 1
श्री गणपति गुरुपद कमल, प्रेम सहित सिरनाय।
नवग्रह चालीसा कहत, शारद होत सहाय॥
श्री गणपति और गुरु के चरण-कमलों में प्रेम से सिर झुकाकर मैं नवग्रह चालीसा कहता हूँ; माता शारदा (सरस्वती) इसमें सहायक होती हैं।
- दोहा 2
जय जय रवि शशि भौम बुध, जय गुरु भृगु शनि राज।
जयति राहु अरु केतु ग्रह, करहु अनुग्रह आज॥
सूर्य, चंद्रमा, मंगल (भौम), बुध, गुरु (बृहस्पति), भृगु (शुक्र) और राजा शनि की जय हो। राहु और केतु ग्रह की भी जय हो। आज (मुझ पर) कृपा कीजिए।
- चौपाई 1
प्रथमहि रवि कहँ नावौं माथा।
करहु कृपा जन जानि अनाथा॥
(सूर्य की स्तुति) सबसे पहले मैं सूर्य (रवि) को माथा नवाता हूँ। मुझे अपना असहाय सेवक जानकर कृपा कीजिए।
- चौपाई 2
हे आदित्य दिवाकर भानू।
मैं मति मन्द महा अज्ञानू॥
हे आदित्य, हे दिवाकर, हे भानु! मैं मंदबुद्धि और बहुत अज्ञानी हूँ।
- चौपाई 3
अब निज जन कहँ हरहु कलेशा।
दिनकर द्वादश रूप दिनेशा॥
हे दिनकर, बारह रूपों वाले (द्वादश आदित्य) दिनेश, अब अपने इस भक्त के कष्ट हर लीजिए।
- चौपाई 4
नमो भास्कर सूर्य प्रभाकर।
अर्क मित्र अघ ओघ क्षमाकर॥
हे भास्कर, सूर्य, प्रभाकर, अर्क और मित्र, आपको नमस्कार। आप पापों के समूह को क्षमा करने वाले हैं।
- चौपाई 5
शशि मयंक रजनीपति स्वामी।
चन्द्र कलानिधि नमो नमामी॥
(चंद्रमा की स्तुति) हे शशि, मयंक, रजनीपति (रात्रि के स्वामी), चंद्र, कलानिधि, आपको बार-बार नमस्कार है।
- चौपाई 6
राकापति हिमांशु राकेशा।
प्रणवत जन तन हरहु कलेशा॥
हे राकापति (पूर्णिमा के स्वामी), हिमांशु (शीतल किरणों वाले), राकेश! प्रणाम करते इस भक्त के तन के कष्ट हर लीजिए।
- चौपाई 7
सोम इन्दु विधु शान्ति सुधाकर।
शीत रश्मि औषधि निशाकर॥
आप सोम, इंदु, विधु, शांति देने वाले सुधाकर (अमृत की खान), शीतल किरणों वाले, औषधियों के स्वामी और निशाकर (रात बनाने वाले) हैं।
- चौपाई 8
तुमहीं शोभित भाल महेशा।
शरण शरण जन हरहु कलेशा॥
आप ही महेश (शिव) के माथे पर शोभित हैं। मैं आपकी शरण में हूँ, शरण में हूँ; इस भक्त के कष्ट हर लीजिए।
- चौपाई 9
जय जय जय मंगल सुखदाता।
लोहित भौमादिक विख्याता॥
(मंगल की स्तुति) सुख देने वाले मंगल, आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप लोहित, भौम आदि नामों से प्रसिद्ध हैं।
- चौपाई 10
अंगारक कुज रुज ऋणहारी।
करहु दया यही विनय हमारी॥
हे अंगारक, कुज, रोग और ऋण हरने वाले! मेरी यही विनती है कि दया कीजिए।
- चौपाई 11
हे महिसुत छितिसुत सुखराशी।
लोहितांग जय जन अघनाशी॥
हे पृथ्वी के पुत्र (महिसुत, छितिसुत), सुख के भंडार, लाल शरीर वाले (लोहितांग), भक्तों के पाप नष्ट करने वाले, आपकी जय हो।
- चौपाई 12
अगम अमंगल अब हर लीजै।
सकल मनोरथ पूरण कीजै॥
अब कठिन अमंगल को हर लीजिए और सब मनोरथ पूरे कीजिए।
- चौपाई 13
जय शशि नन्दन बुध महाराजा।
करहु सकल जन कहँ शुभ काजा॥
(बुध की स्तुति) चंद्रमा के पुत्र बुध महाराज, आपकी जय हो। सब लोगों के काम शुभ कीजिए।
- चौपाई 14
दीजै बुद्धि बल सुमति सुजाना।
कठिन कष्ट हरि करि कल्याना॥
हे सुजान (ज्ञानी), बुद्धि, बल और अच्छी मति दीजिए; कठिन कष्ट हरकर कल्याण कीजिए।
- चौपाई 15
हे तारासुत रोहिणी नन्दन।
चन्द्रसुवन दुख द्वन्द्व निकन्दन॥
हे तारा के पुत्र, रोहिणी-नंदन, चंद्रमा के पुत्र, दुख और द्वंद्व (मन की उलझन) मिटाने वाले!
- चौपाई 16
पूजहु आस दास कहँ स्वामी।
प्रणत पाल प्रभु नमो नमामी॥
हे स्वामी, इस दास की आशा पूरी कीजिए। शरण में आए की रक्षा करने वाले प्रभु, आपको बार-बार नमस्कार।
- चौपाई 17
जयति जयति जय श्री गुरुदेवा।
करौं सदा तुम्हरी प्रभु सेवा॥
(बृहस्पति की स्तुति) हे श्री गुरुदेव, आपकी जय हो, जय हो। हे प्रभु, मैं सदा आपकी सेवा करूँ।
- चौपाई 18
देवाचार्य देव गुरु ज्ञानी।
इन्द्र पुरोहित विद्यादानी॥
आप देवताओं के आचार्य, ज्ञानी देवगुरु, इंद्र के पुरोहित और विद्या देने वाले हैं।
- चौपाई 19
वाचस्पति वागीश उदारा।
जीव बृहस्पति नाम तुम्हारा॥
आप वाचस्पति, वागीश (वाणी के स्वामी) और उदार हैं। जीव और बृहस्पति आपके नाम हैं।
- चौपाई 20
विद्या सिन्धु अंगिरा नामा।
करहु सकल विधि पूरण कामा॥
आप विद्या के सागर हैं और अंगिरा (के पुत्र) के नाम से जाने जाते हैं। हर प्रकार से मेरे काम पूरे कीजिए।
- चौपाई 21
शुक्र देव पद तल जल जाता।
दास निरन्तर ध्यान लगाता॥
(शुक्र की स्तुति) हे शुक्रदेव, आपके कमल (जलजात) जैसे चरणों का यह दास निरंतर ध्यान करता है।
- चौपाई 22
हे उशना भार्गव भृगुनन्दन।
दैत्य पुरोहित दुष्ट निकन्दन॥
हे उशना, भार्गव, भृगु के पुत्र, दैत्यों के पुरोहित और दुष्टों का नाश करने वाले!
- चौपाई 23
भृगुकुल भूषण दूषण हारी।
हरहु नेष्ट ग्रह करहु सुखारी॥
हे भृगु कुल के आभूषण, दोषों को हरने वाले! (भक्त प्रार्थना करता है:) अनिष्ट ग्रह (का प्रभाव) हरकर सुखी कीजिए।
- चौपाई 24
तुहि द्विजवर जोशी सिरताजा।
नर शरीर के तुमहीं राजा॥
आप श्रेष्ठ ब्राह्मण और ज्योतिषियों के सिरताज हैं। चालीसा आपको मनुष्य-शरीर का राजा कहती है।
- चौपाई 25
जय श्री शनिदेव रवि नन्दन।
जय कृष्णो सौरी जगवन्दन॥
(शनि की स्तुति) सूर्य के पुत्र श्री शनिदेव, आपकी जय हो। श्याम वर्ण वाले (कृष्ण), सौरि (सूर्यपुत्र), जगत से वंदित, आपकी जय हो।
- चौपाई 26
पिंगल मन्द रौद्र यम नामा।
बभ्रु आदि कोणस्थ ललामा॥
पिंगल, मंद, रौद्र, यम, बभ्रु और सुंदर कोणस्थ आदि आपके नाम हैं।
- चौपाई 27
वक्र दृष्टि पिप्पल तन साजा।
क्षण महँ करत रंक क्षण राजा॥
वक्र दृष्टि वाले, पीपल से शोभित शनिदेव, चालीसा कहती है कि आप क्षण भर में किसी को रंक और क्षण भर में राजा बना देते हैं।
- चौपाई 28
ललत स्वर्ण पद करत निहाला।
हरहु विपत्ति छाया के लाला॥
आप सोने जैसा सुंदर पद देकर निहाल कर देते हैं। हे छाया के लाल (पुत्र), विपत्ति हर लीजिए।
- चौपाई 29
जय जय राहु गगन प्रविसइया।
तुमहीं चन्द्र आदित्य ग्रसइया॥
(राहु की स्तुति) आकाश में प्रवेश करने वाले राहु, आपकी जय हो। आप ही चंद्रमा और सूर्य को ग्रसते हैं (ग्रहण की पौराणिक कथा)।
- चौपाई 30
रवि शशि अरि स्वर्भानु धारा।
शिखी आदि बहु नाम तुम्हारा॥
आप सूर्य और चंद्रमा के शत्रु हैं और स्वर्भानु नाम धारण करते हैं। शिखी आदि आपके बहुत से नाम हैं।
- चौपाई 31
सैंहिकेय तुम निशाचर राजा।
अर्धकाय जग राखहु लाजा॥
आप सिंहिका के पुत्र (सैंहिकेय), निशाचरों के राजा और आधे शरीर वाले (अर्धकाय) हैं। संसार की लाज रखिए।
- चौपाई 32
यदि ग्रह समय पाय कहिं आवहु।
सदा शान्ति और सुख उपजावहु॥
(भक्त विनती करता है:) यदि अपना समय पाकर आप कहीं आएँ, तो सदा शांति और सुख ही उपजाइए।
- चौपाई 33
जय श्री केतु कठिन दुखहारी।
करहु सुजन हित मंगलकारी॥
(केतु की स्तुति) कठिन दुख हरने वाले श्री केतु, आपकी जय हो। सज्जनों के हित के लिए मंगल कीजिए।
- चौपाई 34
ध्वजयुत रुण्ड रूप विकराला।
घोर रौद्रतन अघमन काला॥
आप ध्वजा धारण किए, बिना सिर वाले धड़ (रुंड) के विकराल रूप वाले हैं; आपका शरीर घोर, रौद्र और काला है।
- चौपाई 35
शिखी तारिका ग्रह बलवाना।
महा प्रताप न तेज ठिकाना॥
आप शिखी (शिखा वाले तारे, पुच्छल तारे जैसे) बलवान ग्रह हैं। आपका प्रताप महान है और तेज की कोई सीमा नहीं।
- चौपाई 36
वाहन मीन महा शुभकारी।
दीजै शान्ति दया उर धारी॥
मछली (मीन) आपका वाहन है, आप बड़ा शुभ करने वाले हैं। हृदय में दया धारण करके शांति दीजिए।
- चौपाई 37
तीरथराज प्रयाग सुपासा।
बसै राम के सुन्दर दासा॥
(नवग्रह शांति का फल) तीर्थराज प्रयाग के पास राम के सेवक सुंदरदास रहते हैं।
- चौपाई 38
ककरा ग्रामहिं पुरे-तिवारी।
दुर्वासाश्रम जन दुख हारी॥
(वे) ककरा गाँव के पुरे-तिवारी में रहते हैं, जहाँ लोगों के दुख हरने वाला दुर्वासा ऋषि का आश्रम है।
- चौपाई 39
नव-ग्रह शान्ति लिख्यो सुख हेतु।
जन तन कष्ट उतारण सेतू॥
यह ‘नवग्रह शांति’ (स्तुति) लोगों के सुख के लिए लिखी गई है; कवि इसे लोगों के कष्टों से पार उतारने वाला पुल कहते हैं।
- चौपाई 40
जो नित पाठ करै चित लावै।
सब सुख भोगि परम पद पावै॥
चालीसा कहती है कि जो मन लगाकर प्रतिदिन इसका पाठ करता है, वह सब सुख भोगकर परमपद पाता है।
- समापन दोहा 1
धन्य नवग्रह देव प्रभु, महिमा अगम अपार।
चित नव मंगल मोद गृह, जगत जनन सुखद्वार॥
हे नवग्रह देव, हे प्रभु, आप धन्य हैं; आपकी महिमा अगम और अपार है। आप मन में नए मंगल और आनंद के घर और जगत के लोगों के लिए सुख के द्वार हैं।
- समापन दोहा 2
यह चालीसा नवो ग्रह, विरचित सुन्दरदास।
पढ़त प्रेम युत बढ़त सुख, सर्वानन्द हुलास॥
नौ ग्रहों की यह चालीसा सुंदरदास ने रची है। कवि कहते हैं कि प्रेम से इसे पढ़ने पर सुख और हर प्रकार का आनंद बढ़ता है।
यहाँ रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार के ‘51 चालीसा संग्रह’ (छपी पुस्तक) के पाठ को आधार बनाया गया है, और उसे दो और छपी पुस्तकों (रामा पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली का ‘बृहद् शनि महिमा ग्रंथ’ और ओंकारनाथ शास्त्री की ‘विजयेश्वर नित्य नियम विधि’) तथा द्रिक पंचांग और भक्ति भारत के पाठ से मिलाया गया है। रणधीर की पुस्तक में चंद्रमा की स्तुति की चारों चौपाइयाँ छूट गई हैं; वे बाकी स्रोतों से ली गई हैं। दोनों दूसरी पुस्तकें कई जगह एक जैसा अलग पाठ देती हैं। जहाँ रणधीर का पाठ स्पष्ट रूप से गलत है, वहाँ उनका पाठ लिया गया है: दूसरे दोहे में ‘शशि सोम’ की जगह ‘शशि भौम’ (नहीं तो चंद्रमा दो बार आता है और मंगल छूट जाता है); चौपाई 1 में ‘जनि जानि’ की जगह ‘जन जानि’; चौपाई 4 में ‘अघ मोघ’ की जगह ‘अघ ओघ’ (पापों का समूह); चौपाई 18 में ‘देवाचार्य तुम देव गुरु ज्ञानी’ की जगह ‘देवाचार्य देव गुरु ज्ञानी’ (छंद के लिए); और चौपाई 26 में ‘वप्र आदि’ की जगह ‘बभ्रु आदि’ (‘बभ्रु’ शनि का एक नाम है, जो प्रचलित शनि स्तोत्र ‘कोणस्थः पिङ्गलो बभ्रुः…’ में भी आता है)। उन पुस्तकों के बाकी पाठभेद: पहले दोहे में ‘शारद होहु सहाय’; चौपाई 6 में ‘जन नित’; चौपाई 10 में ‘दया करहु यहि विनय हमारी’; चौपाई 12 में ‘मम हर लीजै’; चौपाई 14 में ‘दीजै बुद्धि सुमति बल ज्ञाना’; चौपाई 15 में ‘दुःख दूरि निकन्दन’; चौपाई 21 में ‘शुक्रदेव तव पद जल जाता’; चौपाई 24 में ‘तुहि पण्डित जोषी द्विजराजा, तुम्हरे रहत सहत सब काजा’; चौपाई 28 में ‘करहु विजय’; चौपाई 33 में ‘जय जय केतु… निज जन हेतु सुमंगलकारी’; अंतिम दोहों में ‘नित नव मंगल’ और ‘नवहु ग्रह’। द्रिक पंचांग की चौपाई 8 में एक शब्द अधिक है (‘शोभित सुन्दर भाल’)।