चालीसासूर्य

सूर्य चालीसा

रचना: परंपरागत

परंपरा में: रविवार

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 4 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंदिर में संध्या आरती: पुजारी के हाथ में पाँच बत्ती वाला पीतल का दीपक, पीछे सजी प्रतिमाएँ और हाथ जोड़े भक्त
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. दोहा

    कनक बदन कुण्डल मकर, मुक्ता माला अङ्ग। पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के सङ्ग॥

    सोने जैसे मुख वाले, मकर के आकार के कुंडल और अंगों पर मोतियों की माला धारण किए, कमल के आसन पर बैठे, शंख और चक्र लिए हुए सूर्य देव का ध्यान कीजिए।

  2. चौपाई 1

    जय सविता जय जयति दिवाकर। सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर॥

    हे सविता, हे दिवाकर, आपकी जय हो। आप हज़ार किरणों वाले (सहस्रांशु), सात घोड़ों वाले (सप्ताश्व) और अंधकार हरने वाले हैं।

  3. चौपाई 2

    भानु पतंग मरीची भास्कर। सविता हंस सुनूर विभाकर॥

    आप भानु, पतंग, मरीची, भास्कर, सविता, हंस, सुनूर और विभाकर हैं। (ये सूर्य के नाम और विशेषण हैं।)

  4. चौपाई 3

    विवस्वान आदित्य विकर्तन। मार्तण्ड हरिरूप विरोचन॥

    आप विवस्वान, आदित्य, विकर्तन, मार्तंड, हरिरूप और विरोचन हैं।

  5. चौपाई 4

    अम्बरमणि खग रवि कहलाते। वेद हिरण्यगर्भ कह गाते॥

    आप अंबरमणि (आकाश के रत्न), खग और रवि कहलाते हैं; वेद आपको हिरण्यगर्भ कहकर गाते हैं।

  6. चौपाई 5

    सहस्रांशु प्रद्योतन कहि कहि। मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि॥

    आपको सहस्रांशु और प्रद्योतन कह-कहकर मुनिगण प्रसन्न होते हैं और आनंद पाते हैं।

  7. चौपाई 6

    अरुण सदृश सारथी मनोहर। हाँकत हय साता चढ़ि रथ पर॥

    अरुण जैसे मनोहर सारथी रथ पर चढ़कर सातों घोड़ों को हाँकते हैं।

  8. चौपाई 7

    मंडल की महिमा अति न्यारी। तेज रूप केरी बलिहारी॥

    आपके (सूर्य-)मंडल की महिमा बहुत निराली है; आपके तेजस्वी रूप पर मैं बलिहारी जाता हूँ।

  9. चौपाई 8

    उच्चैःश्रवा सदृश हय जोते। देखि पुरंदर लज्जित होते॥

    रथ में उच्चैःश्रवा जैसे घोड़े जुते हैं, जिन्हें देखकर इंद्र (पुरंदर) भी लज्जित होते हैं।

  10. चौपाई 9

    मित्र मरीचि भानु अरुण भास्कर। सविता सूर्य अर्क खग कलिकर॥

    मित्र, मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर, सविता, सूर्य, अर्क, खग, कलिकर,

  11. चौपाई 10

    पूषा रवि आदित्य नाम लै। हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै॥

    पूषा, रवि और आदित्य: ये नाम लेकर, और ‘हिरण्यगर्भाय नमः’ कहकर,

  12. चौपाई 11

    द्वादस नाम प्रेम सों गावैं। मस्तक बारह बार नवावैं॥

    जो इन बारह नामों को प्रेम से गाते हैं और बारह बार सिर झुकाते हैं,

  13. चौपाई 12

    चार पदारथ सो जन पावै। दुःख दारिद्र अघ पुंज नसावै॥

    चालीसा कहती है कि वे चारों पदार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) पाते हैं, और उनके दुःख, दरिद्रता और पापों के ढेर नष्ट होते हैं।

  14. चौपाई 13

    नमस्कार को चमत्कार यह। विधि हरिहर को कृपासार यह॥

    यह नमस्कार का चमत्कार है; यह ब्रह्मा, विष्णु और शिव की कृपा का सार है।

  15. चौपाई 14

    सेवै भानु तुमहिं मन लाई। अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई॥

    हे भानु, जो मन लगाकर आपकी सेवा करता है, चालीसा के अनुसार वह आठ सिद्धियाँ और नौ निधियाँ पाता है।

  16. चौपाई 15

    बारह नाम उच्चारन करते। सहस जनम के पातक टरते॥

    चालीसा कहती है कि बारह नामों का उच्चारण करने से हज़ार जन्मों के पाप टल जाते हैं।

  17. चौपाई 16

    उपाख्यान जो करते तवजन। रिपु सों जमलहते सोतेहि छन॥

    आपके जो भक्त आपकी कथा (उपाख्यान) कहते हैं, चालीसा के अनुसार उनके शत्रु उसी क्षण यम को प्राप्त होते हैं। (दूसरी पंक्ति का शब्द-विभाजन स्पष्ट नहीं है; ‘जम लहते सो तेहि छन’ पढ़ने पर यह अर्थ बनता है।)

  18. चौपाई 17

    धन सुत जुत परिवार बढ़तु है। प्रबल मोह को फंद कटतु है॥

    चालीसा के अनुसार धन और संतान सहित परिवार बढ़ता है, और मोह का मज़बूत फंदा कट जाता है।

  19. चौपाई 18

    अर्क शीश को रक्षा करते। रवि ललाट पर नित्य बिहरते॥

    अर्क सिर की रक्षा करते हैं और रवि माथे पर सदा विराजते हैं। (यहाँ से चौपाई 28 तक सूर्य के नामों का कवच है।)

  20. चौपाई 19

    सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत। कर्ण देस पर दिनकर छाजत॥

    सूर्य नेत्रों पर सदा विराजते हैं, और दिनकर कानों पर शोभित हैं।

  21. चौपाई 20

    भानु नासिका वास करहु नित। भास्कर करत सदा मुख को हित॥

    हे भानु, नाक में सदा वास कीजिए; भास्कर सदा मुख का हित करते हैं।

  22. चौपाई 21

    ओंठ रहैं पर्जन्य हमारे। रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे॥

    पर्जन्य हमारे होंठों पर रहें, और प्रिय तीक्ष्ण जीभ में बसें।

  23. चौपाई 22

    कंठ सुवर्ण रेत की शोभा। तिग्म तेजसः कांधे लोभा॥

    कंठ में सुवर्णरेता की शोभा हो, और तिग्मतेजा कंधों पर शोभित हों।

  24. चौपाई 23

    पूषां बाहू मित्र पीठहिं पर। त्वष्टा वरुण रहत सुउष्णकर॥

    पूषा भुजाओं पर और मित्र पीठ पर रहें; त्वष्टा, वरुण और गरमी देने वाले (उष्णकर) भी साथ रहें।

  25. चौपाई 24

    युगल हाथ पर रक्षा कारन। भानुमान उरसर्म सुउदरचन॥

    दोनों हाथों की रक्षा के लिए, और छाती तथा पेट की रक्षा के लिए, भानुमान रहें। (इस पंक्ति के कुछ शब्द अस्पष्ट हैं।)

  26. चौपाई 25

    बसत नाभि आदित्य मनोहर। कटि मंह हंस रहत मन मुदभर॥

    मनोहर आदित्य नाभि में बसते हैं, और हंस कमर में आनंद से रहते हैं।

  27. चौपाई 26

    जंघा गोपति सविता बासा। गुप्त दिवाकर करत हुलासा॥

    जाँघों पर गोपति और सविता का वास है, और गुप्त अंगों पर दिवाकर आनंद से रहते हैं।

  28. चौपाई 27

    विवस्वान पद की रखवारी। बाहर बसते नित तम हारी॥

    विवस्वान पैरों की रखवाली करते हैं, और अंधकार हरने वाले (सूर्य) बाहर भी सदा रहते हैं।

  29. चौपाई 28

    सहस्रांशु सर्वांग सम्हारै। रक्षा कवच विचित्र विचारे॥

    सहस्रांशु सारे अंगों को सँभालते हैं। ऐसा यह रक्षा का अद्भुत कवच है।

  30. चौपाई 29

    अस जोजन अपने मन माहीं। भय जग बीच करहुं तेहि नाहीं॥

    चालीसा कहती है कि जो व्यक्ति अपने मन में ऐसा (कवच) धारण करता है, उसे संसार में कोई भय नहीं होता।

  31. चौपाई 30

    दरिद्र कुष्ठ तेहि कबहुँ न व्यापै। जोजन याको मन मंह जापै॥

    चालीसा कहती है कि जो इसे मन में जपता है, उसे दरिद्रता और कुष्ठ कभी नहीं सताते।

  32. चौपाई 31

    अंधकार जग का जो हरता। नव प्रकाश से आनन्द भरता॥

    जो जगत का अंधकार हरते हैं और नए प्रकाश से आनंद भर देते हैं,

  33. चौपाई 32

    ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही। कोटि बार मैं प्रनवौं ताही॥

    जिन्हें ग्रहों के समूह भी ग्रसकर मिटा नहीं पाते, उन्हें मैं करोड़ों बार प्रणाम करता हूँ।

  34. चौपाई 33

    मंद सदृश सुत जग में जाके। धर्मराज सम अद्भुत बाँके॥

    जिनके पुत्र जगत में मंद (शनि) और धर्मराज (यम) जैसे अद्भुत और बाँके हैं।

  35. चौपाई 34

    धन्य धन्य तुम दिनमनि देवा। किया करत सुरमुनि नर सेवा॥

    हे दिनमणि देव (दिन के रत्न), आप धन्य हैं; देवता, मुनि और मनुष्य आपकी सेवा करते हैं।

  36. चौपाई 35

    भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों। दूर हटत सो भव के भ्रम सों॥

    जो भक्ति-भाव से और पूरे नियम से आपकी उपासना करता है, वह संसार के भ्रम से दूर हो जाता है।

  37. चौपाई 36

    परम धन्य सो नर तनधारी। हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी॥

    वह देहधारी मनुष्य परम धन्य है, जिस पर अंधकार हरने वाले (सूर्य) प्रसन्न हैं।

  38. चौपाई 37

    अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन। मधु वेदांग नाम रवि उदयन॥

    माघ में सूर्य अरुण नाम से, फाल्गुन में सूर्य नाम से, और मधु (चैत्र) मास में वेदांग नाम से उदय होते हैं।

  39. चौपाई 38

    भानु उदय बैसाख गिनावै। ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै॥

    बैसाख में उनका उदय भानु नाम से गिना जाता है; ज्येष्ठ में इंद्र और आषाढ़ में रवि नाम गाया जाता है।

  40. चौपाई 39

    यम भादों आश्विन हिमरेता। कातिक होत दिवाकर नेता॥

    भादों में यम, आश्विन में हिमरेता, और कार्तिक में दिवाकर नाम से सूर्य अग्रणी होते हैं।

  41. चौपाई 40

    अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं। पुरुष नाम रवि हैं मलमासहिं॥

    अगहन में ‘भिन्न’ नाम है, पूस में विष्णु, और मलमास (अधिक मास) में सूर्य का नाम पुरुष है। (सावन का नाम इन पंक्तियों में नहीं आता।)

  42. समापन दोहा

    भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य। सुख सम्पत्ति लहि बिबिध, होंहिं सदा कृतकृत्य॥

    दोहा कहता है कि जो लोग प्रेम से प्रतिदिन यह भानु (सूर्य) चालीसा गाते हैं, वे अनेक प्रकार के सुख और संपत्ति पाकर सदा कृतार्थ होते हैं।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/surya-chalisa/

संक्षेप में

सूर्य चालीसा सूर्य देव की स्तुति है, जो ‘जय सविता जय जयति दिवाकर’ से शुरू होती है। इसमें दो दोहे और चालीस चौपाइयाँ हैं। इसमें सूर्य के अनेक नाम, बारह नामों से नमस्कार, शरीर के हर अंग की रक्षा के लिए नामों का कवच, और बारह महीनों के सूर्य के नाम हैं। परंपरा में रविवार, मकर संक्रांति और छठ पर इसका पाठ होता है।

यह पाठ रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार के छपे ‘51 चालीसा संग्रह’ से मिलाया गया है। द्रिक पंचांग और भक्ति भारत का पाठ आपस में लगभग अक्षरशः एक है, इसलिए उसे एक स्रोत-परिवार गिना गया; जहाँ वह छपी पुस्तक से अलग है, वहाँ छपी पुस्तक का पाठ लिया गया, सिवाय स्पष्ट छापे की भूल के। पाठभेद: चौपाई 12 में वेबसाइटें ‘चार पदारथ जन सो पावै’ पढ़ती हैं; चौपाई 25 में वेबसाइटों पर ‘हंस’ शब्द नहीं है (‘कटिमंह, रहत मन मुदभर’), जबकि छपी पुस्तक में ‘कटि मंह हंस’ है, जिससे पंक्ति पूरी होती है; चौपाई 30 में वेबसाइटें ‘दरिद्र’ की जगह ‘दद्रु’ (दाद) पढ़ती हैं; चौपाई 36 में वेबसाइटों पर ‘सो’ की जगह ‘सों’ है; चौपाई 37 में छपी पुस्तक में ‘मध’ छपा है, जो ‘मधु’ (चैत्र मास का नाम) की भूल लगती है, इसलिए ‘मधु’ लिया गया। छपी पुस्तक चौपाई 9 और 10 के नामों पर 1 से 12 तक अंक देती है और उन्हें तीन पंक्तियों में छापती है। चौपाई 16 और 24 के कुछ शब्द सभी स्रोतों में अस्पष्ट हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सूर्य चालीसा में सूर्य के बारह नाम कौन-से हैं?

चौपाई 9 और 10 में नाम गिनाए गए हैं: मित्र, मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर, सविता, सूर्य, अर्क, खग, कलिकर, पूषा, रवि और आदित्य, और अंत में ‘हिरण्यगर्भाय नमः’। चौपाई 11 इन्हें ‘द्वादस नाम’ (बारह नाम) कहती है और बारह बार सिर झुकाने की बात कहती है। छपे संग्रह में इन नामों पर 1 से 12 तक अंक दिए गए हैं।

चौपाई 18 से 28 में क्या है?

यह एक छोटा कवच है: सिर, माथा, आँखें, कान, नाक, मुख, होंठ, जीभ, कंठ, कंधे, भुजाएँ, पीठ, हाथ, नाभि, कमर, जाँघें और पैर, हर अंग के लिए सूर्य का एक नाम लिया गया है, और अंत में सहस्रांशु से पूरे शरीर की रक्षा माँगी गई है।

चौपाई 37 से 40 में महीनों के नाम क्यों हैं?

इन पंक्तियों में बताया गया है कि हर महीने सूर्य किस नाम से उदय होते हैं: माघ में अरुण, फाल्गुन में सूर्य, मधु (चैत्र) में वेदांग, बैसाख में भानु, ज्येष्ठ में इंद्र, आषाढ़ में रवि, भादों में यम, आश्विन में हिमरेता, कार्तिक में दिवाकर, अगहन में भिन्न, पूस में विष्णु और मलमास में पुरुष। सावन का नाम इनमें नहीं आता।

सूर्य चालीसा का पाठ कब किया जाता है?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में रविवार को, मकर संक्रांति पर और छठ पर्व पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है।

सूर्य चालीसा किसने लिखी?

रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है; जिन स्रोतों से पाठ मिलाया गया, उनमें से किसी में नाम नहीं दिया गया।

स्रोत

  1. परंपरागत पाठ
  2. रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार: ‘51 चालीसा संग्रह’, आरतियों सहित (दो स्कैन प्रतियाँ: प्रथम संस्करण 2000, और 2004)
  3. द्रिक पंचांग: सूर्य देव चालीसा
  4. भक्ति भारत: श्री सूर्य देव चालीसा

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