कालीकुल शाक्त परंपरा की वह धारा है जो देवी की उपासना उनके उग्र रूपों में, सबसे बढ़कर काली के रूप में, करती है, और काली, तारा आदि दस महाविद्याओं को विशेष स्थान देती है। शाक्त तंत्र-परंपरा देवी-उपासकों को श्रीकुल (ललिता त्रिपुरसुंदरी के सौम्य रूप की उपासना) और कालीकुल में बाँटकर देखती है; यह परंपरा का वर्गीकरण है, कोई एक संगठन नहीं। कालीकुल पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, ओडिशा, मिथिला और नेपाल में विशेष रूप से प्रचलित है; कोलकाता का कालीघाट और दक्षिणेश्वर और बीरभूम का तारापीठ इसके प्रसिद्ध केंद्र हैं, और बंगाल में दीपावली की अमावस्या की रात होने वाली काली पूजा, दुर्गा पूजा के साथ, सबसे बड़े देवी-उत्सवों में है।
- दस महाविद्याएँ
- काली, तारा, षोडशी (त्रिपुरसुंदरी), भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला (प्रचलित सूची; ग्रंथों में अंतर)
- दर्शन
- शक्ति-अद्वैत: शक्ति ही ब्रह्म है, और शिव और शक्ति अंततः एक
- ग्रंथ और कवि
- शाक्त तंत्र; 16वीं सदी के कृष्णानंद आगमवागीश का तंत्रसार; रामप्रसाद सेन (1720–1781) और कमलाकांत के काली-भक्ति गीत (श्यामा संगीत)
- क्षेत्र
- पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, ओडिशा, मिथिला, नेपाल; केरल में भी काली की उपासना लोकप्रिय
- संत
- रामप्रसाद सेन, रामकृष्ण परमहंस (दक्षिणेश्वर), बामाखेपा (तारापीठ)
कालीकुल क्या है
तेउन गौद्रियान के अनुसार कौल परंपरा में उपासना सिद्धांततः इस आधार पर तीन भागों में बँटती है कि श्री (त्रिपुरा), काली या तारा में से कौन-सी शक्ति परम मानी जाती है; बंगाल में काली और तारा का भेद लगभग मिट गया है और काली ही मुख्य देवी हैं। आज का प्रासंगिक बँटवारा श्रीकुल और कालीकुल का है: श्रीकुल देवी के सौम्य, सुंदर पक्ष पर केंद्रित है और कालीकुल उनके भयावह रूप पर। गौद्रियान लिखते हैं कि कालीकुल की तांत्रिक साधना के असामान्य विधान उसे आज गृहस्थ के लिए कठिन बनाते हैं।
जून मैकडैनियल के अनुसार बंगाल में शास्त्रीय शाक्त तंत्र को ही परंपरागत रूप से कालीकुल, यानी काली का वंश, कहा जाता है; यह कौल तंत्र-परंपरा का अंग है और महादेवी और महाविद्याओं की उपासना करता है। एक बंगाली साधक ने उन्हें बताया कि उत्तर का कालीकुल बंगाल, असम, बिहार और ओडिशा में है और दस महाविद्याओं, विशेषकर काली, तारा, छिन्नमस्ता और बगला, की उपासना करता है। मैकडैनियल नरेंद्रनाथ भट्टाचार्य को उद्धृत करते हैं कि कालीकुल के अनुयायी पूर्ण अद्वैतवादी हैं: उनके लिए शक्ति अपने सत्, चित् और आनंद रूप में ब्रह्म ही है।
संक्षिप्त इतिहास
मैकडैनियल के अनुसार इन परंपराओं की तिथि तय करना बहुत कठिन है, पर कालीकुल को प्रायः श्रीकुल से पुरानी परंपरा माना जाता है; वे गौद्रियान और संजुक्ता गुप्त को उद्धृत करती हैं कि कालीकुल साहित्य का आरंभ श्रीकुल से भी पहले तक खोजा जा सकता है। बंगाल में 16वीं सदी के कृष्णानंद आगमवागीश का तंत्रसार इस परंपरा का प्रमुख ग्रंथ है, जिसमें देवियों के ध्यान और पूजा-विधियाँ हैं।
18वीं सदी में रामप्रसाद सेन (1720–1781) ने काली को माँ के रूप में संबोधित करने वाले सरल, भावपूर्ण गीतों की परंपरा शुरू की, जिन्हें श्यामा संगीत कहते हैं; मैकडैनियल उन्हें नए शाक्त आंदोलन का मुख्य प्रवर्तक बताती हैं। 19वीं सदी में रामकृष्ण परमहंस कोलकाता के दक्षिणेश्वर के नए काली मंदिर के पुजारी बने; विकिपीडिया के अनुसार यह मंदिर रानी रासमणि ने बनवाया और 1855 में पूरा हुआ। तारापीठ के बामाखेपा भी बंगाल के प्रसिद्ध शाक्त संत माने जाते हैं।
विश्वास और साधना
मैकडैनियल के अनुसार शास्त्रीय शाक्त तंत्र में शक्ति परम देवता हैं, अपने साथी शिव से अभिन्न: दोनों एक ही नित्य ब्रह्म के दो पक्ष हैं, जैसे आग और उसकी गर्मी। शक्ति ने ही जगत रचा, वही उसका पालन और संहार करती हैं, और सब देवताओं की शक्ति उन्हीं से है। इसके दर्शन को शाक्ताद्वैतवाद भी कहा जाता है। यह परंपरा ध्यान के साथ विधि-पूर्वक कर्म (क्रिया) और मंत्र-साधना पर ज़ोर देती है, और पूजा में उपासक की देवी से एकता का भाव रखती है। विकिपीडिया के अनुसार रामकृष्ण कहते थे कि ब्रह्म और काली अलग नहीं, जैसे आग और उसकी जलाने की शक्ति अलग नहीं।
दस महाविद्याएँ इस परंपरा के केंद्र में हैं। किंसली के अनुसार प्रचलित सूची है: काली, तारा, षोडशी (त्रिपुरसुंदरी), भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला; पर मुंडमाला तंत्र की ही दो पांडुलिपियों में सूची अलग है, एक में दस और दूसरी में तेरह नाम हैं। किंसली लिखते हैं कि काली और तारा, दोनों श्मशान से जुड़ी हैं, और कालीघाट और तारापीठ, दोनों के मंदिर श्मशान के पास हैं।
बंगाल में काली पूजा दीपावली की अमावस्या की रात होती है (विकिपीडिया), और मैकडैनियल के अनुसार दुर्गा पूजा और काली पूजा पश्चिम बंगाल के दो सबसे बड़े उत्सव हैं, जिनमें सबसे भव्य प्रतिमाएँ और पंडाल बनते हैं।
प्रमुख केंद्र
किंसली के अनुसार काली का सबसे प्रसिद्ध मंदिर कोलकाता का कालीघाट है, और तारा का सबसे प्रसिद्ध स्थान बंगाल के बीरभूम ज़िले का तारापीठ; एक तंत्र-कथा असम के कामाख्या और बंगाल के तारापीठ को तारा-उपासना के प्रमुख केंद्र बताती है। दक्षिणेश्वर में देवी भवतारिणी (काली) की पूजा होती है और यह मंदिर रामकृष्ण से जुड़ा है। विकिपीडिया के अनुसार कालीकुल पश्चिम बंगाल, असम, केरल, मिथिला, ओडिशा और नेपाल में प्रचलित है, और पहले कश्मीर की कौल परंपरा में भी था।
स्रोतों में अंतर
- कुलों की गिनती: गौद्रियान श्री, काली और तारा, तीन कुल बताते हैं, जिनमें बंगाल में काली और तारा लगभग एक हो गए हैं; विकिपीडिया और मैकडैनियल दो मुख्य धाराएँ बताते हैं, दक्षिण का श्रीकुल और उत्तर-पूर्व का कालीकुल।
- कौन पुराना: मैकडैनियल कालीकुल को प्रायः पुरानी परंपरा मानी जाने वाली बताती हैं (गौद्रियान और गुप्त के आधार पर); गौद्रियान यह भी लिखते हैं कि श्री की उपासना सबसे पहले व्यवस्थित हुई।
- क्षेत्र: मैकडैनियल के साक्षी बंगाल, असम, बिहार और ओडिशा गिनाते हैं; विकिपीडिया पश्चिम बंगाल, असम, केरल, मिथिला, ओडिशा और नेपाल; गौद्रियान लिखते हैं कि काली केरल में भी लोकप्रिय हैं।
- महाविद्याओं की सूची: किंसली प्रचलित दस नाम देते हैं, पर बताते हैं कि मुंडमाला तंत्र की एक पांडुलिपि में तेरह नाम हैं, जिनमें अन्नपूर्णा, दुर्गा और पद्मावती भी हैं; क्रम भी ग्रंथ के साथ बदलता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कालीकुल क्या है?
शाक्त परंपरा की वह धारा जो देवी की उपासना उनके उग्र रूपों, सबसे बढ़कर काली और तारा, और दस महाविद्याओं के रूप में करती है। यह बंगाल, असम और पूर्वी भारत में विशेष रूप से प्रचलित है।
दस महाविद्याएँ कौन हैं?
प्रचलित सूची: काली, तारा, षोडशी (त्रिपुरसुंदरी), भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला। किंसली के अनुसार अलग-अलग तंत्रों में नाम और क्रम बदलते हैं।
काली पूजा कब होती है?
बंगाल, असम और ओडिशा में काली पूजा दीपावली की अमावस्या की रात होती है (विकिपीडिया)। मैकडैनियल के अनुसार दुर्गा पूजा के साथ यह पश्चिम बंगाल के दो सबसे बड़े उत्सवों में है।
कालीकुल और श्रीकुल में क्या अंतर है?
कालीकुल देवी के उग्र रूपों, काली, तारा और दस महाविद्याओं पर केंद्रित है और बंगाल, असम और पूर्वी भारत में प्रबल है; श्रीकुल उनके सौम्य रूप ललिता त्रिपुरसुंदरी पर केंद्रित है और दक्षिण भारत में प्रबल है। दोनों में देवी ही परम हैं; यह शाक्त परंपरा का अपना वर्गीकरण है।
कालीकुल के प्रमुख मंदिर कौन से हैं?
कोलकाता का कालीघाट, जिसे किंसली काली का सबसे प्रसिद्ध मंदिर बताते हैं; कोलकाता का दक्षिणेश्वर, जहाँ रामकृष्ण पुजारी थे; बीरभूम का तारापीठ, तारा का सबसे प्रसिद्ध स्थान; और असम का कामाख्या।
स्रोत
- जून मैकडैनियल, Offering Flowers, Feeding Skulls: Popular Goddess Worship in West Bengal (Oxford University Press, 2004), अध्याय 2 “Tantric and Yogic Shaktism” और अध्याय 3 “Shakta Bhakti” (archive.org)
- तेउन गौद्रियान, Hindu Tantrism (संजुक्ता गुप्त, डिर्क यान होन्स और तेउन गौद्रियान, ब्रिल, लाइडेन, 1979), भाग 1, अध्याय 1, पृ. 46 (archive.org)
- डेविड किंसली, Tantric Visions of the Divine Feminine: The Ten Mahāvidyās (University of California Press, 1997) (archive.org)
- डगलस रेनफ़्रू ब्रूक्स, The Secret of the Three Cities (University of Chicago Press, 1990), पृ. 15–16 (श्रीकुल और कालीकुल) (archive.org)
- विकिपीडिया (अंग्रेज़ी): “Shaktism” (Kalikula), “Kali”, “Mahavidya”, “Kalighat Temple”, “Dakshineswar Kali Temple”
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