चालीसादुर्गा

शाकम्भरी चालीसा

रचना: कान्ता प्रसाद, जगाधरी वासी (चालीसा में कवि की छाप के अनुसार)

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 5 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंदिर में संध्या आरती: पुजारी के हाथ में पाँच बत्ती वाला पीतल का दीपक, पीछे सजी प्रतिमाएँ और हाथ जोड़े भक्त
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. दोहा 1

    बन्दउ माँ शाकम्भरी चरणगुरु का धरकर ध्यान। शाकम्भरी माँ चालीसा का करे प्रख्यान॥

    गुरु के चरणों का ध्यान करके मैं माँ शाकम्भरी की वंदना करता हूँ और माँ शाकम्भरी की चालीसा का बखान करता हूँ।

  2. दोहा 2

    आनन्दमयी जगदम्बिका अनन्त रूप भण्डार। माँ शाकम्भरी की कृपा बनी रहे हर बार॥

    आनंद से भरी जगदम्बिका अनंत रूपों का भंडार हैं। माँ शाकम्भरी की कृपा सदा बनी रहे।

  3. चौपाई 1

    शाकम्भरी माँ अति सुखकारी। पूर्ण ब्रह्म सदा दुःख हारी॥

    माँ शाकम्भरी बहुत सुख देने वाली हैं। वे पूर्ण ब्रह्म हैं और सदा दुःख हरती हैं।

  4. चौपाई 2

    कारण करण जगत की दाता। आनन्द चेतन विश्व विधाता॥

    आप ही जगत का कारण और साधन हैं और सब कुछ देने वाली हैं। आप आनंद और चेतना हैं और विश्व को रचने वाली हैं।

  5. चौपाई 3

    अमर जोत है मात तुम्हारी। तुम ही सदा भगतन हितकारी॥

    हे माता, आपकी ज्योति अमर है। आप ही सदा भक्तों का भला करती हैं।

  6. चौपाई 4

    महिमा अमित अथाह अर्पणा। ब्रह्म हरि हर मात अर्पणा॥

    आपकी महिमा असीम और अथाह है। ब्रह्मा, विष्णु (हरि) और शिव (हर) भी माँ को अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं। (‘अर्पणा’ का यही अर्थ लगता है; एक स्रोत में यहाँ पार्वती का नाम ‘अपर्णा’ है।)

  7. चौपाई 5

    ज्ञान राशि हो दीन दयाली। शरणागत घर भरती खुशहाली॥

    आप ज्ञान का भंडार हैं और दीनों पर दया करती हैं। जो आपकी शरण में आते हैं, उनके घर आप खुशहाली से भर देती हैं।

  8. चौपाई 6

    नारायणी तुम ब्रह्म प्रकाशी। जल-थल-नभ हो अविनाशी॥

    आप नारायणी हैं और ब्रह्म को प्रकाशित करती हैं। जल, थल और आकाश में आप ही अविनाशी रूप में हैं।

  9. चौपाई 7

    कमल कान्तिमय शान्ति अनूपा। जोतमन मर्यादा जोत स्वरूपा॥

    आपकी कांति कमल जैसी है और आपकी शांति अनुपम है। आप ज्योति-स्वरूपा हैं। (‘जोतमन मर्यादा’ का सटीक अर्थ स्पष्ट नहीं है; भाव ज्योतिर्मय मन और मर्यादा का लगता है।)

  10. चौपाई 8

    जब-जब भक्तों ने है ध्याई। जोत अपनी प्रकट हो आई॥

    जब-जब भक्तों ने आपका ध्यान किया, तब-तब आपकी ज्योति प्रकट हो गई।

  11. चौपाई 9

    प्यारी बहन के संग विराजे। मात शताक्षी संग ही साजे॥

    आप अपनी प्यारी बहन के साथ विराजती हैं; माता शताक्षी आपके साथ ही शोभा पाती हैं। (दुर्गा सप्तशती, अध्याय 11 में देवी कहती हैं कि वे सौ नेत्रों से मुनियों को देखेंगी और ‘शताक्षी’ कहलाएँगी।)

  12. चौपाई 10

    भीम भयंकर रूप कराली। तीसरी बहन की जोत निराली॥

    तीसरी बहन भीमा का रूप भयंकर और विकराल है, और उनकी ज्योति अनोखी है। (दुर्गा सप्तशती, अध्याय 11 में देवी का ‘भीमा’ नाम भी आता है।)

  13. चौपाई 11

    चौथी बहिन भ्रामरी तेरी। अद्भुत चंचल चित्त चितेरी॥

    आपकी चौथी बहन भ्रामरी हैं, जो अद्भुत और चंचल हैं और मन को मोह लेती हैं। (सहारनपुर ज़िले के शाकम्भरी देवी मंदिर में शाकम्भरी, भीमा, भ्रामरी और शताक्षी की मूर्तियाँ हैं।)

  14. चौपाई 12

    सम्मुख भैरव वीर खड़ा है। दानव दल से खूब लड़ा है॥

    आपके सामने वीर भैरव खड़े हैं, जिन्होंने दानवों की सेना से डटकर युद्ध किया है।

  15. चौपाई 13

    शिव शंकर प्रभु भोले भण्डारी। सदा शाकम्भरी माँ का चेरा॥

    भोले भंडारी प्रभु शिव-शंकर भी सदा माँ शाकम्भरी के सेवक (चेरा) हैं। (एक स्रोत में यहाँ दो आधी पंक्तियाँ और हैं; नीचे पाठभेद देखें।)

  16. चौपाई 14

    हाथ ध्वजा हनुमान विराजे। युद्ध भूमि में माँ संग साजे॥

    हाथ में ध्वजा लिए हनुमान जी विराजते हैं, जो युद्धभूमि में माँ के साथ शोभा पाते हैं।

  17. चौपाई 15

    कालरात्रि धारे कराली। बहिन मात की अति विकराली॥

    माँ की बहन कालरात्रि कराल रूप धारण करती हैं; उनका रूप अत्यंत विकराल है।

  18. चौपाई 16

    दश विद्या नव दुर्गा आदि। ध्याते तुम्हें परमार्थ वादि॥

    दस महाविद्याएँ, नवदुर्गा आदि और परमार्थ की बात करने वाले ज्ञानी आपका ध्यान करते हैं।

  19. चौपाई 17

    अष्ट सिद्धि गणपति जी दाता। बाल रूप शरणागत माता॥

    आठों सिद्धियाँ देने वाले गणपति जी बाल रूप में माँ की शरण में रहते हैं।

  20. चौपाई 18

    माँ भण्डारे के रखवारी। प्रथम पूजने के अधिकारी॥

    वे माँ के भंडार के रखवाले हैं और सबसे पहले पूजे जाने के अधिकारी हैं।

  21. चौपाई 19

    जग की एक भ्रमण की कारण। शिव शक्ति हो दुष्ट विदारण॥

    आप ही संसार के चक्र की एकमात्र कारण हैं। आप शिव की शक्ति हैं और दुष्टों का नाश करती हैं।

  22. चौपाई 20

    भूरा देव लौकड़ा दूजा। जिसकी होती पहली पूजा॥

    दूसरे रक्षक (लौकड़ा) भूरा देव हैं, जिनकी पूजा सबसे पहले होती है। (सहारनपुर ज़िले के शाकम्भरी देवी मंदिर के पास भूरा देव (भैरव) का मंदिर है, जिन्हें देवी का रक्षक कहा जाता है; परंपरा में भक्त पहले भूरा देव के दर्शन करते हैं।)

  23. चौपाई 21

    बली बजरंगी तेरा चेरा। चले संग यश गाता तेरा॥

    बलवान बजरंगबली (हनुमान) आपके सेवक हैं, जो आपका यश गाते हुए आपके साथ चलते हैं।

  24. चौपाई 22

    पाँच कोस की खोल तुम्हारी। तेरी लीला अति विस्तारी॥

    पाँच कोस तक फैली घाटी (खोल) आपकी है, और आपकी लीला बहुत विस्तृत है।

  25. चौपाई 23

    रक्त दन्तिका तुम्हीं बनी हो। रक्त पान कर असुर हनी हो॥

    आप ही रक्तदंतिका बनीं और रक्त पीकर आपने असुरों को मारा। (दुर्गा सप्तशती, अध्याय 11 में देवी का ‘रक्तदन्तिका’ नाम आता है।)

  26. चौपाई 24

    रक्त बीज का नाश किया था। छिन्न मस्तिका रूप लिया था॥

    आपने रक्तबीज का नाश किया था और छिन्नमस्तिका (छिन्नमस्ता) का रूप धारण किया था। (रक्तबीज की कथा दुर्गा सप्तशती के अध्याय 8 में है।)

  27. चौपाई 25

    सिद्ध योगिनी सहस्या राजे। सात कुण्ड में आप विराजे॥

    हज़ारों सिद्ध योगिनियाँ आपके साथ शोभित हैं, और आप सात कुंडों में विराजती हैं। (‘सहस्या’ सभी स्रोतों में ऐसा ही छपा है; इसका अर्थ ‘सहस्र’, यानी हज़ारों, लगता है।)

  28. चौपाई 26

    रूप मराल का तुमने धारा। भोजन दे दे जन जन तारा॥

    आपने मराल (हंस) का रूप धारण किया और भोजन दे-देकर लोगों को बचाया।

  29. चौपाई 27

    शोक पात से मुनि जन तारे। शोक पात जन दुःख निवारे॥

    आपने ‘शोक पात’ से मुनियों को उबारा और लोगों के दुःख दूर किए। (सभी स्रोतों में ‘शोक पात’ छपा है; प्रसंग से यह ‘शाक-पात’, यानी साग और पत्तों की ओर संकेत लगता है। दुर्गा सप्तशती, अध्याय 11 के अनुसार अकाल में देवी ने शाक से संसार का पालन किया।)

  30. चौपाई 28

    भद्र काली कम्पलेश्वर आई। कान्त शिवा भगतन सुखदाई॥

    आप भद्रकाली के रूप में कम्पलेश्वर आईं। कवि कान्त कहते हैं कि शिवा (देवी) भक्तों को सुख देने वाली हैं। (कुछ स्रोतों में ‘कमलेश्वर’ है; यहाँ कौन-सा स्थान है, यह पक्का नहीं।)

  31. चौपाई 29

    भोग भण्डारा हलवा पूरी। ध्वजा नारियल तिलक सिंदूरी॥

    भोग और भंडारे में हलवा-पूरी, और ध्वजा, नारियल और सिंदूर का तिलक आपको चढ़ाया जाता है। (ये चढ़ावे लोक-परंपरा के हैं।)

  32. चौपाई 30

    लाल चुनरी लगती प्यारी। ये ही भेंट ले दुख निवारी॥

    आपको लाल चुनरी प्यारी लगती है। चालीसा कहती है कि यही भेंट लेकर आप दुःख दूर करती हैं।

  33. चौपाई 31

    अंधे को तुम नयन दिखाती। कोढ़ी काया सफल बनाती॥

    चालीसा कहती है कि आप अंधे को आँखें देती हैं और कोढ़ से पीड़ित शरीर को सफल (स्वस्थ) बनाती हैं।

  34. चौपाई 32

    बाँझन के घर बाल खिलाती। निर्धन को धन खूब दिलाती॥

    यह भी कहा गया है कि आप निःसंतान के घर बच्चे खिलाती हैं और निर्धन को भरपूर धन दिलाती हैं।

  35. चौपाई 33

    सुख दे दे भगत को तारे। साधु सज्जन काज संवारे॥

    आप सुख दे-देकर भक्तों को तारती हैं और साधु-सज्जनों के काम सँवारती हैं।

  36. चौपाई 34

    भूमण्डल से जोत प्रकाशी। शाकम्भरी माँ दुःख की नाशी॥

    आपकी ज्योति धरती पर प्रकाशित है। माँ शाकम्भरी दुःख का नाश करने वाली हैं।

  37. चौपाई 35

    मधुर मधुर मुस्कान तुम्हारी। जन्म जन्म पहचान हमारी॥

    आपकी मुस्कान बहुत मधुर है। आपसे हमारी पहचान जन्म-जन्म की है।

  38. चौपाई 36

    चरण कमल तेरे बलिहारी। जै जै जै जग जननी तुम्हारी॥

    मैं आपके चरण-कमलों पर न्योछावर हूँ। हे जगजननी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो।

  39. चौपाई 37

    कान्ता चालीसा अति सुखकारी। संकट दुःख दुविधा सब टारी॥

    कवि कान्ता की यह चालीसा बहुत सुख देने वाली है; चालीसा कहती है कि यह संकट, दुःख और दुविधा सब टाल देती है।

  40. चौपाई 38

    जो कोई जन चालीसा गावे। मात कृपा अति सुख पावे॥

    चालीसा कहती है कि जो कोई इसे गाता है, वह माँ की कृपा से बहुत सुख पाता है।

  41. चौपाई 39

    कान्ता प्रसाद जगाधरी वासी। भाव शाकम्भरी तत्व प्रकाशी॥

    जगाधरी के निवासी कान्ता प्रसाद ने इसमें माँ शाकम्भरी के तत्व का भाव प्रकट किया है। (यह कवि की छाप है।)

  42. चौपाई 40

    बार बार कहें कर जोरी। विनती सुन शाकम्भरी मोरी॥

    मैं हाथ जोड़कर बार-बार कहता हूँ: हे शाकम्भरी, मेरी विनती सुनिए।

  43. चौपाई 41

    मैं सेवक हूँ दास तुम्हारा। जननी करना भव निस्तारा॥

    मैं आपका सेवक और दास हूँ। हे जननी, मुझे संसार-सागर से पार कीजिए।

  44. चौपाई 42

    यह सौ बार पाठ करे कोई। मातु कृपा अधिकारी सोई॥

    चालीसा कहती है कि जो कोई इसका सौ बार पाठ करता है, वही माँ की कृपा का अधिकारी होता है।

  45. चौपाई 43

    संकट कष्ट को मात निवारे। शोक मोह शत्रुन संहारे॥

    माँ संकट और कष्ट दूर करती हैं, और शोक, मोह और शत्रुओं का नाश करती हैं।

  46. चौपाई 44

    निर्धन धन सुख सम्पत्ति पावे। श्रद्धा भक्ति से चालीसा गावे॥

    चालीसा कहती है कि जो श्रद्धा और भक्ति से इसे गाता है, वह निर्धन भी धन, सुख और संपत्ति पाता है।

  47. चौपाई 45

    नौ रात्रों तक दीप जगावे। सपरिवार मगन हो गावे॥

    चालीसा के अनुसार नौ रातों तक दीपक जलाकर परिवार सहित मगन होकर इसे गाना चाहिए।

  48. चौपाई 46

    प्रेम से पाठ करे मन लाई। कान्त शाकम्भरी अति सुखदाई॥

    कवि कान्त कहते हैं कि जो प्रेम से मन लगाकर पाठ करता है, उसके लिए माँ शाकम्भरी बहुत सुख देने वाली हैं।

  49. समापन दोहा 1

    दुर्गासुर संहारणि, करणि जग के काज। शाकम्भरी जननि शिवे, रखना मेरी लाज॥

    हे दुर्गम असुर का संहार करने वाली, जगत के काम करने वाली, हे शाकम्भरी जननी, हे शिवा, मेरी लाज रखना। (दुर्गा सप्तशती, अध्याय 11 में देवी कहती हैं कि उसी अवसर पर वे दुर्गम नाम के महान असुर को मारेंगी और ‘दुर्गा’ कहलाएँगी।)

  50. समापन दोहा 2

    युग युग तक व्रत तेरा, करे भक्त उद्धार। वो ही तेरा लाड़ला, आवे तेरे द्वार॥

    युग-युग तक आपका व्रत भक्तों का उद्धार करता है। जो आपके द्वार आता है, वही आपका लाड़ला (प्यारा) है।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/shakambhari-chalisa/

संक्षेप में

शाकम्भरी चालीसा देवी शाकम्भरी की स्तुति है। दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय में देवी कहती हैं कि सौ वर्ष के अकाल में वे शाक से संसार का पालन करेंगी और शाकम्भरी कहलाएँगी। चालीसा में शताक्षी, भीमा, भ्रामरी और भूरा देव का स्मरण है, और इसमें कवि की छाप ‘कान्ता प्रसाद जगाधरी वासी’ है। परंपरा में पौष मास की शाकम्भरी नवरात्रि में इसका पाठ विशेष रूप से होता है।

यहाँ रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार की पुस्तक ‘51 चालीसा संग्रह’ (2004) का पाठ लिया गया है और उसे पाँच वेबसाइटों से मिलाया गया है। इस पुस्तक और अधिकतर स्रोतों में 46 चौपाइयाँ हैं। मुख्य पाठभेद: चौपाई 13 में sanskritdocuments.org का पाठ ‘शिव शंकर प्रभु भोले भण्डारी, सदा रहे सन्तन हितकारी। हनुमत माता लौकड़ा तेरा, सदा शाकम्भरी माँ का चेरा॥’ है, यानी दो आधी पंक्तियाँ अधिक; छपी पुस्तक और बाकी वेबसाइटों में ये नहीं हैं। चौपाई 4 में एक स्रोत ‘अर्पणा’ की जगह ‘अपर्णा’ पढ़ता है; चौपाई 7 में कई स्रोतों में ‘अनूपा’ की जगह ‘अनपा’ छपा है, जो छपाई की भूल लगती है; चौपाई 18 में कहीं ‘की अधिकारी’, चौपाई 28 में कहीं ‘कमलेश्वर’, चौपाई 29 में कहीं ‘भोग भण्डार’ और चौपाई 37 में कहीं ‘दुविधा टारी’ है। चौपाई 43 के ‘शत्रुन’ को छपी पुस्तक ‘शत्रु न’ लिखती है। समापन दोहे में ‘दुर्गा सुर हारणि’ और ‘दुर्गासुर संहारणी’ रूप भी मिलते हैं; कुछ स्रोतों में दोनों समापन दोहों का क्रम उलटा है। इसी नाम की एक दूसरी चालीसा भी मिलती है, जो ‘जय जय श्री शाकम्भरी जगदम्बे’ से शुरू होती है; यह वह पाठ नहीं है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शाकम्भरी चालीसा में कितनी चौपाइयाँ हैं?

छपी पुस्तक के पाठ में आरंभ के दो दोहे, 46 चौपाइयाँ और अंत में दो दोहे हैं। नाम ‘चालीसा’ होने पर भी चौपाइयों की संख्या चालीस से अधिक है। एक ऑनलाइन पाठ में चौपाई 13 के साथ दो आधी पंक्तियाँ और मिलती हैं।

शाकम्भरी चालीसा किसने लिखी?

चालीसा में कवि की छाप है: ‘कान्ता प्रसाद जगाधरी वासी’ (चौपाई 39), और ‘कान्ता’ या ‘कान्त’ नाम चौपाई 28, 37 और 46 में भी आता है। कवि के समय या जीवन के बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिली।

देवी शाकम्भरी कौन हैं?

दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय में देवी कहती हैं कि जब सौ वर्ष तक वर्षा नहीं होगी, तब वे सौ नेत्रों से मुनियों को देखेंगी और ‘शताक्षी’ कहलाएँगी, फिर अपने शरीर से उपजे शाक से संसार का पालन करेंगी और ‘शाकम्भरी’ कहलाएँगी। उसी अवसर पर वे दुर्गम असुर को मारकर ‘दुर्गा’ नाम पाएँगी। इसी अध्याय में ‘भीमा’ और ‘भ्रामरी’ नाम भी आते हैं।

शाकम्भरी चालीसा का पाठ कब किया जाता है?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में पौष मास की शाकम्भरी नवरात्रि में इसका पाठ विशेष रूप से होता है, जो पौष शुक्ल अष्टमी से पौष पूर्णिमा (शाकम्भरी पूर्णिमा) तक चलती है। चालीसा स्वयं नौ रातों तक दीप जलाकर परिवार सहित पाठ करने की बात कहती है।

चालीसा में भूरा देव कौन हैं?

सहारनपुर ज़िले में शिवालिक पहाड़ियों में स्थित शाकम्भरी देवी मंदिर के पास भूरा देव (भैरव) का मंदिर है, जिन्हें देवी का रक्षक कहा जाता है। परंपरा में भक्त देवी से पहले भूरा देव के दर्शन करते हैं, और चालीसा (चौपाई 20) भी कहती है कि उनकी पूजा पहले होती है।

स्रोत

  1. रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार: ‘51 चालीसा संग्रह’, आरतियों सहित (2004)
  2. sanskritdocuments.org, हिंदी पथ, श्री धरम, नमः शिवाय और आरती ज्ञान (वेबसाइटें)
  3. शताक्षी, शाकम्भरी, दुर्गम, भीमा, भ्रामरी और रक्तदन्तिका: दुर्गा सप्तशती, अध्याय 11 (द्रिक पंचांग पर गीता प्रेस का हिंदी अनुवाद)
  4. शाकम्भरी देवी मंदिर और भूरा देव: जिला सहारनपुर की सरकारी वेबसाइट; अमर उजाला
  5. शाकम्भरी नवरात्रि और पूर्णिमा: द्रिक पंचांग

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पाठ का मिलान: archive.org, sanskritdocuments.org, hindipath.com, shridharam.com, namashivay.in, aartigyan.com