- दोहा 1
जय जय सीताराम के, मध्यवासिनी अम्ब।
देहु दर्श जगदम्ब अब, करो न मातु विलम्ब॥
सीता और राम के बीच वास करने वाली हे माँ अम्बा, आपकी जय हो, जय हो। हे जगदम्बा, अब दर्शन दीजिए; हे माँ, देर न कीजिए।
- दोहा 2
जय तारा जय कालिका, जय दश विद्या वृन्द।
काली चालीसा रचत, एक सिद्धि कवि हिन्द॥
हे तारा, हे कालिका, हे दस महाविद्याओं के समूह, आपकी जय हो। हिंद (भारत) का एक ‘सिद्धि कवि’ यह काली चालीसा रचता है। (‘सिद्धि कवि’ कवि का नाम है या उसका वर्णन, यह स्पष्ट नहीं।)
- दोहा 3
प्रातः काल उठ जो पढ़े, दुपहरिया या शाम।
दुःख दरिद्रता दूर हों, सिद्धि होय सब काम॥
चालीसा कहती है: जो इसे सुबह उठकर, दोपहर को या शाम को पढ़े, उसके दुःख और दरिद्रता दूर होते हैं और सब काम सिद्ध होते हैं।
- चौपाई 1
जय काली कंकाल मालिनी।
जय मंगला महा कपालिनी॥
कंकाल (हड्डियों) की माला पहनने वाली हे काली, आपकी जय हो। मंगल करने वाली, कपाल धारण करने वाली हे महाकपालिनी, आपकी जय हो।
- चौपाई 2
रक्तबीज बधकारिणि माता।
सदा भक्त जनन की सुखदाता॥
हे माँ, आपने रक्तबीज का वध किया; आप सदा भक्तों को सुख देने वाली हैं। (रक्तबीज की कथा दुर्गा सप्तशती के आठवें अध्याय में है।)
- चौपाई 3
शिरो मालिका भूषित अंगे।
जय काली जय मद्य मतंगे॥
आपके अंग सिरों (मुंडों) की माला से सजे हैं। हे काली, आपकी जय हो; हे ‘मद्य मतंगे’ (शब्दशः: मद से मतवाली), आपकी जय हो। (इन दो शब्दों का ठीक भाव स्पष्ट नहीं; दूसरी छपी पुस्तकों में ‘मधु मद्य तरंगे’ और ‘मधु मध्य मतंगे’ भी है।)
- चौपाई 4
हर हृदयारविन्द सुविलासिनि।
जय जगदम्बा सकल दुःख नाशिनि॥
आप हर (शिव) के हृदय-कमल में शोभा से विराजती हैं। सब दुःखों का नाश करने वाली हे जगदम्बा, आपकी जय हो।
- चौपाई 5
ह्रीं काली श्रीं महाकराली।
क्रीं कल्याणी दक्षिणाकाली॥
‘ह्रीं’ काली, ‘श्रीं’ महाकराली (अत्यंत भयंकर रूप वाली), ‘क्रीं’ कल्याणी दक्षिणाकाली। (ह्रीं, श्रीं और क्रीं बीजाक्षर हैं।)
- चौपाई 6
जय कलावती जय विद्यावती।
जय तारा सुन्दरी महामति॥
कलाओं की स्वामिनी, विद्या की स्वामिनी हे देवी, आपकी जय हो। हे तारा, हे सुंदरी, हे महाबुद्धि वाली, आपकी जय हो।
- चौपाई 7
देहु सुबुद्धि हरहु सब संकट।
होहु भक्त के आगे परगट॥
मुझे अच्छी बुद्धि दीजिए और सब संकट हर लीजिए; अपने भक्त के सामने प्रकट होइए।
- चौपाई 8
जय ॐकारे जय हुंकारे।
महा शक्ति जय अपरम्पारे॥
ओंकार-रूपिणी देवी, हुंकार करने वाली देवी, आपकी जय हो। हे अपरंपार (असीम) महाशक्ति, आपकी जय हो।
- चौपाई 9
कमला कलियुग दर्प विनाशिनी।
सदा भक्त जन के भयनाशिनी॥
आप कमला (लक्ष्मी) हैं, कलियुग के घमंड को नष्ट करने वाली; आप सदा भक्तों का भय मिटाती हैं।
- चौपाई 10
अब जगदम्ब न देर लगावहु।
दुख दरिद्रता मोर हटावहु॥
हे जगदम्बा, अब देर न लगाइए; मेरे दुख और दरिद्रता दूर कीजिए।
- चौपाई 11
जयति कराल कालिका माता।
कालानल समान द्युति गाता॥
भयंकर रूप वाली हे कालिका माता, आपकी जय हो। आपके शरीर की कांति प्रलय की अग्नि (कालानल) जैसी है।
- चौपाई 12
जय शंकरी सुरेशि सनातनि।
कोटि सिद्धि कवि मातु पुरातनि॥
हे शंकरी, हे देवताओं की स्वामिनी, हे सनातनी, आपकी जय हो। आप अनगिनत सिद्धियों और कवियों की पुरातन माता हैं।
- चौपाई 13
कपर्दिनी कलि कल्प बिमोचनि।
जय विकसित नव नलिन बिलोचनि॥
हे कपर्दिनी (जटाधारिणी), आप कलियुग और कल्प (काल-चक्र) के बंधन से छुड़ाने वाली हैं। खिले हुए नए कमल जैसी आँखों वाली हे देवी, आपकी जय हो। (कई छपे पाठों में ‘कलि कल्मष मोचनि’ है, यानी कलियुग के पापों से छुड़ाने वाली।)
- चौपाई 14
आनन्द करणि आनन्द निधाना।
देहु मातु मोहि निर्मल ज्ञाना॥
आप आनंद देने वाली और आनंद का भंडार हैं। हे माँ, मुझे निर्मल ज्ञान दीजिए।
- चौपाई 15
करुणामृत सागर कृपामयी।
होहु दुष्ट जन पर अब निर्दयी॥
आप करुणा रूपी अमृत का सागर हैं और कृपा से भरी हैं; अब दुष्टों पर कठोर (निर्दय) होइए।
- चौपाई 16
सकल जीव तोहि परम पियारा।
सकल विश्व तोरे आधारा॥
सब जीव आपको परम प्रिय हैं; सारा विश्व आपके ही आधार पर टिका है।
- चौपाई 17
प्रलय काल में नर्तन कारिणि।
जय जननी सब जग की पालनि॥
प्रलय के समय आप नृत्य करती हैं। सारे जगत का पालन करने वाली हे जननी, आपकी जय हो।
- चौपाई 18
महोदरी महेश्वरी माया।
हिमगिरि सुता विश्व की छाया॥
आप महोदरी (विशाल उदर वाली), महेश्वरी और माया हैं; आप हिमालय की पुत्री हैं और विश्व की छाया (आश्रय) हैं।
- चौपाई 19
स्वछन्द रद मारद धुनि माही।
गर्जत तुम्ही और कोउ नाही॥
उस गर्जना की ध्वनि में स्वच्छंद होकर आप ही गरजती हैं, और कोई नहीं। (पहली पंक्ति के ‘रद मारद’ शब्द सभी स्रोतों में अस्पष्ट हैं और हर पुस्तक में अलग छपे हैं; उनका अर्थ अनुमान से नहीं भरा गया।)
- चौपाई 20
स्फुरति मणिगणाकार प्रताने।
तारागण तू ब्योम विताने॥
आकाश के फैले हुए चँदोवे (वितान) में मणियों के ढेर की तरह चमकने वाले तारे आप ही हैं।
- चौपाई 21
श्री धारे सन्तन हितकारिणी।
अग्नि पाणि अति दुष्ट विदारिणि॥
आप श्री (शोभा और समृद्धि) धारण करने वाली और संतों का हित करने वाली हैं; हाथ में अग्नि लिए आप बड़े-बड़े दुष्टों को चीर डालती हैं।
- चौपाई 22
धूम्र विलोचनि प्राण विमोचनि।
शुम्भ निशुम्भ मथनि वरलोचनि॥
आपने धूम्रलोचन के प्राण हर लिए और शुम्भ-निशुम्भ को मथ डाला; आपकी आँखें सुंदर हैं। (धूम्रलोचन के वध की कथा दुर्गा सप्तशती के छठे अध्याय में है, और निशुम्भ और शुम्भ की नौवें और दसवें अध्याय में।)
- चौपाई 23
सहस भुजी सरोरुह मालिनी।
चामुण्डे मरघट की वासिनी॥
आप हज़ार भुजाओं वाली हैं और कमलों की माला पहनती हैं। हे चामुण्डा, आप श्मशान (मरघट) में वास करती हैं। (दुर्गा सप्तशती 7.27 में चण्डिका काली से कहती हैं कि चण्ड और मुण्ड को पकड़ लाने के कारण वे चामुण्डा नाम से प्रसिद्ध होंगी।)
- चौपाई 24
खप्पर मध्य सुशोणित साजी।
मारेहु माँ महिषासुर पाजी॥
आपके खप्पर (कपाल के पात्र) में रक्त भरा है। हे माँ, आपने दुष्ट महिषासुर को मारा। (महिषासुर की कथा दुर्गा सप्तशती के अध्याय 2 से 4 में है।)
- चौपाई 25
अम्ब अम्बिका चण्ड चण्डिका।
सब एके तुम आदि कालिका॥
अम्बा, अम्बिका, चण्डी, चण्डिका: ये सब एक ही हैं; आप ही आदि कालिका हैं।
- चौपाई 26
अजा एकरूपा बहुरूपा।
अकथ चरित्र तव शक्ति अनूपा॥
आप अजन्मा हैं; आप एक रूप वाली भी हैं और अनेक रूपों वाली भी। आपका चरित्र कहा नहीं जा सकता और आपकी शक्ति अनुपम है।
- चौपाई 27
कलकत्ता के दक्षिण द्वारे।
मूरति तोर महेशि अपारे॥
हे अपार महेश्वरी, कलकत्ता (कोलकाता) के दक्षिणी द्वार पर आपकी मूर्ति है। (चालीसा मंदिर का नाम नहीं बताती।)
- चौपाई 28
कादम्बरी पानरत श्यामा।
जय मातंगी काम के धामा॥
आप कादम्बरी (मधु) के पान में लीन श्यामा हैं। कामनाओं की धाम हे मातंगी, आपकी जय हो।
- चौपाई 29
कमलासन वासिनी कमलायनि।
जय श्यामा जय जय श्यामायनि॥
आप कमल के आसन पर विराजने वाली कमला हैं। हे श्यामा, आपकी जय हो; हे श्यामायनि, आपकी जय हो, जय हो।
- चौपाई 30
मातंगी जय जयति प्रकृति हे।
जयति भक्ति उर कुमति सुमति हे॥
हे मातंगी, हे प्रकृति, आपकी जय हो। आप हृदय में भक्ति हैं; कुमति और सुमति भी आप ही हैं; आपकी जय हो। (दूसरी छपी पुस्तकों में पहली पंक्ति ‘रासरते नवरसे प्रकृति हे’ है।)
- चौपाई 31
कोटि ब्रह्म शिव विष्णु कामदा।
जयति अहिंसा धर्म जन्मदा॥
आप करोड़ों ब्रह्मा, शिव और विष्णु की कामनाएँ पूरी करने वाली हैं। अहिंसा रूपी धर्म को जन्म देने वाली हे देवी, आपकी जय हो।
- चौपाई 32
जल थल नभमण्डल में व्यापिनी।
सौदामिनि मध्य अलापिनि॥
आप जल, थल और आकाश में व्याप्त हैं; बिजली (सौदामिनी) के बीच आलाप करने वाली (स्वर गाने वाली) आप ही हैं।
- चौपाई 33
झननन तच्छु मरिरिन नादिनि।
जय सरस्वती वीणा वादिनी॥
‘झननन तच्छु मरिरिन’ जैसे स्वरों का नाद करने वाली, वीणा बजाने वाली हे सरस्वती, आपकी जय हो। (पहली पंक्ति के शब्द किसी वाद्य की ध्वनि के अनुकरण लगते हैं; छपी पुस्तकों में इनकी वर्तनी अलग-अलग है।)
- चौपाई 34
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
कलित कण्ठ शोभित नरमुण्डा॥
पहली पंक्ति नवार्ण मंत्र है, जिसे गीता प्रेस की दुर्गा सप्तशती की ‘नवार्णविधि’ में मूल मंत्र कहा गया है। दूसरी पंक्ति: आपके कंठ में नरमुंडों की माला सुंदर लगती है। (दुर्गा सप्तशती 7.7 में भी काली को नरमाला से विभूषित कहा गया है।)
- चौपाई 35
जय ब्रह्माण्ड सिद्धि कवि माता।
कामाख्या और काली माता॥
ब्रह्मांड की, सिद्धियों की और कवियों की माता, आपकी जय हो। आप कामाख्या हैं और काली माता भी।
- चौपाई 36
हिंगलाज विन्ध्याचल वासिनि।
अट्टहासिनी अरु अघन नाशिनी॥
आप हिंगलाज और विंध्याचल (देवी के प्रसिद्ध धाम) में वास करती हैं; आप अट्टहास (ऊँची हँसी) करने वाली और पापों का नाश करने वाली हैं।
- चौपाई 37
कितनी स्तुति करूँ अखण्डे।
तू ब्रह्माण्डे शक्तिजित चण्डे॥
हे अखंड (पूर्ण) देवी, मैं आपकी कितनी स्तुति करूँ? हे चण्डी, सारे ब्रह्मांड में आप ही वह शक्ति हैं जो सबको जीत लेती है।
- चौपाई 38
करहु कृपा सब पे जगदम्बा।
रहहिं निशंक तोर अवलम्बा॥
हे जगदम्बा, सब पर कृपा कीजिए, ताकि आपके सहारे सब निश्चिंत (निर्भय) रहें।
- चौपाई 39
चतुर्भुजी काली तुम श्यामा।
रूप तुम्हार महा अभिरामा॥
हे काली, आप चार भुजाओं वाली और श्यामवर्णा हैं; आपका रूप अत्यंत मनोहर है।
- चौपाई 40
खड्ग और खप्पर कर सोहत।
सुर नर मुनि सबको मन मोहत॥
आपके हाथों में खड्ग और खप्पर शोभित हैं; आप देवताओं, मनुष्यों और मुनियों, सबका मन मोह लेती हैं।
- चौपाई 41
तुम्हरी कृपा पावे जो कोई।
रोग शोक नहिं ताकहँ होई॥
चालीसा कहती है कि जिस किसी को आपकी कृपा मिलती है, उसे रोग और शोक नहीं होते।
- चौपाई 42
जो यह पाठ करे चालीसा।
तापर कृपा करहि गौरीशा॥
चालीसा कहती है कि जो यह चालीसा पढ़ता है, उस पर गौरीश (गौरी के स्वामी शिव) कृपा करते हैं।
- समापन दोहा
जय कपालिनी जय शिवा, जय जय जय जगदम्ब।
सदा भक्तजन केरि दुःख, हरहु मातु अवलम्ब॥
हे कपालिनी, हे शिवा, हे जगदम्बा, आपकी जय हो, जय हो। भक्तों का सहारा बनने वाली हे माँ, भक्तों के दुःख सदा हरती रहिए।
पाठ का आधार रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार का ‘51 चालीसा संग्रह’ (2004, पृष्ठ 208–212) है, जिसके पृष्ठ स्कैन से पढ़े गए। इसे तीन और छपी पुस्तकों से मिलाया गया: ओंकारनाथ शास्त्री की ‘विजयेश्वर नित्य नियम विधि’ (विजयेश्वर पंचांग कार्यालय, जम्मू; ‘श्री काली चालीसा’ नाम से), के. के. अग्रवाल की ‘काली उपासना’ (मनोज पब्लिकेशंस, दिल्ली) और वी. एन. जे. तूफ़ान की ‘काली उपासना’ (महामाया पब्लिकेशंस, जालंधर); साथ ही द्रिक पंचांग और भक्ति भारत के पाठ से। द्रिक पंचांग का पाठ रणधीर की पुस्तक जैसा ही है। रणधीर की दो छपाई की भूलें ठीक की गई हैं: चौपाई 1 में ‘कपांलिनी’ और चौपाई 20 में ‘ब्योंम’; दोहा 3 में रणधीर का ‘दारिद्रता’ बाकी सब स्रोतों की तरह ‘दरिद्रता’ लिखा गया है। मुख्य पाठभेद: विजयेश्वर की पुस्तक में केवल पहला दोहा है और उसमें ‘करहु न मातु विलम्ब’ है; चौपाई 3 में ‘मधु मद्य तरंगे’ (विजयेश्वर) और ‘मधु मध्य मतंगे’ (अग्रवाल); चौपाई 7 की दूसरी पंक्ति विजयेश्वर में ‘काटहु सकल जगत के फन्दा’ है; चौपाई 11 में बाकी पुस्तकें ‘कराल काल की माता’ पढ़ती हैं; चौपाई 13 में बाकी तीनों पुस्तकें ‘कलि कल्मष मोचनि’ पढ़ती हैं; चौपाई 16 विजयेश्वर में ‘सकल जीव तोहि परम पियारे, सकल विश्व तव रहहिं अधारे’ है; चौपाई 19 में ‘स्वच्छन्द मराद धुनि माहीं’ (अग्रवाल, तूफ़ान) और ‘मरद धुनि माहीं’ (विजयेश्वर); चौपाई 21 में ‘श्री राधा संतन हितकारी’ (अग्रवाल, तूफ़ान); चौपाई 22 में ‘धूम्र विलोचन’; चौपाई 28 की दूसरी पंक्ति विजयेश्वर में ‘जय मातंगी अनूप अकामा’; चौपाई 30 की पहली पंक्ति बाकी तीनों पुस्तकों में ‘रासरते नवरसे प्रकृति हे’; चौपाई 34 की पहली पंक्ति विजयेश्वर में ‘ओं ऐं ह्रीं क्लीं श्रीं चामुण्डा’; समापन दोहे के अंत में विजयेश्वर ‘हरहु मातु अविलम्बा’ (देर किए बिना हरो) पढ़ती है। अग्रवाल और तूफ़ान की पुस्तकों में चौपाई 38 से आगे का अंत अलग है: उनमें देवी को केला, फल और फूल चढ़ाने और मांस-रक्त न चढ़ाने की बात है (‘काहे कोई बकरा को मारी’) और समापन दोहा ‘सब जीवों के जीव में, व्यापक तू ही अम्ब’ है; तूफ़ान की पुस्तक में अंत में उनके अपने नाम का दोहा भी है। यहाँ रणधीर और विजयेश्वर का अंत दिया गया है, जो द्रिक पंचांग और भक्ति भारत में भी है।