चालीसादुर्गा

काली चालीसा

रचना: परंपरागत

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 4 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंदिर में संध्या आरती: पुजारी के हाथ में पाँच बत्ती वाला पीतल का दीपक, पीछे सजी प्रतिमाएँ और हाथ जोड़े भक्त
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  1. दोहा

    जय काली कलिमल हरण, महिमा अगम अपार। महिष मर्दिनी कालिका, देहु अभय अपार॥

    कलियुग के मल (पाप) हरने वाली काली, आपकी जय हो; आपकी महिमा अगम और अपार है। हे महिषासुर का मर्दन करने वाली कालिका, मुझे अपार अभय दीजिए।

  2. चौपाई 1

    अरि मद मान मिटावन हारी। मुण्डमाल गल सोहत प्यारी॥

    आप शत्रुओं का मद और अहंकार मिटाने वाली हैं। आपके गले में मुंडों की माला शोभा देती है।

  3. चौपाई 2

    अष्टभुजी सुखदायक माता। दुष्टदलन जग में विख्याता॥

    आठ भुजाओं वाली, सुख देने वाली माता, आप दुष्टों का दमन करने के लिए जगत में प्रसिद्ध हैं।

  4. चौपाई 3

    भाल विशाल मुकुट छवि छाजै। कर में शीश शत्रु का साजै॥

    आपके विशाल माथे पर मुकुट की शोभा है, और एक हाथ में शत्रु का कटा सिर है।

  5. चौपाई 4

    दूजे हाथ लिए मधु प्याला। हाथ तीसरे सोहत भाला॥

    दूसरे हाथ में मधु का प्याला है और तीसरे हाथ में भाला शोभित है।

  6. चौपाई 5

    चौथे खप्पर खड्ग कर पांचे। छठे त्रिशूल शत्रु बल जांचे॥

    चौथे हाथ में खप्पर है, पाँचवें में खड्ग (तलवार), और छठे हाथ का त्रिशूल शत्रु की शक्ति को परखता है।

  7. चौपाई 6

    सप्तम कर दमकत असि प्यारी। शोभा अद्भुत मात तुम्हारी॥

    सातवें हाथ में चमकती हुई असि (तलवार) है। हे माता, आपकी शोभा अद्भुत है।

  8. चौपाई 7

    अष्टम कर भक्तन वर दाता। जग मनहरण रूप ये माता॥

    आठवाँ हाथ भक्तों को वर देता है। हे माता, आपका यह रूप जगत का मन हर लेता है।

  9. चौपाई 8

    भक्तन में अनुरक्त भवानी। निशदिन रटें ऋषी मुनि ज्ञानी॥

    भवानी भक्तों से प्रेम करती हैं। ऋषि, मुनि और ज्ञानी रात-दिन आपका नाम जपते हैं।

  10. चौपाई 9

    महाशक्ति अति प्रबल पुनीता। तू ही काली तू ही सीता॥

    आप अत्यंत प्रबल और पवित्र महाशक्ति हैं। आप ही काली हैं और आप ही सीता।

  11. चौपाई 10

    पतित तारिणी हे जग पालक। कल्याणी पापी कुल घालक॥

    हे पतितों को तारने वाली, जगत का पालन करने वाली, कल्याण करने वाली माता, आप पापियों के कुल का नाश करती हैं।

  12. चौपाई 11

    शेष सुरेश न पावत पारा। गौरी रूप धर्यो एक बारा॥

    शेषनाग और इंद्र भी आपका पार नहीं पाते। एक बार आपने गौरी (पार्वती) का रूप धारण किया।

  13. चौपाई 12

    तुम समान दाता नहिं दूजा। विधिवत करें भक्तजन पूजा॥

    आपके समान दूसरा कोई दाता नहीं। भक्तजन विधि से आपकी पूजा करते हैं।

  14. चौपाई 13

    रूप भयंकर जब तुम धारा। दुष्टदलन कीन्हेहु संहारा॥

    जब आपने भयंकर रूप धारण किया, तब दुष्टों के दल का संहार किया।

  15. चौपाई 14

    नाम अनेकन मात तुम्हारे। भक्तजनों के संकट टारे॥

    हे माता, आपके अनेक नाम हैं, और आपने भक्तों के संकट टाले हैं।

  16. चौपाई 15

    कलि के कष्ट कलेशन हरनी। भव भय मोचन मंगल करनी॥

    आप कलियुग के कष्ट और क्लेश हरती हैं, संसार के भय से छुड़ाती हैं और मंगल करती हैं।

  17. चौपाई 16

    महिमा अगम वेद यश गावैं। नारद शारद पार न पावैं॥

    आपकी महिमा अगम है; वेद आपका यश गाते हैं, पर नारद और शारदा भी उसका पार नहीं पाते।

  18. चौपाई 17

    भू पर भार बढ्यौ जब भारी। तब तब तुम प्रकटीं महतारी॥

    हे माता, जब-जब पृथ्वी पर भारी बोझ बढ़ा, तब-तब आप प्रकट हुईं।

  19. चौपाई 18

    आदि अनादि अभय वरदाता। विश्वविदित भव संकट त्राता॥

    आप आदि भी हैं और अनादि भी, अभय का वर देने वाली हैं; संसार के संकटों से बचाने वाली के रूप में आप विश्व में प्रसिद्ध हैं।

  20. चौपाई 19

    कुसमय नाम तुम्हारौ लीन्हा। उसको सदा अभय वर दीन्हा॥

    जिसने बुरे समय में आपका नाम लिया, आपने उसे सदा अभय का वर दिया।

  21. चौपाई 20

    ध्यान धरें श्रुति शेष सुरेशा। काल रूप लखि तुम्हरो भेषा॥

    आपके काल रूप वाले वेश को देखकर वेद, शेषनाग और इंद्र आपका ध्यान करते हैं।

  22. चौपाई 21

    कलुआ भैंरों संग तुम्हारे। अरि हित रूप भयानक धारे॥

    कलुआ भैरों (काले भैरव) आपके साथ रहते हैं, जिन्होंने शत्रुओं के लिए भयानक रूप धारण किया है।

  23. चौपाई 22

    सेवक लांगुर रहत अगारी। चौंसठ जोगन आज्ञाकारी॥

    आपका सेवक लांगुर आपके आगे रहता है, और चौंसठ योगिनियाँ आपकी आज्ञा मानती हैं।

  24. चौपाई 23

    त्रेता में रघुवर हित आई। दशकंधर की सैन नसाई॥

    चालीसा कहती है कि त्रेता युग में आप श्रीराम की सहायता के लिए आईं और दस सिर वाले रावण की सेना का नाश किया।

  25. चौपाई 24

    खेला रण का खेल निराला। भरा मांस-मज्जा से प्याला॥

    आपने युद्ध का निराला खेल खेला और दानवों के मांस-मज्जा से अपना पात्र भरा।

  26. चौपाई 25

    रौद्र रूप लखि दानव भागे। कियौ गवन भवन निज त्यागे॥

    आपका रौद्र रूप देखकर दानव भाग खड़े हुए; वे अपने घर छोड़कर चले गए।

  27. चौपाई 26

    तब ऐसौ तामस चढ़ आयो। स्वजन विजन को भेद भुलायो॥

    तब आप पर ऐसा क्रोध चढ़ा कि आप अपने और पराए का भेद भूल गईं।

  28. चौपाई 27

    ये बालक लखि शंकर आए। राह रोक चरनन में धाए॥

    यह देखकर शंकर बालक के रूप में आए और राह रोककर आपके चरणों में आ गिरे। यह प्रचलित कथा के अनुसार है।

  29. चौपाई 28

    तब मुख जीभ निकर जो आई। यही रूप प्रचलित है माई॥

    तब आपके मुख से जीभ बाहर निकल आई। हे माँ, आपका यही रूप प्रचलित है।

  30. चौपाई 29

    बाढ्यो महिषासुर मद भारी। पीड़ित किए सकल नर-नारी॥

    महिषासुर का घमंड बहुत बढ़ गया और उसने सब स्त्री-पुरुषों को सताया।

  31. चौपाई 30

    करुण पुकार सुनी भक्तन की। पीर मिटावन हित जन-जन की॥

    तब आपने हर जन की पीड़ा मिटाने के लिए भक्तों की करुण पुकार सुनी।

  32. चौपाई 31

    तब प्रगटी निज सैन समेता। नाम पड़ा माँ महिष-विजेता॥

    तब आप अपनी सेना के साथ प्रकट हुईं और आपका नाम ‘महिष-विजेता’ (महिषासुर को जीतने वाली) पड़ा।

  33. चौपाई 32

    शुंभ-निशुंभ हने छन माहीं। तुम सम जग दूसर कोउ नाहीं॥

    आपने शुम्भ-निशुम्भ को क्षण भर में मार डाला। जगत में आपके समान कोई दूसरा नहीं।

  34. चौपाई 33

    मान-मथनहारी खल दल के। सदा सहायक भक्त विकल के॥

    आप दुष्टों के दल का अभिमान मथ डालने वाली हैं और व्याकुल भक्त की सदा सहायक हैं।

  35. चौपाई 34

    दीन विहीन करैं नित सेवा। पावैं मनवांछित फल-मेवा॥

    चालीसा कहती है कि दीन-हीन लोग नित्य आपकी सेवा करते हैं और मनचाहा फल पाते हैं।

  36. चौपाई 35

    संकट में जो सुमिरन करहीं। उनके कष्ट मातु तुम हरहीं॥

    हे माँ, जो संकट में आपका स्मरण करते हैं, आप उनके कष्ट हर लेती हैं।

  37. चौपाई 36

    प्रेम सहित जो कीरति गावैं। भव बन्धन सों मुक्ति पावैं॥

    चालीसा के अनुसार जो प्रेम से आपकी कीर्ति गाते हैं, वे संसार के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।

  38. चौपाई 37

    काली चालीसा जो पढ़हीं। स्वर्गलोक बिनु बन्धन चढ़हीं॥

    चालीसा कहती है कि जो काली चालीसा पढ़ते हैं, वे बिना बंधन के स्वर्गलोक जाते हैं।

  39. चौपाई 38

    दया-दृष्टि हेरौ जगदम्बा। केहि कारण माँ कियौ विलम्बा॥

    हे जगदम्बा, मुझ पर दया की दृष्टि डालिए। हे माँ, आपने किस कारण देर की है?

  40. चौपाई 39

    करहु मातु भक्तन रखवाली। जयति-जयति काली कंकाली॥

    हे माँ, भक्तों की रखवाली कीजिए। कंकाली (हड्डियों की माला पहनने वाली) काली की जय हो, जय हो।

  41. चौपाई 40

    सेवक दीन अनाथ अनारी। भक्तिभाव युत शरण तुम्हारी॥

    मैं दीन, अनाथ और अनजान सेवक भक्ति-भाव के साथ आपकी शरण में हूँ।

  42. समापन दोहा

    प्रेम सहित जो करे, काली चालीसा पाठ। तिनकी पूरन कामना, होय सकल जग ठाठ॥

    चालीसा कहती है कि जो प्रेम से काली चालीसा का पाठ करता है, उसकी कामनाएँ पूरी होती हैं और उसे संसार का सब वैभव मिलता है।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/kali-chalisa/

संक्षेप में

काली चालीसा देवी काली की स्तुति है, जो ‘जय काली कलिमल हरण’ दोहे से शुरू होती है। इसमें माता के आठ हाथों के आयुधों, महिषासुर और शुम्भ-निशुम्भ के वध और भक्तों की रक्षा का वर्णन है। परंपरा में इसका पाठ नवरात्रि में और दीवाली की अमावस्या की रात होने वाली काली पूजा पर विशेष रूप से होता है। इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है।

यहाँ ‘जय काली कलिमल हरण’ से शुरू होने वाली चालीसा दी गई है, जैसी मनोज पब्लिकेशंस की पुस्तिका ‘काली चालीसा’ (पृष्ठ 5 से 11) में छपी है; भक्ति भारत का पाठ इससे शब्दशः मिलता है। अंतर केवल वर्तनी के हैं, जैसे ‘चौंसठ/चौसठ’ और ‘करुण/करूण’; भक्ति भारत चौपाई 40 में ‘युत’ की जगह ‘युति’ पढ़ता है। पुस्तिका के दोहे में ‘देहू’ छपा है, यहाँ ‘देहु’ लिखा गया है। ‘जय काली जगदम्ब जय, हरनि ओघ अघ पुंज’ से शुरू होने वाली एक दूसरी, लंबी काली चालीसा भी मिलती है (रणधीर प्रकाशन का ‘51 चालीसा संग्रह’, ड्रिक पंचांग); वह अलग रचना है, जिसमें 54 चौपाइयाँ हैं और अंतिम दोहे में ‘भक्त’ नाम आता है। चौपाई 23, 27 और 28 के प्रसंग (त्रेता में रावण की सेना का नाश, शिव का बालक रूप में चरणों में आना और जीभ का निकलना) चालीसा के कथन के रूप में दिए गए हैं; इनके लिए कोई शास्त्रीय संदर्भ नहीं जाँचा गया। चालीसा में किसी कवि का नाम नहीं आता।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

काली चालीसा में कितनी चौपाइयाँ हैं?

इस चालीसा में आरंभ में एक दोहा, 40 चौपाइयाँ और अंत में एक दोहा है।

क्या काली की एक से अधिक चालीसा हैं?

हाँ। इस पृष्ठ पर ‘जय काली कलिमल हरण’ वाली चालीसा है। ‘जय काली जगदम्ब जय’ से शुरू होने वाली एक लंबी काली चालीसा भी छपती है, और ‘जय काली कंकाल मालिनी’ से शुरू होने वाली रचना महाकाली चालीसा के नाम से प्रचलित है। ये तीनों अलग रचनाएँ हैं।

काली चालीसा का पाठ कब किया जाता है?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में नवरात्रि में और काली पूजा पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है। ड्रिक पंचांग के अनुसार पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम में दीवाली की अमावस्या को, अमावस्या की मध्यरात्रि में, काली पूजा (श्यामा पूजा) होती है।

दुर्गा सप्तशती में काली का प्रसंग क्या है?

दुर्गा सप्तशती के अध्याय 7 में क्रोधित अम्बिका के ललाट से काली प्रकट होती हैं और चण्ड तथा मुण्ड का वध करती हैं; इसी से उनका नाम चामुण्डा पड़ता है। चालीसा में महिषासुर और शुम्भ-निशुम्भ के वध का जो उल्लेख है, वे कथाएँ भी दुर्गा सप्तशती में हैं।

स्रोत

  1. मनोज पब्लिकेशंस: ‘काली चालीसा’ (पुस्तिका), पृष्ठ 5 से 11
  2. भक्ति भारत: माँ काली चालीसा, ‘अरि मद मान मिटावन हारी’
  3. काली का प्रकट होना और चण्ड-मुण्ड वध: दुर्गा सप्तशती, अध्याय 7
  4. काली पूजा (श्यामा पूजा): ड्रिक पंचांग

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