- दोहा 1
जय जय माता शीतला, तुमहिं धरै जो ध्यान।
होय विमल शीतल हृदय, विकसै बुधि बल ज्ञान॥
हे माता शीतला, आपकी जय हो, जय हो। जो आपका ध्यान करता है, उसका हृदय निर्मल और शीतल हो जाता है, और उसकी बुद्धि, बल और ज्ञान बढ़ते हैं।
- दोहा 2
घट घट वासी शीतला, शीतल प्रभा तुम्हार।
शीतल छइयाँ में झुलई, मइया पलना डार॥
हे शीतला माँ, आप हर प्राणी में बसती हैं और आपकी आभा शीतल है। हे मैया, अपनी शीतल छाया में पालना डालकर (हमें) झुलाइए।
- चौपाई 1
जय जय श्री शीतला भवानी।
जय जग जननि सकल गुणखानी॥
श्री शीतला भवानी, आपकी जय हो, जय हो। जगत की माता, सब गुणों की खान, आपकी जय हो।
- चौपाई 2
गृह गृह शक्ति तुम्हारी राजित।
पूरण शरदचन्द्र सम साजित॥
घर-घर में आपकी शक्ति विराजमान है, और आप शरद ऋतु के पूरे चंद्रमा की तरह शोभित हैं।
- चौपाई 3
विस्फोटक से जलत शरीरा।
शीतल करत हरत सब पीरा॥
चालीसा कहती है कि विस्फोटक (फफोलों वाले रोग, जैसे चेचक) से जलते शरीर को आप शीतल करती हैं और सारी पीड़ा हरती हैं।
- चौपाई 4
मातु शीतला तव शुभ नामा।
सबके गाढ़े आवहिं कामा॥
हे माता शीतला, आपका शुभ नाम सबके कठिन समय में काम आता है।
- चौपाई 5
शोकहरी शंकरी भवानी।
बाल-प्राणरक्षी सुखदानी॥
आप शोक हरने वाली, शंकरी (कल्याण करने वाली) भवानी हैं; बच्चों के प्राणों की रक्षा करने वाली और सुख देने वाली हैं।
- चौपाई 6
शुचि मार्जनी कलश कर राजै।
मस्तक तेज सूर्य सम साजै॥
आपके हाथों में पवित्र झाड़ू (मार्जनी) और कलश शोभित हैं, और माथे पर सूर्य जैसा तेज सजा है।
- चौपाई 7
चौंसठ योगिन संग में गावैं।
वीणा ताल मृदंग बजावैं॥
चौंसठ योगिनियाँ आपके साथ गाती हैं और वीणा, ताल और मृदंग बजाती हैं।
- चौपाई 8
नृत्य नाथ भैरों दिखरावैं।
सहस शेष शिव पार न पावैं॥
भैरवनाथ नृत्य दिखाते हैं। हज़ार मुख वाले शेषनाग और शिव भी आपकी महिमा का पार नहीं पाते।
- चौपाई 9
धन्य धन्य धात्री महारानी।
सुर नर मुनि तव सुयश बखानी॥
हे पालन करने वाली (धात्री) महारानी, आप धन्य हैं, धन्य हैं। देवता, मनुष्य और मुनि आपके सुयश का बखान करते हैं।
- चौपाई 10
ज्वाला रूप महा बलकारी।
दैत्य एक विस्फोटक भारी॥
(कथा:) ज्वाला जैसे रूप वाला, बहुत बलवान, ‘विस्फोटक’ नाम का एक भारी दैत्य था।
- चौपाई 11
घर घर प्रविशत कोई न रक्षत।
रोग रूप धरि बालक भक्षत॥
वह घर-घर में घुस जाता था और कोई बचा नहीं पाता था; रोग का रूप धरकर वह बच्चों को खा जाता था।
- चौपाई 12
हाहाकार मच्यो जग भारी।
सक्यो न जब कोई संकट टारी॥
संसार में भारी हाहाकार मच गया, जब कोई भी इस संकट को टाल न सका।
- चौपाई 13
तब मइया धरि अद्भुत रूपा।
कर में लिये मार्जनी सूपा॥
तब मैया ने अद्भुत रूप धारण किया; उनके हाथ में झाड़ू और सूप थे।
- चौपाई 14
विस्फोटकहिं पकड़ि कर लीन्ह्यो।
मुसल प्रहार बहुविधि कीन्ह्यो॥
उन्होंने विस्फोटक को पकड़ लिया और मूसल से उस पर कई तरह से प्रहार किए।
- चौपाई 15
बहु प्रकार वह विनती कीन्हा।
मैया नहीं भल मैं कछु चीन्हा॥
उसने तरह-तरह से विनती की: ‘मैया, मैंने भले को कुछ नहीं पहचाना (मुझसे भूल हुई)।’
- चौपाई 16
अब नहिं मातु काहु गृह जइहौं।
जहँ अपवित्र वही घर रहिहौं॥
‘हे माता, अब मैं किसी घर में नहीं जाऊँगा; जहाँ अपवित्रता होगी, केवल उसी घर में रहूँगा।’
- चौपाई 17
पूजन पाठ मातु जब करिहैं।
होइ आनन्द सकल दुख हरिहैं॥
‘जब लोग माता की पूजा और पाठ करेंगे, तब आनंद होगा और सारे दुख दूर होंगे।’
- चौपाई 18
भभकत तन शीतल ह्वै जइहैं।
विस्फोटक भय घोर नसइहैं॥
‘तपते हुए शरीर शीतल हो जाएँगे और विस्फोटक का घोर भय मिट जाएगा।’ यह कथा में विस्फोटक का वचन है।
- चौपाई 19
श्री शीतलहिं भजे कल्याना।
वचन सत्य भाषे भगवाना॥
चालीसा कहती है कि श्री शीतला को भजने से कल्याण होता है, और यह सत्य वचन भगवान ने कहा है।
- चौपाई 20
विस्फोटक भय जिहि गृह भाई।
भजै देवि कहँ यही उपाई॥
हे भाई, जिस घर में विस्फोटक का भय हो, वहाँ देवी को भजे; चालीसा यही उपाय बताती है।
- चौपाई 21
कलश शीतला का सजवावै।
द्विज से विधिवत पाठ करावै॥
शीतला का कलश सजवाए और ब्राह्मण से विधि के अनुसार पाठ कराए।
- चौपाई 22
तुम्हीं शीतला जग की माता।
तुम्हीं पिता जग की सुखदाता॥
हे शीतला, आप ही जगत की माता हैं और आप ही पिता; आप जगत को सुख देने वाली हैं।
- चौपाई 23
तुम्हीं जगद्धात्री सुखसेवी।
नमो नमामि शीतले देवी॥
आप ही जगत का पालन करने वाली (जगद्धात्री) हैं, जिनकी सेवा सुख देती है। हे शीतला देवी, आपको नमस्कार है।
- चौपाई 24
नमो सुखकरणी दुखहरणी।
नमो नमो जगतारणि तरणी॥
सुख देने वाली और दुख हरने वाली, आपको नमस्कार। जगत को पार उतारने वाली नौका के समान माँ, आपको नमस्कार।
- चौपाई 25
नमो नमो त्रैलोक्य वन्दिनी।
दुखदारिद्रादिक निकन्दिनी॥
तीनों लोकों में वंदित माँ, आपको नमस्कार। दुख, दरिद्रता आदि को मिटाने वाली, आपको नमस्कार।
- चौपाई 26
श्री शीतला, शेढ़ला, महला।
रुणकी झुणकी मातु मन्दला॥
श्री शीतला, शेढ़ला, महला, रुणकी, झुणकी और माता मंदला: ये सब माता के नाम हैं।
- चौपाई 27
हो तुम दिगम्बर तनुधारी।
शोभित पंचनाम असवारी॥
आप दिगंबर (दिशाएँ ही जिनका वस्त्र हैं) हैं, और पाँच नामों वाले वाहन (गधे) पर सवार होकर शोभित हैं।
- चौपाई 28
रासभ, खर, बैशाख सुनन्दन।
गर्दभ, दुर्वाकन्द निकन्दन॥
(वह वाहन) रासभ, खर, बैशाखनंदन और गर्दभ कहलाता है, और दूब की जड़ें खाता है। (ये सब गधे के नाम हैं।)
- चौपाई 29
सुमिरत संग शीतला माई।
जाहि सकल दुख दूर पराई॥
चालीसा कहती है कि शीतला माई का स्मरण करते ही सारे दुख दूर भाग जाते हैं।
- चौपाई 30
गलका, गलगण्डादिक जु होई।
ताकर मन्त्र न औषधि कोई॥
चालीसा कहती है कि गले के रोग, गलगंड आदि जो होते हैं, उनका कोई मंत्र या औषधि नहीं है। (यह पुरानी भक्ति-रचना का कथन है। आज ऐसे रोगों का इलाज होता है; किसी भी रोग में डॉक्टर से सलाह लें।)
- चौपाई 31
एक मातु जी का आराधन।
और नहिं कोई है साधन॥
चालीसा के अनुसार एक माता जी की आराधना ही उपाय है, और कोई साधन नहीं। (यह भक्ति का भाव है, चिकित्सा की सलाह नहीं।)
- चौपाई 32
निश्चय मातु शरण जो आवै।
निर्भय मन इच्छित फल पावै॥
चालीसा कहती है कि जो विश्वास के साथ माता की शरण में आता है, वह निर्भय होकर मनचाहा फल पाता है।
- चौपाई 33
कोढ़ी, निर्मल काया धारै।
अन्धा, दृग निज दृष्टि निहारै॥
चालीसा कहती है कि कोढ़ी निर्मल शरीर पाता है और अंधा अपनी आँखों से देखने लगता है। (यह भक्ति-काव्य की भाषा है; रोग में डॉक्टर की सलाह लें।)
- चौपाई 34
बन्ध्या नारि पुत्र को पावै।
जन्म दरिद्र धनी होइ जावै॥
चालीसा के अनुसार निःसंतान स्त्री पुत्र पाती है और जन्म से गरीब व्यक्ति धनी हो जाता है।
- चौपाई 35
मातु शीतला के गुण गावत।
लखा मूक को छन्द बनावत॥
कवि कहते हैं कि माता शीतला के गुण गाते हुए गूँगे को भी छंद (कविता) बनाते देखा गया है।
- चौपाई 36
यामें कोई करै जनि शंका।
जग में मैया का ही डंका॥
इसमें कोई शंका न करे; संसार में मैया का ही डंका बजता है (उन्हीं की महिमा है)।
- चौपाई 37
भनत रामसुन्दर प्रभुदासा।
तट प्रयाग से पूरब पासा॥
प्रभु के दास रामसुंदर कहते हैं (यह कवि की छाप है), जो प्रयाग के (गंगा) तट से पूरब की ओर पास ही रहते हैं।
- चौपाई 38
पुरी तिवारी मोर निवासा।
ककरा गंगा तट दुर्वासा॥
‘मेरा निवास पुरी-तिवारी में है, ककरा गाँव में, गंगा के तट पर, जहाँ दुर्वासा ऋषि (का आश्रम) है।’
- चौपाई 39
अब विलम्ब मैं तोहि पुकारत।
मातु कृपा कौ बाट निहारत॥
हे माता, देर हो रही है; मैं आपको पुकार रहा हूँ और आपकी कृपा की राह देख रहा हूँ।
- चौपाई 40
पड़ा द्वार तव आस लगाई।
रक्षा करहु शीतला माई॥
आपकी आस लगाए मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ; हे शीतला माई, मेरी रक्षा कीजिए।
यह भक्ति का पाठ है। चालीसा में रोगों (विस्फोटक यानी चेचक जैसे रोग, गलगंड, कोढ़, अंधापन) के बारे में जो कहा गया है, वह पुरानी भक्ति-रचना का कथन है, चिकित्सा की सलाह नहीं; किसी भी रोग में डॉक्टर से सलाह लें। पाठ: रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार के ‘51 चालीसा संग्रह’ को आधार बनाया गया है और उसे 1983 की पत्रिका ‘मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान’ (अगस्त–सितंबर अंक, जिसमें चालीसा ‘तट प्रयाग से पूरब पासा’ तक छपी है), sanskritdocuments.org और द्रिक पंचांग के पाठ से मिलाया गया है। रणधीर की पुस्तक में चौपाई 16 और 17 आपस में मिल गई हैं (‘जहँ अपवित्र सकल दुःख हरिहैं’); सही पाठ पत्रिका और sanskritdocuments.org से लिया गया है। द्रिक पंचांग का पाठ रणधीर की पुस्तक जैसा ही है, उसकी छपाई की भूलों समेत। मुख्य पाठभेद: चौपाई 1 में रणधीर ‘जय-जय-जय शीतला भवानी’; चौपाई 6 में रणधीर ‘सूर्य समराजै’; चौपाई 8 में रणधीर ‘सहज शेष’, जबकि पत्रिका और sanskritdocuments.org ‘सहस शेष’; चौपाई 12 और 15 में रणधीर ‘सक्यो न जब संकट टारी’ और ‘बहुत प्रकार’; चौपाई 24 में रणधीर ‘सुक्खकरणी’; चौपाई 26 में रणधीर ‘रुणलीह्यणनी’ (छपाई की भूल लगती है), पत्रिका ‘रुणकी झुणकी’; चौपाई 27 में पत्रिका ‘दिगम्बरी’; चौपाई 38 में रणधीर ‘मोर मोर निवासा’ (एक शब्द दो बार छपा है); चौपाई 40 में रणधीर और द्रिक पंचांग ‘पड़ा क्षर’, जहाँ sanskritdocuments.org का ‘द्वार’ लिया गया है। sanskritdocuments.org के पाठ के अंत में दो दोहे और हैं (‘यह चालीसा शीतला पाठ करे जो कोय…’); ये किसी छपे स्रोत में नहीं मिले, इसलिए यहाँ नहीं दिए गए।