स्तुतिहनुमान

बजरंग बाण

रचना: गोस्वामी तुलसीदास (परंपरा अनुसार)

परंपरा में: मंगलवार

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 5 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंदिर में संध्या आरती: पुजारी के हाथ में पाँच बत्ती वाला पीतल का दीपक, पीछे सजी प्रतिमाएँ और हाथ जोड़े भक्त
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. दोहा

    निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥

    जो लोग दृढ़ निश्चय, प्रेम और विश्वास के साथ आदर से विनती करते हैं, दोहा कहता है कि हनुमान जी उनके सब शुभ काम सिद्ध करते हैं।

  2. चौपाई 1

    जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥

    संतों का हित करने वाले हनुमान जी, आपकी जय हो। हे प्रभु, हमारी विनती सुन लीजिए।

  3. चौपाई 2

    जन के काज विलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥

    अपने भक्त के काम में देर न कीजिए। जल्दी दौड़कर आइए और बड़ा सुख दीजिए।

  4. चौपाई 3

    जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥

    जैसे आप कूदकर समुद्र के पार गए, और सुरसा के फैलाए हुए मुँह में प्रवेश किया। (यह सुंदरकाण्ड का प्रसंग है।)

  5. चौपाई 4

    आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥

    आगे जाने पर लंकिनी ने आपको रोका। आपने उसे लात मारी और वह देवलोक चली गई।

  6. चौपाई 5

    जाय विभीषण को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥

    आपने जाकर विभीषण को सुख दिया, और सीता जी के दर्शन करके परम धन्यता पाई।

  7. चौपाई 6

    बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥

    आपने (अशोक) वाटिका उजाड़कर समुद्र में डुबो दी, और बड़ी फुर्ती से ‘यम की कटार’ (जमकातर) तोड़ डाली, यानी मृत्यु जैसे भयानक योद्धाओं को हरा दिया।

  8. चौपाई 7

    अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥

    आपने रावण के पुत्र अक्षय कुमार को मार डाला, और पूँछ में आग लपेटकर लंका जला दी।

  9. चौपाई 8

    लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर में भई॥

    लंका लाख की तरह जल गई, और देवताओं की नगरी में जय-जयकार की ध्वनि होने लगी।

  10. चौपाई 9

    अब विलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतर्यामी॥

    हे स्वामी, अब किस कारण देर हो रही है? हे हृदय की बात जानने वाले, कृपा कीजिए।

  11. चौपाई 10

    जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता। आतुर होय दुःख करहु निपाता॥

    लक्ष्मण जी को प्राण देने वाले, आपकी जय हो। शीघ्र आकर मेरे दुःख का नाश कीजिए।

  12. चौपाई 11

    जय गिरिधर जय जय सुखसागर। सुर समूह समरथ भटनागर॥

    पर्वत उठाकर लाने वाले (गिरिधर), सुख के सागर, आपकी जय हो। आप देवताओं के समूह में समर्थ और वीरों में श्रेष्ठ हैं।

  13. चौपाई 12

    ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहिं मारु बज्र की कीले॥

    ॐ! हे दृढ़ संकल्प वाले हनुमान, प्रहार कीजिए, प्रहार कीजिए। शत्रु को मारिए और उसे वज्र की कील से कील दीजिए। (‘हनु’ का अर्थ है ‘मारो’ या ‘नष्ट करो’।)

  14. चौपाई 13

    गदा बज्र लै बैरिहिं मारो। महाराज प्रभु दास उबारो॥

    गदा और वज्र लेकर शत्रु को मारिए। हे महाराज, हे प्रभु, अपने दास को उबारिए।

  15. चौपाई 14

    ॐकार हुंकार महाप्रभु धावो। बज्र गदा हनु विलंब न लावो॥

    हे महाप्रभु, ॐकार और हुंकार करते हुए दौड़कर आइए। वज्र और गदा से प्रहार कीजिए, देर न लगाइए।

  16. चौपाई 15

    ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीशा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर शीशा॥

    ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं, हे वानरों के स्वामी हनुमान! ॐ हुं हुं हुं, शत्रु के हृदय और सिर पर प्रहार कीजिए। (ह्रीं और हुं मंत्रों के बीज-अक्षर हैं; परंपरा में इनका महत्त्व शब्दार्थ से अधिक ध्वनि में माना जाता है।)

  17. चौपाई 16

    सत्य होहु हरि शपथ पाय के। रामदूत धरु मारु धाय के॥

    भगवान (राम) की शपथ पाकर इस विनती को सत्य कीजिए। हे रामदूत, दौड़कर शत्रु को पकड़िए और मारिए।

  18. चौपाई 17

    जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा॥

    अथाह हनुमान जी, जिनकी गहराई कोई नहीं नाप सकता, आपकी जय हो। आपका भक्त किस अपराध से दुःख पा रहा है?

  19. चौपाई 18

    पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत हौं दास तुम्हारा॥

    मैं पूजा, जप, तप, नियम और आचार कुछ नहीं जानता; मैं तो आपका दास हूँ।

  20. चौपाई 19

    वन उपवन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं॥

    वन में, बाग में, रास्ते में, पहाड़ पर या घर में, आपके बल के भरोसे हम कहीं नहीं डरते।

  21. चौपाई 20

    पाँय परौं कर जोरि मनावौं। यहि अवसर अब केहि गोहरावौं॥

    मैं आपके पाँव पड़ता हूँ और हाथ जोड़कर मनाता हूँ। इस घड़ी में मैं और किसे पुकारूँ?

  22. चौपाई 21

    जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकर सुवन वीर हनुमंता॥

    बलवान अंजनी-पुत्र, आपकी जय हो। आप शंकर-सुवन (परंपरा में शिव के अंश माने जाने वाले) वीर हनुमान हैं।

  23. चौपाई 22

    बदन कराल काल कुल घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥

    आपका मुख विकराल है और आप काल के कुल का भी नाश करने वाले हैं। आप राम के सहायक और सदा रक्षा करने वाले हैं।

  24. चौपाई 23

    भूत प्रेत पिशाच निशाचर। अग्नि बैताल काल मारी मर॥

    भूत, प्रेत, पिशाच, निशाचर, अग्नि-बैताल, काल, महामारी और मृत्यु: (अगली चौपाई में इन सबको मारने की विनती है)।

  25. चौपाई 24

    इन्हें मारु तोहि शपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की॥

    इन्हें मारिए, आपको राम की शपथ है। हे नाथ, अपने नाम की मर्यादा रखिए।

  26. चौपाई 25

    जनकसुता हरि दास कहावो। ताकी शपथ विलंब न लावो॥

    आप जनक-पुत्री सीता जी और भगवान राम के दास कहलाते हैं। उनकी शपथ है, देर न कीजिए।

  27. चौपाई 26

    जय जय जय धुनि होत अकाशा। सुमिरत होत दुसह दुःख नाशा॥

    आकाश में जय-जयकार की ध्वनि हो रही है। पाठ कहता है कि आपका स्मरण करते ही असहनीय दुःख भी नष्ट हो जाता है।

  28. चौपाई 27

    चरण शरण कर जोरि मनावौं। यहि अवसर अब केहि गोहरावौं॥

    आपके चरणों की शरण में आकर हाथ जोड़कर मनाता हूँ। इस घड़ी में और किसे पुकारूँ?

  29. चौपाई 28

    उठु उठु चलु तोहि राम दुहाई। पाँय परौं कर जोरि मनाई॥

    उठिए, उठिए, चलिए, आपको राम की दुहाई है। मैं पाँव पड़कर, हाथ जोड़कर मनाता हूँ।

  30. चौपाई 29

    ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥

    ॐ चं चं चं चं, हे फुर्ती से चलने वाले! ॐ हनु हनु हनु हनु, हे हनुमान! (ये बीज-अक्षरों वाले मंत्र-पद हैं।)

  31. चौपाई 30

    ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल दल॥

    ॐ हं हं, जब चंचल कपि (हनुमान) ललकारते हैं, ॐ सं सं, तो दुष्टों के दल सहमकर भाग जाते हैं।

  32. चौपाई 31

    अपने जन को तुरत उबारो। सुमिरत होय आनंद हमारो॥

    अपने भक्त को तुरंत उबारिए। आपका स्मरण करते ही हमें आनंद मिलता है।

  33. चौपाई 32

    यह बजरंग बाण जेहि मारै। ताहि कहो फिर कौन उबारै॥

    पाठ कहता है: यह बजरंग बाण जिसे लगे, उसे फिर कौन बचा सकता है?

  34. चौपाई 33

    पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्राण की॥

    पाठ कहता है कि जो बजरंग बाण का पाठ करता है, हनुमान जी उसके प्राणों की रक्षा करते हैं।

  35. चौपाई 34

    यह बजरंग बाण जो जापै। ताते भूत प्रेत सब काँपै॥

    पाठ के अनुसार, जो इस बजरंग बाण का जप करता है, उससे भूत-प्रेत सब काँपते हैं।

  36. चौपाई 35

    धूप देय अरु जपै हमेशा। ताके तन नहिं रहै कलेशा॥

    पाठ कहता है कि जो धूप देकर सदा इसका जप करता है, उसके शरीर में कष्ट नहीं रहता।

  37. समापन दोहा

    प्रेम प्रतीतिहि कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥

    जो प्रेम और विश्वास से हनुमान जी को भजता है और सदा हृदय में उनका ध्यान रखता है, दोहा कहता है कि हनुमान जी उसके सब शुभ काम सिद्ध करते हैं।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/bajrang-baan/

संक्षेप में

बजरंग बाण हनुमान जी से की गई एक तीव्र प्रार्थना है, जो ‘निश्चय प्रेम प्रतीति ते’ दोहे से शुरू होती है। इसमें हनुमान जी के लंका के प्रसंगों का स्मरण है, बीज-अक्षरों वाले मंत्र-पद हैं और संकट दूर करने की विनती है। परंपरा इसे गोस्वामी तुलसीदास की रचना मानती है। परंपरा में इसका पाठ विशेष रूप से मंगलवार, शनिवार और हनुमान जयंती पर होता है।

बजरंग बाण के छपे और ऑनलाइन पाठों में काफ़ी अंतर है: पंक्तियों का क्रम, कुछ चौपाइयाँ और अंत का दोहा बदलते हैं। यहाँ वह पाठ है जिस पर रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार के छपे ‘51 चालीसा संग्रह’, द्रिक पंचांग और भक्ति भारत की सहमति है; जहाँ स्रोत बराबर बँटे, वहाँ छपी पुस्तक का पाठ लिया गया। मुख्य पाठभेद: चौपाई 1 में छपी पुस्तक ‘जय हनुमान संत हितकारी’ पढ़ती है; चौपाई 8 में ‘सुरपुर में भई’ की जगह ‘सुरपुर महँ भई’ (द्रिक पंचांग) या ‘सुरपुर नभ भई’ (भक्ति भारत, sanskritdocuments.org) है; चौपाई 10 में ‘लक्ष्मण’ की जगह ‘लखन’ और ‘आतुर होय’ की जगह ‘आतुर ह्वै’ भी मिलता है; चौपाई 11 में sanskritdocuments.org पर ‘जै हनुमान जयति बल-सागर’ है; चौपाई 12 में छपी पुस्तक ‘श्री हनु हनु हनु’ और ‘बज्र को कीले’ पढ़ती है; चौपाई 16 में भक्ति भारत पर ‘मारु जाय के’ है; चौपाई 18 में द्रिक पंचांग पर ‘नहिं जानत कछु’ है; चौपाई 21 में द्रिक पंचांग पर ‘धीर हनुमंता’ है; चौपाई 27 में sanskritdocuments.org पर ‘चरन पकरि’ है; चौपाई 35 में ‘अरु जपै’ की जगह ‘जो जपै’ भी मिलता है। चौपाई 20 sanskritdocuments.org के पाठ में नहीं है। कुछ संस्करणों में अंत का दोहा यह है: ‘उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान। बाधा सब हर, करैं सब काम सफल हनुमान॥’ वेबदुनिया के एक पुराने पाठ में, जिसे sanskritdocuments.org ने संदर्भ के लिए उद्धृत किया है, लगभग 27 चौपाइयाँ और जुड़ी हैं; वे किसी छपे स्रोत में नहीं मिलीं, इसलिए यहाँ नहीं दी गई हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बजरंग बाण किसने लिखा?

परंपरा इसे गोस्वामी तुलसीदास की रचना मानती है, और sanskritdocuments.org के पाठ के अंत में भी यही लिखा है। द्रिक पंचांग और भक्ति भारत रचयिता का नाम नहीं देते, इसलिए यहाँ इसे परंपरा की मान्यता के रूप में ही दिया गया है।

बजरंग बाण और हनुमान चालीसा में क्या अंतर है?

हनुमान चालीसा चालीस चौपाइयों में हनुमान जी के गुणों और कार्यों की स्तुति है। बजरंग बाण का स्वर एक तीव्र पुकार का है: इसमें बीज-अक्षरों वाले मंत्र-पद हैं, और राम तथा सीता की शपथ देकर हनुमान जी से तुरंत सहायता माँगी गई है।

बजरंग बाण का पाठ कब किया जाता है?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में मंगलवार, शनिवार और हनुमान जयंती पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है।

‘ह्रीं’, ‘हुं’, ‘चं’ जैसे शब्दों का क्या अर्थ है?

ये मंत्र-परंपरा के बीज-अक्षर हैं। इनका कोई सीधा शब्दार्थ नहीं होता; परंपरा में इनका महत्त्व इनकी ध्वनि में माना जाता है। ‘हनु’ का अर्थ है ‘मारो’ या ‘नष्ट करो’।

अलग-अलग किताबों में बजरंग बाण अलग क्यों मिलता है?

यह लोक में बहुत गाया जाने वाला पाठ है और इसके कई संस्करण छपे हैं। पंक्तियों का क्रम, कुछ चौपाइयाँ और अंत का दोहा स्रोतों में बदलते हैं। यहाँ एक छपे संग्रह और दो वेबसाइटों में मिलने वाला साझा पाठ दिया गया है; मुख्य अंतर पाठ के नीचे के नोट में हैं।

स्रोत

  1. परंपरागत पाठ
  2. रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार: ‘51 चालीसा संग्रह’, आरतियों सहित (दो स्कैन प्रतियाँ: प्रथम संस्करण 2000, और 2004)
  3. द्रिक पंचांग: श्री बजरंग बाण
  4. भक्ति भारत: श्री बजरंग बाण पाठ
  5. sanskritdocuments.org: श्री बजरंग बाण (पाठभेदों और वेबदुनिया के पाठ के उल्लेख सहित)

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पाठ का मिलान: archive.org, archive.org, drikpanchang.com, bhaktibharat.com, sanskritdocuments.org