स्तुतिहनुमान

संकटमोचन हनुमानाष्टक

रचना: गोस्वामी तुलसीदास (परंपरा अनुसार)

परंपरा में: मंगलवार

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 5 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंदिर में संध्या आरती: पुजारी के हाथ में पाँच बत्ती वाला पीतल का दीपक, पीछे सजी प्रतिमाएँ और हाथ जोड़े भक्त
चित्र: AI से बनाया गया
PDF डाउनलोड करें

विज्ञापन

  1. पद 1

    बाल समय रबि भक्षि लियो तब तीनहुँ लोक भयो अँधियारो। ताहि सों त्रास भयो जग को यह संकट काहु सों जात न टारो॥ देवन आनि करी बिनती तब छाँड़ि दियो रबि कष्ट निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥

    बचपन में आपने सूर्य को मुँह में रख लिया, तो तीनों लोकों में अँधेरा छा गया। इससे सारा जगत भयभीत हो गया और यह संकट किसी से टल नहीं रहा था। तब देवताओं ने आकर विनती की, और आपने सूर्य को छोड़कर कष्ट दूर किया। हे कपि, जगत में कौन नहीं जानता कि आपका नाम ‘संकटमोचन’ (संकट से छुड़ाने वाला) है?

  2. पद 2

    बालि की त्रास कपीस बसै गिरि जात महाप्रभु पंथ निहारो। चौंकि महा मुनि साप दियो तब चाहिय कौन बिचार बिचारो॥ कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु सो तुम दास के सोक निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥

    बालि के डर से वानरराज सुग्रीव पर्वत पर रहते थे और वहाँ से जाते हुए प्रभु राम की राह देख रहे थे। महामुनि ने (बालि को) शाप दिया था, इसलिए (बालि वहाँ नहीं आ सकता था); अब चौंककर वे सोचने लगे कि क्या उपाय किया जाए। तब आप ब्राह्मण का रूप धरकर महाप्रभु राम को उनके पास ले आए और प्रभु के दास सुग्रीव का शोक दूर किया। (राम और हनुमान के इस मिलन का वर्णन रामचरितमानस के किष्किंधाकाण्ड में है।) हे कपि, जगत में कौन नहीं जानता कि आपका नाम संकटमोचन है?

  3. पद 3

    अंगद के सँग लेन गये सिय खोज कपीस यह बैन उचारो। जीवत ना बचिहौ हम सो जु बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो॥ हेरि थके तट सिंधु सबै तब लाय सिया-सुधि प्रान उबारो। को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥

    आप अंगद के साथ सीता जी की खोज में गए। वानरराज सुग्रीव ने कहा था: जो सीता जी की ख़बर लाए बिना यहाँ पैर रखेगा, वह मुझसे जीवित नहीं बचेगा। सब वानर खोजते-खोजते समुद्र के किनारे थक गए, तब आपने सीता जी की ख़बर लाकर सबके प्राण बचाए। हे कपि, जगत में कौन नहीं जानता कि आपका नाम संकटमोचन है?

  4. पद 4

    रावन त्रास दई सिय को सब राक्षसि सों कहि सोक निवारो। ताहि समय हनुमान महाप्रभु जाय महा रजनीचर मारो॥ चाहत सीय असोक सों आगि सु दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥

    रावण ने सीता जी को त्रास दिया और सब राक्षसियों से कहा कि वे (उन्हें समझा-बुझाकर) उनका शोक दूर करें। उसी समय, हे महाप्रभु हनुमान, आपने जाकर बड़े-बड़े राक्षसों को मारा। सीता जी अशोक वृक्ष से आग माँग रही थीं; तब आपने प्रभु राम की अँगूठी देकर उनका शोक दूर किया। (यह प्रसंग रामचरितमानस के सुंदरकाण्ड में है।) हे कपि, जगत में कौन नहीं जानता कि आपका नाम संकटमोचन है?

  5. पद 5

    बान लग्यो उर लछिमन के तब प्रान तजे सुत रावन मारो। लै गृह बैद्य सुषेन समेत तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो॥ आनि सजीवन हाथ दई तब लछिमन के तुम प्रान उबारो। को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥

    रावण के पुत्र (मेघनाद) का चलाया बाण लक्ष्मण जी की छाती में लगा और उनके प्राण निकलने लगे। तब, हे वीर, आप वैद्य सुषेण को उनके घर समेत ले आए और द्रोण पर्वत उखाड़ लाए। आपने संजीवनी लाकर (सुषेण के) हाथ में दी और लक्ष्मण जी के प्राण बचाए। हे कपि, जगत में कौन नहीं जानता कि आपका नाम संकटमोचन है?

  6. पद 6

    रावन जुद्ध अजान कियो तब नाग कि फाँस सबै सिर डारो। श्रीरघुनाथ समेत सबै दल मोह भयो यह संकट भारो॥ आनि खगेस तबै हनुमान जु बंधन काटि सुत्रास निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥

    रावण ने छल भरा युद्ध किया और सबके सिर पर नागपाश (साँपों का फंदा) डाल दिया। श्री रघुनाथ सहित सारी सेना मूर्च्छित हो गई; यह भारी संकट था। तब, हे हनुमान, आप पक्षिराज गरुड़ को ले आए, जिन्होंने बंधन काटकर भय दूर किया। हे कपि, जगत में कौन नहीं जानता कि आपका नाम संकटमोचन है?

  7. पद 7

    बंधु समेत जबै अहिरावन लै रघुनाथ पताल सिधारो। देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो॥ जाय सहाय भयो तब ही अहिरावन सैन्य समेत सँहारो। को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥

    जब अहिरावण श्री रघुनाथ को उनके भाई (लक्ष्मण) सहित पाताल ले गया, और सबने मिलकर सलाह की कि देवी की विधि से पूजा करके इनकी बलि दी जाए, तब आपने वहाँ जाकर सहायता की और अहिरावण को उसकी सेना सहित मार डाला। (अहिरावण की कथा वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस में नहीं है; यह लोक-परंपरा में प्रसिद्ध है।) हे कपि, जगत में कौन नहीं जानता कि आपका नाम संकटमोचन है?

  8. पद 8

    काज किये बड़ देवन के तुम बीर महाप्रभु देखि बिचारो। कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसों नहिं जात है टारो॥ बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जो कछु संकट होय हमारो। को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥

    आपने देवताओं के बड़े-बड़े काम किए हैं। हे वीर महाप्रभु, देखिए और विचार कीजिए: मुझ ग़रीब का ऐसा कौन-सा संकट है जो आपसे न टल सके? हे महाप्रभु हनुमान, हमारा जो भी संकट हो, उसे जल्दी हर लीजिए। हे कपि, जगत में कौन नहीं जानता कि आपका नाम संकटमोचन है?

  9. दोहा

    लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लँगूर। बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर॥

    आपका लाल शरीर लाली से चमक रहा है, और आपकी पूँछ भी लाल है। वज्र जैसे शरीर वाले, दानवों का नाश करने वाले वीर कपि, आपकी जय हो, जय हो, जय हो।

संकटमोचन हनुमानाष्टक PDF डाउनलोड करें

विज्ञापन

अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/hanuman-ashtak/

संक्षेप में

संकटमोचन हनुमानाष्टक हनुमान जी की आठ पदों वाली स्तुति है, जो ‘बाल समय रबि भक्षि लियो’ से शुरू होती है। हर पद में हनुमान जी का एक प्रसंग है, जैसे बचपन में सूर्य को मुँह में रखना, सीता जी की खोज और लक्ष्मण के प्राण बचाना, और हर पद ‘संकटमोचन नाम तिहारो’ पर समाप्त होता है। अंत में एक दोहा है। परंपरा इसे गोस्वामी तुलसीदास की रचना मानती है।

यह पाठ गीता प्रेस, गोरखपुर की ‘श्रीहनुमानचालीसा’ पुस्तिका से है, जिसमें यह हनुमान चालीसा के साथ छपा है; sanskritdocuments.org का पाठ इससे शब्दशः मिलता है। वर्तनी गीता प्रेस की पुरानी ब्रज-अवधी शैली की है (रबि, बिनती, बीर, बैद्य)। गीता प्रेस पहले पद के बाद टेक ‘को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो’ को ‘को०’ लिखकर छोटा कर देता है; यहाँ वह हर पद में पूरी लिखी है। पाठभेद: रणधीर प्रकाशन के छपे संग्रह में पद 4 में ‘सिय को तब राक्षस सों कहि’, पद 6 में ‘बंधन काटि के त्रास निवारो’ और पद 8 में ‘तुमसे’ है। द्रिक पंचांग पर पद 8 में ‘काज कियो’ और ‘जो कुछ संकट’ है, और दोहे में ‘जय जय कपि सूर’ है; गीता प्रेस और बाकी स्रोतों में ‘जय जय जय कपि सूर’ है, जिससे दोहे का चरण ग्यारह मात्राओं का पूरा होता है। sanskritdocuments.org के पाठ में दोहे के बाद ‘सियावर रामचंद्र पद गहि रहुँ’ वाली जयकार की पंक्तियाँ भी हैं, जो गीता प्रेस में नहीं हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हनुमानाष्टक में कितने पद हैं?

आठ पद (इसीलिए ‘अष्टक’) और अंत में एक दोहा। हर पद में चार पंक्तियाँ हैं और हर पद ‘को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो’ पर समाप्त होता है। sanskritdocuments.org के पाठ में इसका छंद मत्तगयंद (एक प्रकार का सवैया) बताया गया है।

संकटमोचन हनुमानाष्टक किसने लिखा?

परंपरा इसे गोस्वामी तुलसीदास की रचना मानती है, और sanskritdocuments.org के पाठ के अंत में ‘गोस्वामि तुलसीदास कृत’ लिखा है। गीता प्रेस की पुस्तिका में रचयिता का नाम नहीं दिया गया है।

इसके पदों में कौन-से प्रसंग हैं?

क्रम से: बचपन में सूर्य को मुँह में रखना; ब्राह्मण के रूप में राम को सुग्रीव से मिलाना; सीता जी की खोज; अशोक वाटिका में सीता जी को राम की अँगूठी देना; लक्ष्मण के लिए संजीवनी लाना; नागपाश काटने के लिए गरुड़ को लाना; और अहिरावण से राम-लक्ष्मण को छुड़ाना। अहिरावण की कथा लोक-परंपरा की है, वाल्मीकि रामायण या रामचरितमानस की नहीं।

हनुमानाष्टक का पाठ कब किया जाता है?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में मंगलवार, शनिवार और हनुमान जयंती पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है, और गीता प्रेस की पुस्तिका में यह हनुमान चालीसा के साथ ही छपा है।

स्रोत

  1. परंपरागत पाठ
  2. गीता प्रेस, गोरखपुर: ‘श्रीहनुमानचालीसा’ पुस्तिका, संकटमोचन हनुमानाष्टक सहित
  3. रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार: ‘51 चालीसा संग्रह’, आरतियों सहित
  4. sanskritdocuments.org: सङ्कटमोचन हनुमानाष्टक
  5. द्रिक पंचांग: संकटमोचन हनुमानाष्टक

कुछ गलत लगा? गलती बताएँ

पाठ का मिलान: archive.org, archive.org, sanskritdocuments.org, drikpanchang.com