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मनोजवं मारुततुल्यवेगं PDF डाउनलोड करें
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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/manojavam-marutatulyavegam/
“मनोजवं मारुततुल्यवेगं” हनुमान जी की शरण लेने का संस्कृत श्लोक है। यह रामरक्षा स्तोत्र का 33वाँ श्लोक है, जिसके ऋषि परंपरा में बुधकौशिक माने जाते हैं। इसमें हनुमान जी को मन जैसी गति वाले, इंद्रियों को जीतने वाले, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ और श्री राम के दूत कहा गया है। परंपरा में हनुमान पूजा में और मंगलवार व शनिवार को इसका पाठ होता है।
स्रोत के बारे में: रामरक्षा स्तोत्र के आरंभ के विनियोग में इसके ऋषि बुधकौशिक बताए गए हैं। sanskritdocuments.org और संस्कृत विकिस्रोत, दोनों के पाठ में यह श्लोक 33वाँ है। कुछ संस्करणों में ‘वरिष्ठम्’ की जगह ‘वरिष्ठं’ लिखा मिलता है; शब्द वही है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
यह श्लोक किस ग्रंथ से है?
रामरक्षा स्तोत्र से, जहाँ यह 33वाँ श्लोक है। स्तोत्र के ऋषि परंपरा में बुधकौशिक माने जाते हैं।
इस श्लोक में हनुमान जी के कौन-से गुण बताए गए हैं?
मन जैसी गति, वायु जैसा वेग, इंद्रियों पर विजय, बुद्धिमानों में श्रेष्ठता, वायु-पुत्र होना, वानरों के दल का प्रमुख होना और श्री राम का दूत होना।
इसका पाठ कब किया जाता है?
परंपरा में हनुमान पूजा में, मंगलवार और शनिवार को, और रामरक्षा स्तोत्र के पूरे पाठ के साथ।
स्रोत
- रामरक्षा स्तोत्र, श्लोक 33 (sanskritdocuments.org और संस्कृत विकिस्रोत के पाठ)
- पाठ का मिलान: greenmesg.org
कुछ गलत लगा? गलती बताएँ
पाठ का मिलान: sanskritdocuments.org, sa.wikisource.org, greenmesg.org
