चालीसाश्रीराम

राम चालीसा

रचना: परंपरागत

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 5 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंदिर में संध्या आरती: पुजारी के हाथ में पाँच बत्ती वाला पीतल का दीपक, पीछे सजी प्रतिमाएँ और हाथ जोड़े भक्त
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. चौपाई 1

    श्री रघुबीर भक्त हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी॥

    भक्तों का हित करने वाले हे श्री रघुवीर (राम), हे प्रभु, हमारी विनती सुन लीजिए।

  2. चौपाई 2

    निशि दिन ध्यान धरै जो कोई। ता सम भक्त और नहिं होई॥

    जो कोई रात-दिन आपका ध्यान करता है, उसके समान दूसरा भक्त नहीं होता।

  3. चौपाई 3

    ध्यान धरे शिवजी मन माहीं। ब्रह्मा इन्द्र पार नहिं पाहीं॥

    शिव जी मन में आपका ध्यान करते हैं; ब्रह्मा और इंद्र भी आपका पार नहीं पाते।

  4. चौपाई 4

    जय जय जय रघुनाथ कृपाला। सदा करो सन्तन प्रतिपाला॥

    हे कृपालु रघुनाथ, आपकी जय हो। आप सदा संतों का पालन और रक्षा करते हैं।

  5. चौपाई 5

    दूत तुम्हार वीर हनुमाना। जासु प्रभाव तिहूँ पुर जाना॥

    वीर हनुमान आपके दूत हैं, जिनका प्रभाव तीनों लोक जानते हैं।

  6. चौपाई 6

    तुव भुजदण्ड प्रचण्ड कृपाला। रावण मारि सुरन प्रतिपाला॥

    हे कृपालु, आपकी भुजाएँ प्रचंड बलशाली हैं। आपने रावण को मारकर देवताओं की रक्षा की।

  7. चौपाई 7

    तुम अनाथ के नाथ गोसाईं। दीनन के हो सदा सहाई॥

    हे स्वामी, आप अनाथों के नाथ हैं और दीन-दुखियों के सदा सहायक हैं।

  8. चौपाई 8

    ब्रह्मादिक तव पार न पावैं। सदा ईश तुम्हरो यश गावैं॥

    ब्रह्मा आदि देवता भी आपका पार नहीं पाते। हे ईश, वे सदा आपका यश गाते हैं।

  9. चौपाई 9

    चारिउ वेद भरत हैं साखी। तुम भक्तन की लज्जा राखी॥

    चारों वेद इस बात के साक्षी हैं कि आपने सदा भक्तों की लाज रखी है।

  10. चौपाई 10

    गुण गावत शारद मन माहीं। सुरपति ताको पार न पाहीं॥

    शारदा (सरस्वती) मन में आपके गुण गाती हैं; देवराज इंद्र भी उन गुणों का पार नहीं पाते।

  11. चौपाई 11

    नाम तुम्हार लेत जो कोई। ता सम धन्य और नहिं होई॥

    जो कोई आपका नाम लेता है, उसके समान धन्य और कोई नहीं होता।

  12. चौपाई 12

    राम नाम है अपरम्पारा। चारिहु वेदन जाहि पुकारा॥

    राम नाम अपरंपार (असीम) है, जिसे चारों वेदों ने पुकारा है।

  13. चौपाई 13

    गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो। तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो॥

    गणपति ने आपका नाम लिया, तो आपने उन्हें सबसे पहले पूजे जाने वाला बना दिया। (यह चालीसा का कथन है।)

  14. चौपाई 14

    शेष रटत नित नाम तुम्हारा। महि को भार शीश पर धारा॥

    शेषनाग नित्य आपका नाम रटते हैं और धरती का भार अपने सिर पर धारण करते हैं।

  15. चौपाई 15

    फूल समान रहत सो भारा। पावत कोउ न तुम्हरो पारा॥

    (आपके नाम के कारण) वह भार उन्हें फूल जैसा हल्का लगता है। आपका पार कोई नहीं पाता।

  16. चौपाई 16

    भरत नाम तुम्हरो उर धारो। तासों कबहुँ न रण में हारो॥

    भरत ने आपका नाम हृदय में धारण किया, इसलिए वे युद्ध में कभी नहीं हारे।

  17. चौपाई 17

    नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा। सुमिरत होत शत्रु कर नाशा॥

    शत्रुघ्न के हृदय में आपका नाम प्रकाशित है; उसका स्मरण करते ही शत्रु का नाश होता है।

  18. चौपाई 18

    लखन तुम्हारे आज्ञाकारी। सदा करत सन्तन रखवारी॥

    लक्ष्मण (लखन) आपके आज्ञाकारी हैं और सदा संतों की रखवाली करते हैं।

  19. चौपाई 19

    ताते रण जीते नहिं कोई। युद्ध जुरे यमहूँ किन होई॥

    इसलिए युद्ध में उन्हें कोई नहीं जीत सकता, चाहे युद्ध में स्वयं यमराज ही क्यों न आ जाएँ।

  20. चौपाई 20

    महालक्ष्मी धर अवतारा। सब विधि करत पाप को छारा॥

    महालक्ष्मी ने (सीता के रूप में) अवतार लिया, जो हर प्रकार से पापों को राख कर देती हैं।

  21. चौपाई 21

    सीता राम पुनीता गायो। भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो॥

    सीता और राम का पवित्र यश गाया गया है। सीता जी ने भुवनेश्वरी, यानी जगत की स्वामिनी, का प्रभाव दिखाया।

  22. चौपाई 22

    घट सों प्रकट भई सो आई। जाको देखत चन्द्र लजाई॥

    वे घट (घड़े) से प्रकट होकर आईं; उन्हें देखकर चंद्रमा भी लजा जाता है।

  23. चौपाई 23

    सो तुमरे नित पाँव पलोटत। नवो निद्धि चरणन में लोटत॥

    वे (सीता जी) नित्य आपके चरण दबाती हैं, और नौ निधियाँ आपके चरणों में लोटती हैं।

  24. चौपाई 24

    सिद्धि अठारह मंगलकारी। सो तुम पर जावै बलिहारी॥

    अठारह मंगलकारी सिद्धियाँ आप पर न्योछावर होती हैं।

  25. चौपाई 25

    औरहु जो अनेक प्रभुताई। सो सीतापति तुमहिं बनाई॥

    और भी जितनी प्रभुताएँ (महिमाएँ) हैं, हे सीतापति, वे सब आपने ही बनाई हैं।

  26. चौपाई 26

    इच्छा ते कोटिन संसारा। रचत न लागत पल की बारा॥

    अपनी इच्छा मात्र से करोड़ों संसार रचने में आपको एक पल भी नहीं लगता।

  27. चौपाई 27

    जो तुम्हरे चरणन चित लावै। ताकी मुक्ति अवसि हो जावै॥

    चालीसा कहती है कि जो आपके चरणों में मन लगाता है, उसकी मुक्ति अवश्य होती है।

  28. चौपाई 28

    सुनहु राम तुम तात हमारे। तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे॥

    हे राम, सुनिए, आप हमारे पिता हैं। भरत ने आपको ही कुल में पूजने योग्य बताया।

  29. चौपाई 29

    तुमहिं देव कुल देव हमारे। तुम गुरु देव प्राण के प्यारे॥

    आप ही हमारे देव और कुलदेव हैं; आप ही गुरुदेव और प्राणों से प्यारे हैं।

  30. चौपाई 30

    जो कुछ हो सो तुमहीं राजा। जय जय जय प्रभु राखो लाजा॥

    हे राजा, जो कुछ भी है, वह आप ही हैं। हे प्रभु, आपकी जय हो; हमारी लाज रखिए।

  31. चौपाई 31

    राम आत्मा पोषण हारे। जय जय जय दशरथ के प्यारे॥

    हे राम, आप आत्मा का पोषण करने वाले हैं। दशरथ के प्यारे पुत्र, आपकी जय हो।

  32. चौपाई 32

    जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा। निर्गुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा॥

    ज्योति-स्वरूप प्रभु, आपकी जय हो। आप निर्गुण, अखंड और अनुपम ब्रह्म हैं।

  33. चौपाई 33

    सत्य सत्य जय सत्यब्रत स्वामी। सत्य सनातन अन्तर्यामी॥

    सत्य का व्रत रखने वाले स्वामी, आपकी जय हो। आप सत्य, सनातन और सबके मन की जानने वाले हैं।

  34. चौपाई 34

    सत्य भजन तुम्हरो जो गावै। सो निश्चय चारों फल पावै॥

    चालीसा कहती है कि जो सच्चे मन से आपका भजन गाता है, वह निश्चय ही चारों फल (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) पाता है।

  35. चौपाई 35

    सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं। तुमने भक्तिहिं सब सिद्धि दीन्हीं॥

    गौरीपति (शिव) ने सच्ची शपथ लेकर कहा है कि आपने भक्ति को ही सब सिद्धियाँ दी हैं।

  36. चौपाई 36

    ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा। नमो नमो जय जगपति भूपा॥

    हे ज्ञान-स्वरूप, मेरे हृदय को ज्ञान दीजिए। हे जगत के स्वामी राजा, आपको बार-बार नमस्कार।

  37. चौपाई 37

    धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा। नाम तुम्हार हरत संतापा॥

    आप धन्य हैं, आपका प्रताप धन्य है। आपका नाम दुःख-ताप हर लेता है।

  38. चौपाई 38

    सत्य शुद्ध देवन मुख गाया। बजी दुन्दुभी शंख बजाया॥

    देवताओं ने अपने मुख से आपको सत्य और शुद्ध कहकर गाया; नगाड़े बजे और शंख बजाए गए।

  39. चौपाई 39

    सत्य सत्य तुम सत्य सनातन। तुम ही हो हमरे तन मन धन॥

    आप सत्य हैं, सनातन सत्य हैं। आप ही हमारे तन, मन और धन हैं।

  40. चौपाई 40

    याको पाठ करे जो कोई। ज्ञान प्रकट ताके उर होई॥

    चालीसा कहती है कि जो कोई इसका पाठ करता है, उसके हृदय में ज्ञान प्रकट होता है,

  41. चौपाई 41

    आवागमन मिटै तिहि केरा। सत्य वचन माने शिव मेरा॥

    और उसका आना-जाना (जन्म-मरण का चक्र) मिट जाता है; शिव मेरे इस वचन को सत्य मानते हैं।

  42. चौपाई 42

    और आस मन में जो होई। मनवांछित फल पावे सोई॥

    मन में और जो भी आशा हो, चालीसा के अनुसार पाठ करने वाला वह मनचाहा फल पाता है।

  43. चौपाई 43

    तीनहुँ काल ध्यान जो ल्यावै। तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै॥

    जो तीनों समय (सुबह, दोपहर और शाम) ध्यान करता है, तुलसी के पत्ते और फूल चढ़ाता है,

  44. चौपाई 44

    साग पत्र सो भोग लगावै। सो नर सकल सिद्धता पावै॥

    और साग-पत्ते का ही भोग लगाता है, चालीसा कहती है कि वह व्यक्ति सब सिद्धियाँ पाता है।

  45. चौपाई 45

    अन्त समय रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥

    अंत समय में वह रघुवर के धाम जाता है, और जहाँ भी जन्म लेता है, वहाँ हरि-भक्त कहलाता है।

  46. चौपाई 46

    श्री हरिदास कहै अरु गावै। सो बैकुण्ठ धाम को पावै॥

    हरिदास कहते हैं: जो इसे कहता और गाता है, वह बैकुंठ धाम पाता है। (‘हरिदास’ कवि की छाप हो सकती है; शब्द का अर्थ ‘हरि का दास’ भी है।)

  47. समापन दोहा 1

    सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय। हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय॥

    जो सात दिन नियम से, मन लगाकर पाठ करता है, हरिदास कहते हैं कि वह हरि की कृपा से अवश्य भक्ति पाता है।

  48. समापन दोहा 2

    राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय। जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्ध हो जाय॥

    दोहा कहता है कि जो राम के चरणों में मन लगाकर राम चालीसा पढ़ता है, उसकी मन की सब इच्छाएँ पूरी होती हैं।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/ram-chalisa/

संक्षेप में

राम चालीसा भगवान श्री राम की स्तुति है, जो ‘श्री रघुबीर भक्त हितकारी’ से शुरू होती है। इसमें राम नाम की महिमा है, और हनुमान, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और सीता जी का स्मरण है। नाम चालीसा है, पर इसमें चालीस से अधिक चौपाइयाँ और अंत में दो दोहे हैं। अंत में ‘हरिदास’ नाम आता है। परंपरा में राम नवमी पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है।

यहाँ वह पाठ है जिस पर रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार का छपा ‘51 चालीसा संग्रह’, द्रिक पंचांग और भक्ति भारत (जिसका पाठ sanskritdocuments.org से मिलता है) अधिकतर सहमत हैं; जहाँ स्रोत बराबर बँटे, वहाँ छपी पुस्तक का पाठ लिया गया। छपी पुस्तक में चौपाई 32 से 35 (‘जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा’ से ‘सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं’ तक) चौपाई 28 से पहले आती हैं, और द्रिक पंचांग पर चौपाई 5 (‘दूत तुम्हार वीर हनुमाना’) चौपाई 4 से पहले है; यहाँ बहुमत का क्रम लिया गया है। मुख्य पाठभेद: चौपाई 6 में छपी पुस्तक ‘तव भुज दण्ड’ पढ़ती है; चौपाई 15 में ‘पाव न कोउ तुम्हारो पारा’; चौपाई 21 में ‘सीता राम’ की जगह ‘सीता नाम’; चौपाई 23 में द्रिक पंचांग पर ‘जो तुम्हरे नित पांव पलोटत’; चौपाई 26 में छपी पुस्तक ‘पल को वारा’; चौपाई 31 में ‘दशरथ के प्यारे’ की जगह ‘दशरथ दुलारे’; चौपाई 33 में ‘सत्य सत्य सत्य ब्रत स्वामी’; चौपाई 35 में भक्ति भारत पर ‘भक्तहिं’ (भक्तों को); चौपाई 46 में छपी पुस्तक ‘बैकुण्ठ धाम को जावै’। भक्ति भारत पर चौपाई 42 और 43 मिलकर एक पंक्ति (‘और आस मन में जो ल्यावै। तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै॥’) रह गई हैं। भक्ति भारत पाठ से पहले ‘आदौ राम तपोवनादि गमनं’ श्लोक (एकश्लोकी रामायण) भी देता है; छपी पुस्तक और द्रिक पंचांग में यह नहीं है, इसलिए यहाँ नहीं दिया गया।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राम चालीसा में कितनी चौपाइयाँ हैं?

यहाँ दिए पाठ में 46 चौपाइयाँ और अंत में दो दोहे हैं। नाम चालीसा है, पर छपे संग्रह और द्रिक पंचांग दोनों में चौपाइयाँ चालीस से अधिक हैं; कुछ वेबसाइटों पर एक पंक्ति कम मिलती है।

राम चालीसा किसने लिखी?

रचयिता का नाम प्रामाणिक रूप से ज्ञात नहीं है, और जिन स्रोतों से यह पाठ मिलाया गया, उनमें से किसी में नाम नहीं दिया गया। चौपाई 46 और पहले समापन दोहे में ‘हरिदास’ नाम आता है, जो कवि की छाप हो सकता है।

राम चालीसा का पाठ कब किया जाता है?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में राम नवमी पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है। पहला समापन दोहा सात दिन तक नियम से पाठ करने की बात कहता है।

चालीसा में किन-किन का स्मरण है?

हनुमान (चौपाई 5), भरत (16), शत्रुघ्न (17), लक्ष्मण (18 और 19) और सीता जी (20 से 23) का। गणपति, शेषनाग, शिव और ब्रह्मा राम नाम की महिमा के उदाहरण के रूप में आते हैं।

स्रोत

  1. परंपरागत पाठ
  2. रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार: ‘51 चालीसा संग्रह’, आरतियों सहित (दो स्कैन प्रतियाँ: प्रथम संस्करण 2000, और 2004)
  3. द्रिक पंचांग: श्री राम चालीसा
  4. भक्ति भारत: श्री राम चालीसा
  5. sanskritdocuments.org: राम चालीसा

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