गुरु प्रदोष व्रत कथा

अगला गुरु प्रदोष: गुरुवार, 18 फ़रवरी 2027

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 6 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
पत्थर के मंदिर में बेलपत्र और धतूरे से सजे शिवलिंग की आरती, सामने नंदी
चित्र: AI से बनाया गया
संक्षेप में

गुरु प्रदोष की प्रचलित कथा में इंद्र और वृत्रासुर का युद्ध होता है। डरे हुए देवता गुरु बृहस्पति को पुकारते हैं। बृहस्पति बताते हैं कि वृत्रासुर पिछले जन्म में राजा चित्ररथ था, जिसने कैलास पर शिव-पार्वती का उपहास किया और पार्वती जी के शाप से असुर बना; शिव-भक्त होने के कारण उसे हराना कठिन है। बृहस्पति जी के कहने पर देवता गुरुवार की त्रयोदशी का प्रदोष व्रत करते हैं और वृत्रासुर पर विजय पाते हैं।

कथा पढ़ें:

अगले गुरु प्रदोष व्रत

  • गुरुवार, 18 फ़रवरी 2027गुरु प्रदोष · माघ शुक्ल त्रयोदशीपूजा का समय 6:13–8:46 PM (नई दिल्ली) · अपने शहर का समय
  • गुरुवार, 1 जुलाई 2027गुरु प्रदोष · आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशीपूजा का समय 7:23–9:24 PM (नई दिल्ली) · अपने शहर का समय
  • गुरुवार, 15 जुलाई 2027गुरु प्रदोष · आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशीपूजा का समय 7:21–9:23 PM (नई दिल्ली) · अपने शहर का समय
  • गुरुवार, 11 नवंबर 2027गुरु प्रदोष · कार्तिक शुक्ल त्रयोदशीपूजा का समय 5:30–8:08 PM (नई दिल्ली) · अपने शहर का समय

अगला प्रदोष किसी और वार को: शुक्रवार, 6 नवंबर 2026, शुक्र प्रदोष व्रत कथा

प्रदोष व्रत 2026-27 की पूरी सूची

जिस प्रदोष व्रत की त्रयोदशी गुरुवार (बृहस्पतिवार) को हो, उसे गुरु प्रदोष कहते हैं (Drik Panchang)। इसकी कथा में व्रत बताने वाले स्वयं देवगुरु बृहस्पति हैं।

यह कथा प्रदोष की छपी पुस्तिकाओं और Drik Panchang में मिलती है, और हमने इसे उन्हीं से घटना-दर-घटना मिलाकर अपने शब्दों में लिखा है। इसका मूल प्रसंग, यानी चित्ररथ का उपहास, पार्वती जी का शाप, उसका वृत्रासुर बनना और बृहस्पति का इंद्र को प्रदोष व्रत बताना, स्कन्द पुराण के माहेश्वर खण्ड के केदार खण्ड (अध्याय 17) में भी है। पर वहाँ बृहस्पति जो दिन बताते हैं, वह कार्तिक शुक्ल पक्ष की वह त्रयोदशी है जो शनिवार को पड़े; गुरुवार का नाम वहाँ नहीं है। पुराण की कथा का अंतर नीचे "कथा के अलग-अलग रूप" में है।

व्रत और कथा की विधि

  • पुस्तिकाओं में गुरु प्रदोष की अलग विधि नहीं दी गई; पूजा प्रदोष व्रत की सामान्य विधि से होती है: दिन भर व्रत, सूर्यास्त से पहले स्नान और प्रदोष काल में पार्वती सहित शिव जी की पूजा।
  • शिव पूजा का मुख्य समय सूर्यास्त के बाद का प्रदोष काल है, जब त्रयोदशी तिथि भी चल रही हो (Drik Panchang); अगली तारीखों का पूजा का समय ऊपर है। पूरी विधि प्रदोष व्रत कथा के पन्ने पर है।

गुरु प्रदोष की कथा: वृत्रासुर और बृहस्पति जी का उपाय

एक बार इंद्र और वृत्रासुर की सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ। देवताओं ने असुरों की सेना को हरा दिया। अपनी सेना का नाश देखकर वृत्रासुर बहुत क्रोधित हुआ और स्वयं युद्ध के लिए आया। उसने असुरी माया से बहुत भयानक रूप धारण कर लिया।

उसका रूप देखकर इंद्र और सब देवता डर गए और उन्होंने देवगुरु बृहस्पति को पुकारा। बृहस्पति जी तुरंत आए। इंद्र ने बताया कि वृत्रासुर बहुत बलवान है और देवलोक संकट में है; इससे बचने का कोई उपाय बताइए।

बृहस्पति जी बोले, "पहले वृत्रासुर के बारे में सुनो। वह बड़ा तपस्वी है; उसने गन्धमादन पर्वत पर कठोर तप करके शिव जी को प्रसन्न किया है। पिछले जन्म में वह चित्ररथ नाम का राजा था। तुम्हारे पास जो सुंदर वन है, वह उसी का राज्य था। एक बार चित्ररथ अपने विमान में कैलास गया। वहाँ शिव जी के वाम भाग में पार्वती जी को बैठा देखकर वह हँसा और बोला कि हम संसारी लोग तो स्त्रियों के वश में रहते ही हैं, पर देवलोक में भी कभी किसी को सभा में पत्नी के साथ बैठे नहीं देखा।"

"यह सुनकर शिव जी हँसे और बोले कि मेरा व्यवहार दूसरों से अलग है; मैंने संसार का नाश कर सकने वाला कालकूट विष पिया है, फिर भी तुम साधारण लोगों की तरह मेरी हँसी उड़ाते हो। तब पार्वती जी क्रोधित हुईं। उन्होंने कहा कि तूने महेश्वर के साथ मेरा भी उपहास किया है, जबकि इस सभा में सनक, सनन्दन और सनत्कुमार जैसे ज्ञानी बैठे हैं। उन्होंने शाप दिया कि वह असुर बनकर विमान से नीचे गिरे। चित्ररथ उसी क्षण धरती पर गिरा और असुर योनि में चला गया। फिर त्वष्टा ऋषि के तप से वह वृत्रासुर के रूप में उत्पन्न हुआ।"

"वृत्रासुर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए शिव-भक्ति में लगा रहा है, इसलिए तुम उसे यों नहीं जीत सकते। मेरी सलाह है कि तुम यह प्रदोष व्रत करो, जिससे उस महाबली पर विजय पा सको।" गुरु की बात सुनकर सब देवता प्रसन्न हुए और उन्होंने गुरुवार की त्रयोदशी का प्रदोष व्रत विधि से किया। Drik Panchang की कथा के अनुसार इससे वृत्रासुर पराजित हुआ और देवलोक का संकट दूर हुआ। कथा कहती है कि जो यह व्रत श्रद्धा से करता है, उसके कष्ट दूर होते हैं और मनोकामना पूरी होती है।

कथा के अलग-अलग रूप

  • स्कन्द पुराण (माहेश्वर खण्ड, केदार खण्ड, अध्याय 17) में यही प्रसंग अधिक विस्तार से है। वहाँ बृहस्पति जी इंद्र को कार्तिक शुक्ल पक्ष की शनिवार वाली त्रयोदशी को प्रदोष-पूजा और उसका उद्यापन बताते हैं। इंद्र पूजा में परिक्रमा की भूल करता है (शिवलिंग और नंदी के बीच से, अर्घा लाँघकर), इसलिए वृत्रासुर उसे निगल लेता है; फिर देवताओं की शिव-पूजा से इंद्र बाहर निकलता है और वृत्रासुर मारा जाता है।
  • पुस्तिकाओं और Drik Panchang में व्रत देवता मिलकर करते हैं; मानव विकास फाउंडेशन की पुस्तिका में इंद्र स्वयं करता है और शीघ्र विजय पाता है।
  • पुस्तिकाएँ वृत्रासुर को त्वष्टा ऋषि के तप से उत्पन्न बताती हैं; पुराण के गीता प्रेस पर आधारित हिंदी पाठ में विश्वकर्मा का नाम है (अंग्रेज़ी अनुवाद में दोनों आते हैं)।

कथा के बाद

कथा के बाद शिव जी की आरती की जाती है; प्रदोष की पुस्तिकाओं में इसके लिए "जय शिव ओंकारा" दी गई है। प्रदोष व्रत की पूरी विधि और स्कन्द पुराण वाली मूल कथा प्रदोष व्रत कथा के पन्ने पर है।

प्रदोष व्रत 2026-27 की पूरी सूची प्रदोष व्रत कथा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गुरु प्रदोष किसे कहते हैं?

जिस प्रदोष व्रत की त्रयोदशी गुरुवार को हो, उसे गुरु प्रदोष कहते हैं (Drik Panchang)। व्रत उस दिन होता है जिस दिन सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में त्रयोदशी हो, इसलिए कभी यह द्वादशी के दिन भी पड़ता है। अगली तारीखें और पूजा का समय इस पन्ने के ऊपर हैं; प्रदोष की पुस्तिकाओं के अनुसार उस दिन यही कथा पढ़ी और सुनी जाती है।

क्या गुरु प्रदोष की कथा किसी पुराण में है?

कथा का मूल प्रसंग स्कन्द पुराण के माहेश्वर खण्ड के केदार खण्ड (अध्याय 17) में है: चित्ररथ का शिव-पार्वती का उपहास, पार्वती जी का शाप, उसका वृत्रासुर बनना और बृहस्पति का इंद्र को प्रदोष-पूजा बताना। पर पुराण में व्रत का दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष की शनिवार वाली त्रयोदशी है, गुरुवार नहीं। गुरुवार से जोड़कर यह कथा प्रदोष की पुस्तिकाओं और Drik Panchang में मिलती है।

स्रोत

  1. Drik Panchang, बृहस्पति (गुरु) प्रदोष व्रत कथा (drikpanchang.com/vrat-katha/pradosha/brihaspati-pradosha/brihaspati-pradosha-vrat-katha.html), 10 अक्टूबर 2026 को पढ़ी
  2. "प्रदोष (त्रयोदशी) व्रत कथा, सातों दिनों की अलग-अलग कथाओं सहित", कथावाचक पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी, रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार (archive.org/details/PradoshVratKathaRandhirPrakashan)
  3. "प्रदोष (त्रयोदशी) व्रत कथा, पूजा विधि, उद्यापन विधि", मानव विकास फाउंडेशन, मुंबई (आचार्य अखिलेश द्विवेदी), 2021 (archive.org/details/mvf_20240803_20240803_1531)
  4. स्कन्द पुराण, माहेश्वर खण्ड, केदार खण्ड, अध्याय 17 "वृत्र का वध", जी. वी. तगारे का अंग्रेज़ी अनुवाद, wisdomlib.org पर (10 अक्टूबर 2026 को पढ़ा)
  5. लेख "प्रदोषव्रत की विधि एवं महिमा" (पुस्तक "ईशानः सर्वदेवानाम्", पृ. 314–329), लेख के अनुसार गीता प्रेस की "व्रतपरिचय" (पं. हनुमान शर्मा) और कल्याण के "संक्षिप्त स्कन्दपुराणांक" (ब्राह्म खण्ड, ब्रह्मोत्तर खण्ड, अ. 7; माहेश्वर खण्ड, केदार खण्ड, अ. 17) पर आधारित: archive.org/details/20240806_20240806_0143
  6. Drik Panchang, प्रदोष व्रत की सूची, पूजा का समय और वार के अनुसार नाम (drikpanchang.com/vrats/pradoshdates.html)

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