प्रदोष व्रत की मूल कथा स्कन्द पुराण में है: विदर्भ का अनाथ राजकुमार धर्मगुप्त एक गरीब ब्राह्मणी के घर उसके बेटे शुचिव्रत के साथ पलता है। शाण्डिल्य ऋषि के कहने पर दोनों बालक प्रदोष के समय शिव जी की पूजा करते हैं; शुचिव्रत को धन से भरा कलश मिलता है, और धर्मगुप्त गन्धर्व कन्या अंशुमती से विवाह करके अपना खोया राज्य वापस पाता है। इसके अलावा हर वार के प्रदोष (सोम, भौम, गुरु, शनि आदि) की अलग प्रचलित कथा पढ़ी जाती है; वे सात कथाएँ अलग पन्नों पर हैं।
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अगले प्रदोष व्रत
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प्रदोष व्रत हर महीने दोनों पक्षों की त्रयोदशी को रखा जाता है, और पूजा सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में होती है। स्कन्द पुराण के अनुसार प्रदोष के समय शिव जी कैलास पर नृत्य करते हैं और सब देवता उनकी सेवा में वहाँ रहते हैं, इसलिए उस समय केवल शिव जी की पूजा का विधान है। पूजा के बाद कथा सुनी जाती है।
नीचे की कथा स्कन्द पुराण के ब्रह्म खण्ड के ब्रह्मोत्तर खण्ड से है (जी. वी. तगारे के अंग्रेज़ी अनुवाद में अध्याय 6–7, गीता प्रेस के संक्षिप्त स्कन्दपुराणांक में अध्याय 7), जहाँ सूत जी यह कथा ऋषियों को सुनाते हैं। हमने इसे अनुवाद और गीता प्रेस पर आधारित हिंदी पाठ से घटना-दर-घटना मिलाकर अपने शब्दों में लिखा है। प्रदोष की छपी पुस्तिकाओं में यही कथा छोटे रूप में सोम प्रदोष और शनि प्रदोष की कथा बनकर मिलती है; अंतर नीचे "कथा के अलग-अलग रूप" में हैं।
वार की कथाएँ: प्रदोष की पुस्तिकाओं के अनुसार त्रयोदशी जिस वार को हो, उस दिन उसी वार की कथा पढ़ी और सुनी जाती है। ये प्रचलित कथाएँ हैं; केवल गुरु प्रदोष की कथा का मूल प्रसंग स्कन्द पुराण (केदार खण्ड) में भी मिलता है। सातों कथाएँ नीचे "वार के अनुसार कथा" में हैं।
व्रत और कथा की विधि
- दिन: स्कन्द पुराण में शाण्डिल्य ऋषि के अनुसार दोनों पक्षों की त्रयोदशी को दिन भर निराहार रहें, सूर्यास्त से तीन घड़ी (लगभग सवा घंटा) पहले स्नान करें, सफ़ेद वस्त्र पहनें और संध्या आदि नित्य कर्म करके शिव पूजा शुरू करें।
- समय: पूजा सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में, जब त्रयोदशी तिथि भी चल रही हो (Drik Panchang)। अगले प्रदोष व्रतों का समय (नई दिल्ली) ऊपर है; हर शहर का समय प्रदोष व्रत की सूची के महीने वाले पन्नों पर है।
- पूजा: पार्वती सहित शिव जी की पूजा; जल और पंचामृत से स्नान, चंदन, बेलपत्र और फूल, धूप, दीप और नैवेद्य। पुराण कहता है कि जिसके पास अधिक साधन न हों, वह जितना हो सके उतने से पूजा करे; भक्ति से चढ़ाया एक फूल भी शिव जी स्वीकार करते हैं।
- प्रार्थना: पूजा के अंत में शिव जी से कर्ज़, पाप, दुर्भाग्य और दरिद्रता दूर करने की प्रार्थना की जाती है (स्कन्द पुराण)। फिर कथा सुनी जाती है।
- भोजन: गीता प्रेस की "व्रतपरिचय" के अनुसार पूजा के बाद, ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा देकर, रात में स्वयं भोजन किया जाता है।
- उद्यापन: पुस्तिकाओं में 11 या साल भर की 26 त्रयोदशी के बाद उद्यापन बताया गया है; "व्रतपरिचय" में व्रत की पूरी अवधि 21 वर्ष लिखी है और उतना न हो सके तो उद्यापन करके व्रत पूरा किया जाता है। संख्या और उद्यापन अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित से तय करें।
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अनाथ राजकुमार और शाण्डिल्य ऋषि
स्कन्द पुराण, ब्रह्मोत्तर खण्ड के अनुसार; सूत जी ऋषियों को सुनाते हैं।
सूत जी ने ऋषियों से कहा: विदर्भ देश में एक धर्मात्मा राजा राज करते थे। एक बार शत्रु राजाओं ने उनके नगर को घेर लिया। युद्ध में राजा मारे गए और उनका राज्य शत्रुओं के हाथ चला गया। उनका छोटा-सा पुत्र अनाथ रह गया; उसकी माँ भी नहीं रही।
उन्हीं दिनों एक गरीब ब्राह्मणी, जिसके पति नहीं रहे थे, अपने छोटे बेटे के साथ भिक्षा माँगकर गुज़ारा करती थी। उसे वह अनाथ राजकुमार मिला। दया से वह उसे अपने घर ले आई और अपने बेटे के साथ उसे भी पालने लगी। दोनों बालक साथ-साथ बड़े हुए, और घर भिक्षा से ही चलता रहा।
एक दिन ब्राह्मणी दोनों बालकों को लेकर शाण्डिल्य ऋषि के पास पहुँची। उसने उन्हें प्रणाम करके पूछा कि यह राजकुमार किसका पुत्र है और इन बालकों की गरीबी कैसे दूर हो। ऋषि ने बताया कि यह विदर्भ के राजा का पुत्र है, जिनके पिता युद्ध में मारे गए थे। ब्राह्मणी के अपने बेटे के बारे में उन्होंने कहा कि पिछले जन्म में वह उत्तम ब्राह्मण था, पर उसने सारी आयु केवल दान लेने में बिताई, यज्ञ आदि सत्कर्म नहीं किए; इसी से इस जन्म में उसे गरीबी मिली है, और उसका उपाय है कि वह भगवान शंकर की शरण ले।
शाण्डिल्य ऋषि ने कहा कि जो लोग प्रदोष के समय शिव जी की पूजा नहीं करते, वे दरिद्र रहते हैं, और जो एकाग्र मन से प्रदोष में शिव जी के चरणों की पूजा करते हैं, उनके धन-धान्य, परिवार और सौभाग्य इसी संसार में बढ़ते हैं। फिर उन्होंने पूजा की विधि बताई: दोनों पक्षों की त्रयोदशी को निराहार रहना, सूर्यास्त से पहले स्नान करके सफ़ेद वस्त्र पहनना, और प्रदोष के समय पार्वती सहित शिव जी की पूजा करना।
शुचिव्रत को मिला धन का कलश
ऋषि की बात मानकर दोनों बालक हर प्रदोष को शिव जी की पूजा करने लगे। (कथा में ब्राह्मणी के बेटे का नाम शुचिव्रत है और राजकुमार का धर्मगुप्त।) इस तरह चार महीने बीत गए। एक दिन शुचिव्रत राजकुमार को साथ लिए बिना नदी पर नहाने गया और देर तक किनारे घूमता रहा। वहाँ पानी के बहाव से कटी ज़मीन में दबा एक बड़ा कलश चमकता दिखा, जो धन से भरा था। वह उसे माँ के पास ले आया और बोला कि यह शिव जी की कृपा है।
माँ ने राजकुमार को भी बुलाकर कहा, "बेटो, यह धन आपस में बराबर बाँट लो।" पर धर्मगुप्त ने हिस्सा लेने से मना कर दिया। उसने कहा, "यह भाई के पुण्य का फल है। भगवान शंकर ने इस पर कृपा की है, तो मुझ पर भी करेंगे।" और वह पहले की तरह शिव पूजा में लगा रहा।
गन्धर्व कन्या अंशुमती और धर्मगुप्त का राज्य
शिव पूजा करते हुए एक वर्ष बीत गया। एक दिन दोनों भाई वन में घूमने गए। कुछ दूर जाकर उन्होंने सैकड़ों गन्धर्व कन्याओं को खेलते देखा। शुचिव्रत ने कहा कि जहाँ स्त्रियाँ विहार कर रही हों, वहाँ आगे जाना ठीक नहीं, और वह लौटकर दूर ठहर गया। धर्मगुप्त अकेला, बिना डरे, उधर चला गया।
उन कन्याओं में से एक उसे आते देख मन ही मन कुछ सोचने लगी। उसने सखियों को पास के वन से चंपा और अशोक के फूल लाने भेज दिया और स्वयं वहीं रुकी रही। उसने धर्मगुप्त को आसन देकर पूछा कि वह कौन है और किसका पुत्र है। धर्मगुप्त ने बताया कि वह विदर्भ के राजा का पुत्र है, उसके माता-पिता नहीं रहे और शत्रुओं ने उसका राज्य ले लिया है। उस कन्या ने बताया कि वह एक गन्धर्व राजा की पुत्री अंशुमती है, और अपने गले का मोतियों का हार उतारकर धर्मगुप्त को दे दिया।
धर्मगुप्त ने कहा कि वह राज्य से हीन और निर्धन है। अंशुमती ने उसे दो दिन बाद उसी जगह आने को कहा। घर जाकर उसने सारी बात शुचिव्रत और माँ को बताई।
तय दिन धर्मगुप्त वहाँ पहुँचा तो गन्धर्वराज अपनी पुत्री के साथ वहाँ थे। उन्होंने कहा, "मैं कैलास गया था। वहाँ महादेव ने मुझे बुलाकर कहा कि धरती पर धर्मगुप्त नाम का एक राजकुमार है, जिसका राज्य शत्रुओं ने छीन लिया है और जो सदा मेरी पूजा करता है; उसी के प्रभाव से उसके पितर मेरे लोक को पहुँचे हैं। तुम उसकी सहायता करो।" शिव जी की इस आज्ञा से गन्धर्वराज ने अंशुमती को धर्मगुप्त को सौंपा और कहा कि वे शत्रुओं को हराकर उसे उसका राज्य दिलाएँगे।
विवाह वहीं वन में हुआ। गन्धर्वराज ने दहेज में बहुत धन, अस्त्र-शस्त्र, रथ, हाथी-घोड़े और गन्धर्वों की सेना दी। धर्मगुप्त सेना लेकर अपने नगर गया, शत्रुओं को हराया और अपना राज्य वापस पाकर राजा बना। जिस ब्राह्मणी ने उसे पाला था, वही उसकी माँ रही, शुचिव्रत उसका भाई, और अंशुमती रानी बनी।
सूत जी ने कहा कि जैसे धर्मगुप्त ने प्रदोष में शिव पूजा करके राज्य पाया, वैसे ही दूसरे लोग भी प्रदोष के दिन शिव जी की आराधना से मनचाहा फल पाते हैं। पुराण कहता है कि जो प्रदोष की इस महिमा को उस दिन शिव पूजा के बाद सुनता या पढ़ता है, वह सौ जन्मों तक दरिद्र नहीं होता।
कथा के अलग-अलग रूप
- ब्राह्मणी को राजकुमार कैसे मिला: पुराण के अंग्रेज़ी अनुवाद (अध्याय 6) में वह उसे नवजात शिशु के रूप में एक सरोवर के किनारे पाती है, जहाँ उसकी माँ नहीं रही थी; पुस्तिकाओं की सोम प्रदोष कथा में वह भिक्षा से लौटते हुए रास्ते में बुरी हालत में मिलता है (एक पुस्तिका में घायल)।
- राजकुमार के पिता: पुराण में युद्ध में मारे गए; Drik Panchang और रणधीर प्रकाशन की पुस्तिका में पड़ोसी राजा ने राज्य छीन लिया; मानव विकास फाउंडेशन की पुस्तिका में शत्रुओं ने उन्हें बंदी बना लिया।
- धन: पुराण में नदी किनारे पानी से कटी ज़मीन में दबा कलश; पुस्तिकाओं की शनि प्रदोष कथा में तालाब पर नहाने जाते हुए सोने का कलश; आज तक की कथा में गाँव के पुराने कुएँ के पास; स्वामी शिवानन्द की पुस्तक में अमृत का कलश, जिसे शुचिव्रत पी लेता है।
- गन्धर्वराज का नाम: अंग्रेज़ी अनुवाद में "द्रविक", पुस्तिकाओं और Drik Panchang में "विद्रविक" या "बिद्रविक"; गीता प्रेस पर आधारित हिंदी पाठ में नाम नहीं है।
- विवाह: पुराण में शिव जी कैलास पर गन्धर्वराज को आज्ञा देते हैं और गन्धर्वराज दो दिन बाद (शनि प्रदोष की पुस्तिकाओं में तीसरे दिन) आते हैं; सोम प्रदोष की कथा में शिव जी अंशुमती के माता-पिता को स्वप्न में आज्ञा देते हैं।
- शुचिव्रत: पुराण में वह राजा का भाई कहलाता है; सोम प्रदोष की कथा में राजकुमार उसे अपना प्रधानमंत्री बनाता है।
कथा के बाद
कथा के बाद शिव जी की आरती की जाती है; प्रदोष की पुस्तिकाओं में इसके लिए "जय शिव ओंकारा" दी गई है। जिस वार को प्रदोष हो, उस वार की कथा नीचे के पन्नों पर है।
प्रदोष व्रत 2026-27 की पूरी सूचीअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रदोष व्रत की कथा किस पुराण में है?
शाण्डिल्य ऋषि, ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त की कथा स्कन्द पुराण के ब्रह्म खण्ड के ब्रह्मोत्तर खण्ड में है (जी. वी. तगारे के अंग्रेज़ी अनुवाद में अध्याय 6–7, गीता प्रेस के संक्षिप्त स्कन्दपुराणांक में अध्याय 7)। रवि, सोम, भौम, बुध और शुक्र प्रदोष की कथाएँ प्रचलित कथाएँ हैं, जो प्रदोष की छपी पुस्तिकाओं और Drik Panchang में मिलती हैं। गुरु प्रदोष की कथा का मूल प्रसंग स्कन्द पुराण के केदार खण्ड (अध्याय 17) में है, पर वहाँ व्रत का दिन शनिवार वाली त्रयोदशी है।
प्रदोष के दिन कौन-सी कथा पढ़ें?
प्रदोष की पुस्तिकाओं के अनुसार त्रयोदशी जिस वार को पड़े, उस दिन उसी वार की कथा पढ़ी और सुनी जाती है: गुरुवार को गुरु प्रदोष की, शनिवार को शनि प्रदोष की, और इसी तरह। स्कन्द पुराण के अनुसार प्रदोष के दिन शिव पूजा के बाद इस पन्ने वाली प्रदोष-महिमा की कथा सुनी या पढ़ी जाती है।
प्रदोष व्रत की पूजा और कथा किस समय करें?
सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में, जब त्रयोदशी तिथि भी चल रही हो (Drik Panchang)। अगले प्रदोष व्रतों की पूजा का समय (नई दिल्ली) इस पन्ने के ऊपर है, और हर शहर का समय प्रदोष व्रत की सूची के महीने वाले पन्नों पर। कथा पूजा के बाद सुनी जाती है।
स्रोत
- स्कन्द पुराण, ब्रह्म खण्ड, ब्रह्मोत्तर खण्ड, अध्याय 6 "प्रदोष का महत्त्व" और 7 "शिव पूजा की विधि", जी. वी. तगारे का अंग्रेज़ी अनुवाद (मोतीलाल बनारसीदास), wisdomlib.org पर (10 अक्टूबर 2026 को पढ़ा)
- लेख "प्रदोषव्रत की विधि एवं महिमा" (पुस्तक "ईशानः सर्वदेवानाम्", पृ. 314–329), लेख के अनुसार गीता प्रेस की "व्रतपरिचय" (पं. हनुमान शर्मा) और कल्याण के "संक्षिप्त स्कन्दपुराणांक" (ब्राह्म खण्ड, ब्रह्मोत्तर खण्ड, अ. 7; माहेश्वर खण्ड, केदार खण्ड, अ. 17) पर आधारित: archive.org/details/20240806_20240806_0143
- "प्रदोषपूजा पीयूष", समर्थश्री त्र्यम्बकेश्वर चैतन्य, श्री धर्मसम्राट् प्रकाशनम्, 2019, पृ. 77–78: स्कन्द पुराण, ब्रह्मोत्तर खण्ड के शाण्डिल्य-वचन (श्लोक 71–80) का हिंदी अनुवाद (archive.org/details/pradosh-book-fainal-pdf-1)
- स्वामी शिवानन्द, "Hindu Fasts and Festivals", अध्याय "Pradosha Vrata" (dlshq.org)
- Drik Panchang, सोम प्रदोष व्रत कथा (drikpanchang.com/vrat-katha/pradosha/soma-pradosha/soma-pradosha-vrat-katha.html), 10 अक्टूबर 2026 को पढ़ी
- Drik Panchang, शनि प्रदोष व्रत कथा (drikpanchang.com/vrat-katha/pradosha/shani-pradosha/shani-pradosha-vrat-katha.html), 10 अक्टूबर 2026 को पढ़ी
- "प्रदोष (त्रयोदशी) व्रत कथा, सातों दिनों की अलग-अलग कथाओं सहित", कथावाचक पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी, रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार (archive.org/details/PradoshVratKathaRandhirPrakashan)
- "प्रदोष (त्रयोदशी) व्रत कथा, पूजा विधि, उद्यापन विधि", मानव विकास फाउंडेशन, मुंबई (आचार्य अखिलेश द्विवेदी), 2021 (archive.org/details/mvf_20240803_20240803_1531)
- आज तक, "शनि प्रदोष व्रत कथा" (aajtak.in/religion/vrat-katha/shani-pradosh-vrat-katha-2588072), 10 अक्टूबर 2026 को पढ़ी
- स्कन्द पुराण, माहेश्वर खण्ड, केदार खण्ड, अध्याय 17 "वृत्र का वध", जी. वी. तगारे का अंग्रेज़ी अनुवाद, wisdomlib.org पर (10 अक्टूबर 2026 को पढ़ा)
- Drik Panchang, प्रदोष व्रत की सूची, पूजा का समय और वार के अनुसार नाम (drikpanchang.com/vrats/pradoshdates.html)
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