शनि प्रदोष व्रत कथा

अगला शनि प्रदोष: शनिवार, 20 मार्च 2027

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 8 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
पत्थर के मंदिर में बेलपत्र और धतूरे से सजे शिवलिंग की आरती, सामने नंदी
चित्र: AI से बनाया गया
संक्षेप में

शनि प्रदोष की प्रचलित कथा में एक गरीब ब्राह्मणी शाण्डिल्य ऋषि के पास जाती है। उसके दो बेटे हैं: बड़ा धर्म (धर्मगुप्त), जो असल में राजकुमार है, और छोटा शुचिव्रत। ऋषि के कहने पर तीनों प्रदोष व्रत करते हैं; शुचिव्रत को धन से भरा सोने का कलश मिलता है, और धर्मगुप्त गन्धर्व कन्या अंशुमती से विवाह करके अपना खोया राज्य वापस पाता है।

कथा पढ़ें:

अगले शनि प्रदोष व्रत

  • शनिवार, 20 मार्च 2027शनि प्रदोष · फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशीपूजा का समय 6:32–8:46 PM (नई दिल्ली) · अपने शहर का समय
  • शनिवार, 31 जुलाई 2027शनि प्रदोष · श्रावण कृष्ण त्रयोदशीपूजा का समय 7:13–9:19 PM (नई दिल्ली) · अपने शहर का समय
  • शनिवार, 14 अगस्त 2027शनि प्रदोष · श्रावण शुक्ल त्रयोदशीपूजा का समय 7:02–9:12 PM (नई दिल्ली) · अपने शहर का समय
  • शनिवार, 11 दिसंबर 2027शनि प्रदोष · मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशीपूजा का समय 5:25–8:09 PM (नई दिल्ली) · अपने शहर का समय

अगला प्रदोष किसी और वार को: शुक्रवार, 6 नवंबर 2026, शुक्र प्रदोष व्रत कथा

प्रदोष व्रत 2026-27 की पूरी सूची

जिस प्रदोष व्रत की त्रयोदशी शनिवार को हो, उसे शनि प्रदोष कहते हैं (Drik Panchang)। पुस्तिकाओं में शनि प्रदोष को खोया हुआ राज्य और पद पाने का व्रत कहा गया है। गीता प्रेस की "व्रतपरिचय" में उद्धृत स्कन्द पुराण के वचन के अनुसार संतान की कामना से प्रदोष व्रत शुक्ल पक्ष की उस त्रयोदशी से आरंभ किया जाता है जो शनिवार को हो; यही श्लोक एक पुस्तिका में भी है।

यह कथा स्कन्द पुराण वाली प्रदोष-कथा का छोटा रूप है; पुस्तिकाओं में इसे गर्गाचार्य के पूछने पर सूत जी सुनाते हैं। हमने इसे Drik Panchang, दो छपी पुस्तिकाओं और आज तक की कथा से घटना-दर-घटना मिलाकर अपने शब्दों में लिखा है। पुराण वाली पूरी कथा प्रदोष व्रत कथा के पन्ने पर है।

व्रत और कथा की विधि

  • पुस्तिकाओं के अनुसार शनि प्रदोष की विधि शाण्डिल्य ऋषि की बताई प्रदोष-पूजा ही है: प्रदोष के दिन व्रत का संकल्प, दिन भर व्रत, और प्रदोष के समय पार्वती सहित शिव जी की पूजा।
  • शिव पूजा का मुख्य समय सूर्यास्त के बाद का प्रदोष काल है, जब त्रयोदशी तिथि भी चल रही हो (Drik Panchang); अगली तारीखों का पूजा का समय ऊपर है। पूरी विधि प्रदोष व्रत कथा के पन्ने पर है।

शनि प्रदोष की कथा: धर्मगुप्त और शुचिव्रत

गर्गाचार्य ने सूत जी से कहा कि आपने सब प्रदोष व्रतों का वर्णन किया, अब शनि प्रदोष की विधि सुनाइए। सूत जी ने यह पुरानी कथा सुनाई। एक गरीब ब्राह्मण की पत्नी गरीबी से दुखी होकर शाण्डिल्य ऋषि के पास गई और बोली, "महामुनि, मैं बहुत दुखी हूँ। मेरे दोनों बेटे आपकी शरण में हैं। बड़ा धर्म है, जो राजपुत्र है; छोटा शुचिव्रत है। हम दरिद्र हैं, आप ही उद्धार कीजिए।" ऋषि ने उसे शिव जी का प्रदोष व्रत करने को कहा।

माँ और दोनों बेटे प्रदोष व्रत करने लगे। प्रदोष आने पर तीनों ने व्रत का संकल्प लिया। छोटा बेटा शुचिव्रत तालाब पर नहाने गया, तो उसे धन से भरा सोने का कलश मिला। वह उसे घर ले आया और माँ को दिखाया। माँ ने शिव जी की महिमा का बखान किया, राजपुत्र को बुलाकर कहा कि यह धन शिव जी की कृपा से मिला है, प्रसाद मानकर दोनों आधा-आधा बाँट लो।

राजपुत्र ने शिव-पार्वती का ध्यान किया और कहा, "माँ, यह धन आपके बेटे का है, मेरा इस पर अधिकार नहीं। मुझे जब भगवान शंकर और माता पार्वती देंगे, तब लूँगा।" यह कहकर वह फिर शिव पूजा में लग गया।

एक दिन दोनों भाई घूमने निकले। उन्होंने बहुत-सी गन्धर्व कन्याओं को खेलते देखा। शुचिव्रत ने कहा, "भैया, हमें इससे आगे नहीं जाना चाहिए," और वहीं बैठ गया। राजपुत्र अकेला उनके बीच चला गया। एक बहुत सुंदर कन्या उसे देखकर मोहित हो गई। उसने सखियों से कहा कि पास के वन में तरह-तरह के फूल खिले हैं, तुम जाकर देख आओ; मेरे पैर में दर्द है, मैं यहीं बैठती हूँ। सखियाँ चली गईं।

कन्या ने राजपुत्र से पूछा कि वह कौन है और किसका पुत्र है। उसने बताया कि वह विदर्भ के राजा का पुत्र है। कन्या ने कहा कि वह विद्रविक नाम के गन्धर्व की पुत्री अंशुमती है, विधाता ने उन दोनों का संयोग मिलाया है, और उसने मोतियों का हार राजपुत्र के गले में डाल दिया। राजपुत्र ने हार स्वीकार किया, पर कहा कि वह निर्धन है। कन्या ने कहा कि जो कहा है वही करूँगी, अब आप घर जाइए। घर जाकर राजपुत्र ने शुचिव्रत को सब बताया।

तीसरे दिन राजपुत्र शुचिव्रत को लेकर उसी वन में गया। वहाँ गन्धर्वराज अपनी पुत्री के साथ आए। उन्होंने बताया कि मैं कैलास गया था; वहाँ शंकर जी ने कहा कि धर्मगुप्त नाम का एक राजपुत्र है, जो इस समय राज्य से हीन और निर्धन है और मेरा परम भक्त है, उसकी सहायता करो। "महादेव की आज्ञा से मैं यह कन्या आपको देने लाया हूँ; मैं आपकी सहायता करके आपको राजगद्दी पर बिठाऊँगा।" गन्धर्वराज ने विधि से विवाह कर दिया और बहुत धन दिया। समय आने पर धर्मगुप्त ने शत्रुओं को हराकर अपना राज्य पाया और सुख से राज किया। शिव जी की कृपा से ब्राह्मणी के दोनों बेटों का जीवन धन-धान्य और सुख से भर गया।

कथा के अलग-अलग रूप

  • आज तक की कथा में कलश गाँव के पुराने कुएँ के पास मिलता है और विवाह की आज्ञा शिव जी गन्धर्व को स्वप्न में देते हैं। स्कन्द पुराण वाली कथा में राजकुमार बचपन में अनाथ होकर ब्राह्मणी को मिला था, धन नदी किनारे पानी से कटी ज़मीन में मिला, और अंशुमती ने दो दिन बाद बुलाया था।
  • शनि प्रदोष की एक दूसरी प्रचलित कथा भी पढ़ी जाती है: एक दयालु पर निःसंतान नगर-सेठ और उसकी पत्नी तीर्थयात्रा पर निकलते हैं। नगर के बाहर पेड़ के नीचे ध्यान में बैठे एक साधु के पास वे रुककर उनके ध्यान से उठने की प्रतीक्षा करते हैं। साधु उनका दुख जानकर उन्हें शनि प्रदोष व्रत और शिव जी की एक वंदना बताते हैं; लौटकर वे व्रत करते हैं और उन्हें पुत्र होता है (मानव विकास फाउंडेशन की पुस्तिका, भक्ति भारत)।

कथा के बाद

कथा के बाद शिव जी की आरती की जाती है; प्रदोष की पुस्तिकाओं में इसके लिए "जय शिव ओंकारा" दी गई है। प्रदोष व्रत की पूरी विधि और स्कन्द पुराण वाली मूल कथा प्रदोष व्रत कथा के पन्ने पर है।

प्रदोष व्रत 2026-27 की पूरी सूची प्रदोष व्रत कथा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शनि प्रदोष किसे कहते हैं?

जिस प्रदोष व्रत की त्रयोदशी शनिवार को हो, उसे शनि प्रदोष कहते हैं (Drik Panchang)। व्रत उस दिन होता है जिस दिन सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में त्रयोदशी हो, इसलिए कभी यह द्वादशी के दिन भी पड़ता है। अगली तारीखें और पूजा का समय इस पन्ने के ऊपर हैं; प्रदोष की पुस्तिकाओं के अनुसार उस दिन यही कथा पढ़ी और सुनी जाती है।

स्रोत

  1. Drik Panchang, शनि प्रदोष व्रत कथा (drikpanchang.com/vrat-katha/pradosha/shani-pradosha/shani-pradosha-vrat-katha.html), 10 अक्टूबर 2026 को पढ़ी
  2. "प्रदोष (त्रयोदशी) व्रत कथा, सातों दिनों की अलग-अलग कथाओं सहित", कथावाचक पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी, रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार (archive.org/details/PradoshVratKathaRandhirPrakashan)
  3. "प्रदोष (त्रयोदशी) व्रत कथा, पूजा विधि, उद्यापन विधि", मानव विकास फाउंडेशन, मुंबई (आचार्य अखिलेश द्विवेदी), 2021 (archive.org/details/mvf_20240803_20240803_1531)
  4. आज तक, "शनि प्रदोष व्रत कथा" (aajtak.in/religion/vrat-katha/shani-pradosh-vrat-katha-2588072), 10 अक्टूबर 2026 को पढ़ी
  5. भक्ति भारत, "शनि प्रदोष व्रत कथा" (bhaktibharat.com/katha/shani-pradosh-vrat-katha), 10 अक्टूबर 2026 को पढ़ी
  6. लेख "प्रदोषव्रत की विधि एवं महिमा" (पुस्तक "ईशानः सर्वदेवानाम्", पृ. 314–329), लेख के अनुसार गीता प्रेस की "व्रतपरिचय" (पं. हनुमान शर्मा) और कल्याण के "संक्षिप्त स्कन्दपुराणांक" (ब्राह्म खण्ड, ब्रह्मोत्तर खण्ड, अ. 7; माहेश्वर खण्ड, केदार खण्ड, अ. 17) पर आधारित: archive.org/details/20240806_20240806_0143
  7. स्कन्द पुराण, ब्रह्म खण्ड, ब्रह्मोत्तर खण्ड, अध्याय 6 "प्रदोष का महत्त्व" और 7 "शिव पूजा की विधि", जी. वी. तगारे का अंग्रेज़ी अनुवाद (मोतीलाल बनारसीदास), wisdomlib.org पर (10 अक्टूबर 2026 को पढ़ा)
  8. Drik Panchang, प्रदोष व्रत की सूची, पूजा का समय और वार के अनुसार नाम (drikpanchang.com/vrats/pradoshdates.html)

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