- दोहा 1
श्री गुरु पद नमन करि, गिरा गनेश मनाय।
कथूं रामदेव विमल यश, सुने पाप विनशाय॥
श्री गुरु के चरणों में नमन करके और गिरा (सरस्वती) तथा गणेश को मनाकर मैं रामदेव का निर्मल यश कहता हूँ, जिसे सुनने से पाप नष्ट होते हैं।
- दोहा 2
द्वारकेश ने आय कर, लिया मनुज अवतार।
अजमल गेह बधावणा, जग में जय जयकार॥
द्वारका के स्वामी (श्रीकृष्ण) ने आकर मनुष्य रूप में अवतार लिया। अजमल के घर बधाइयाँ बजीं और जगत में जय-जयकार हुई।
- चौपाई 1
जय जय रामदेव सुर राया।
अजमल पुत्र अनोखी माया॥
देवताओं के राजा रामदेव, आपकी जय हो। हे अजमल के पुत्र, आपकी माया (लीला) अनोखी है।
- चौपाई 2
विष्णु रूप सुर नर के स्वामी।
परम प्रतापी अन्तर्यामी॥
आप विष्णु के रूप हैं, देवताओं और मनुष्यों के स्वामी हैं, परम प्रतापी और अंतर्यामी हैं।
- चौपाई 3
ले अवतार अवनि पर आये।
तंवर वंश अवतंश कहाये॥
आप अवतार लेकर पृथ्वी पर आए और तंवर वंश के भूषण (अवतंस) कहलाए।
- चौपाई 4
संत जनों के कारज सारे।
दानव दैत्य दुष्ट संहारे॥
आपने संतजनों के काम पूरे किए और दानवों, दैत्यों और दुष्टों का संहार किया।
- चौपाई 5
परच्या प्रथम पिता को दीन्हा।
दूध परीण्डा मांही कीन्हा॥
पहला परचा (चमत्कार से दिया गया परिचय) आपने पिता को दिया: परींडे (पानी के घड़े रखने की जगह) में दूध कर दिया।
- चौपाई 6
कुमकुम पद पोली दर्शाये।
ज्योंही प्रभु पलने प्रगटाये॥
जैसे ही प्रभु पालने में प्रकट हुए, पोल (घर की ड्योढ़ी) में कुमकुम के पद-चिह्न दिखाई दिए।
- चौपाई 7
परचा दूजा जननी पाया।
दूध उफणता चरा उठाया॥
दूसरा परचा माता ने पाया: आपने उफनते दूध का बर्तन (चरा) उठा दिया।
- चौपाई 8
परचा तीजा पुरजन पाया।
चिथड़ों का घोड़ा ही साया॥
तीसरा परचा नगर के लोगों ने पाया: चिथड़ों (कपड़े के टुकड़ों) से बना घोड़ा हिनहिनाने लगा। (‘ही साया’ को यहाँ ‘हींसाया’, यानी हिनहिनाया, के अर्थ में लिया गया है।)
- चौपाई 9
परच्या चौथा भैरव मारा।
भक्त जनों का कष्ट निवारा॥
चौथे परचे में आपने भैरव को मारा और भक्तजनों का कष्ट दूर किया। (लोक-कथा में यह भैरव देवता नहीं, पोकरण क्षेत्र को सताने वाला एक राक्षस है।)
- चौपाई 10
पंचम परच्या रतना पाया।
पुंगल जा प्रभु फंद छुड़ाया॥
पाँचवाँ परचा रतना ने पाया: प्रभु ने पूंगल जाकर उसका बंधन छुड़ाया।
- चौपाई 11
परच्या छठा विजयसिंह पाया।
जला नगर शरणागत आया॥
छठा परचा विजयसिंह ने पाया: जब उसका नगर जला, तब वह आपकी शरण में आया।
- चौपाई 12
परच्या सप्तम् सुगना पाया।
मुवा पुत्र हंसता भग आया॥
सातवाँ परचा सुगना ने पाया: उसका मरा हुआ पुत्र हँसता हुआ दौड़ आया।
- चौपाई 13
परच्या अष्टम् बौहित पाया।
जा परदेश द्रव्य बहु लाया॥
आठवाँ परचा बोहित ने पाया, जो परदेश जाकर बहुत धन लाया।
- चौपाई 14
भंवर डूबती नाव उबारी।
प्रगत टेर पहुँचे अवतारी॥
भँवर में डूबती उसकी नाव को आपने बचाया; पुकार सुनते ही अवतारी प्रभु प्रकट होकर पहुँच गए।
- चौपाई 15
नवमां परच्या वीरम पाया।
बनियां आ जब हाल सुनाया॥
नौवाँ परचा वीरम ने पाया, जब एक बनिए ने आकर अपना हाल सुनाया। (परंपरा के अनुसार वीरमदेव रामदेव जी के बड़े भाई थे।)
- चौपाई 16
दसवां परच्या पा बिनजारा।
मिश्री बनी नमक सब खारा॥
दसवाँ परचा एक बनजारे ने पाया: उसकी सारी मिश्री खारा नमक बन गई।
- चौपाई 17
परच्या ग्यारह किरपा थारी।
नमक हुआ मिश्री फिर सारी॥
ग्यारहवें परचे में आपकी कृपा से वह सारा नमक फिर मिश्री हो गया।
- चौपाई 18
परच्या द्वादश ठोकर मारी।
निकलंग नाडी सिरजी प्यारी॥
बारहवें परचे में आपने ठोकर मारी और सुंदर ‘निकलंग नाडी’ (छोटा तालाब) बना दी।
- चौपाई 19
परच्या तेरहवां पीर परी पधारया।
ल्याय कटोरा कारज सारा॥
तेरहवें परचे में पीर पधारे; आपने कटोरे लाकर उनका काम पूरा किया। (लोक-परंपरा में प्रचलित कथा के अनुसार मक्का से आए पाँच पीरों ने कहा कि वे केवल अपने बर्तनों में खाते हैं, जो मक्का में रह गए थे; तब रामदेव जी ने वे कटोरे वहीं मँगा दिए।)
- चौपाई 20
चौदहवां परच्या जाभो पाया।
निजसर जल खारा करवाया॥
चौदहवाँ परचा जाभो ने पाया: निजसर (तालाब) का पानी खारा करवा दिया।
- चौपाई 21
परच्या पन्द्रह फिर बतलाया।
राम सरोवर प्रभु खुदवाया॥
पंद्रहवाँ परचा फिर यह बताया गया है कि प्रभु ने राम सरोवर खुदवाया।
- चौपाई 22
परच्या सोलह हरबू पाया।
दर्श पाय अतिशय हरषाया॥
सोलहवाँ परचा हरबू ने पाया, जो आपके दर्शन पाकर बहुत प्रसन्न हुआ।
- चौपाई 23
परच्या सत्रह हर जी पाया।
दूध थणा बकरया के आया॥
सत्रहवाँ परचा हरजी ने पाया: बकरे के थनों में दूध आ गया।
- चौपाई 24
सुखी नाडी पानी कीन्हों।
आत्म ज्ञान हरजी ने दीन्हों॥
आपने सूखी (‘सुखी’) तलैया में पानी भर दिया, और हरजी को आत्मज्ञान दिया।
- चौपाई 25
परच्या अठारहवां हाकिम पाया।
सूते को धरती लुढ़काया॥
अठारहवाँ परचा हाकिम (शासन के अधिकारी) ने पाया: सोते हुए उसे धरती पर लुढ़का दिया।
- चौपाई 26
परच्या उन्नीसवां दल जी पाया।
पुत्र पाय मन में हरषाया॥
उन्नीसवाँ परचा दलजी ने पाया, जो पुत्र पाकर मन में प्रसन्न हुआ।
- चौपाई 27
परच्या बीसवां पाया सेठाणी।
आये प्रभु सुन गदगद वाणी॥
बीसवाँ परचा सेठानी ने पाया: उसकी भरे गले की पुकार सुनकर प्रभु आए।
- चौपाई 28
तुरंत सेठ सरजीवण कीन्हा।
भक्त उजागर अभय वर दीन्हा॥
आपने तुरंत सेठ को फिर से जीवित कर दिया, भक्त का नाम उजागर किया और उसे अभय का वरदान दिया।
- चौपाई 29
परच्या इक्कीसवां चोर जो पाया।
हो अन्धा करनी फल पाया॥
इक्कीसवाँ परचा एक चोर ने पाया: वह अंधा होकर अपनी करनी का फल पा गया।
- चौपाई 30
परच्या बाईसवां मिर्जो चीहां।
सातो तवा बेध प्रभु दीन्हां॥
बाईसवाँ परचा मिर्ज़ों ने चाहा, तो प्रभु ने सातों तवे बेध दिए। (‘चीहां’ को यहाँ ‘चाहा’ के अर्थ में लिया गया है।)
- चौपाई 31
परच्या तेईसवां बादशाह पाया।
फेर भक्त को नहीं सताया॥
तेईसवाँ परचा बादशाह ने पाया, जिसके बाद उसने फिर किसी भक्त को नहीं सताया।
- चौपाई 32
परच्या चौबीसवां बख्शी पाया।
मुवा पुत्र पल में उठ धाया॥
चौबीसवाँ परचा बख्शी (एक अधिकारी) ने पाया: उसका मरा हुआ पुत्र पल भर में उठकर दौड़ पड़ा।
- चौपाई 33
जब-जब जिसने सुमरण कीन्हां।
तब-तब आ तुम दर्शन दीन्हां॥
जब-जब जिसने आपका स्मरण किया, तब-तब आपने आकर उसे दर्शन दिए।
- चौपाई 34
भक्त टेर सुन आतुर धाते।
चढ़ लीले पर जल्दी आते॥
भक्त की पुकार सुनकर आप आतुर होकर दौड़ते हैं और लीले (अपने घोड़े) पर चढ़कर जल्दी आते हैं।
- चौपाई 35
जो जन प्रभु की लीला गावें।
मनवांछित कारज फल पावें॥
चालीसा कहती है कि जो लोग प्रभु की लीला गाते हैं, वे मनचाहे काम और फल पाते हैं।
- चौपाई 36
यह चालीसा सुने सुनावे।
ताके कष्ट सकल कट जावे॥
चालीसा कहती है कि जो इसे सुनता और सुनाता है, उसके सब कष्ट कट जाते हैं।
- चौपाई 37
जय जय जय प्रभु लीला धारी।
तेरी महिमा अपरम्पारी॥
लीला करने वाले प्रभु, आपकी जय हो। आपकी महिमा अपरंपार है।
- चौपाई 38
मैं मूरख क्या गुण तब गाऊँ।
कहाँ बुद्धि शारद सी लाऊँ॥
मैं मूर्ख आपके क्या गुण गाऊँ? शारदा (सरस्वती) जैसी बुद्धि कहाँ से लाऊँ?
- चौपाई 39
नहीं बुद्धि बल घट लव लेशा।
मती अनुसार रची चालीसा॥
मेरे भीतर बुद्धि और बल का लेशमात्र भी नहीं है; अपनी मति के अनुसार मैंने यह चालीसा रची है।
- चौपाई 40
दास सभी शरण में तेरी।
रखियो प्रभु लज्जा मेरी॥
सभी दास आपकी शरण में हैं; हे प्रभु, मेरी लाज रखना।
यहाँ रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार की ‘51 चालीसा संग्रह’ (2004, पृ. 157 से 160) का पाठ दिया गया है, जिसे पन्नों की छवियाँ देखकर पढ़ा गया और द्रिक पंचांग, भक्ति भारत और कई वेबसाइटों के पाठ से शब्द-शब्द मिलाया गया। सभी स्रोतों में वही दोहे और चौपाइयाँ उसी क्रम में हैं। पुस्तक में दूसरे दोहे में ‘द्वार केश ने’ छपा है, जिसे यहाँ ‘द्वारकेश’ (द्वारका के स्वामी) लिखा गया है; अधिकतर वेबसाइटों पर ‘द्वार केश से’ है। मुख्य पाठभेद: चौपाई 28 में सभी वेबसाइटों पर ‘उक्त उजागर’ है, जबकि पुस्तक में ‘भक्त उजागर’, जो यहाँ लिया गया; कुछ वेबसाइटों पर चौपाई 3 में ‘संज जनों’, चौपाई 14 में ‘प्रगट टेर’, चौपाई 26 में ‘पुत्र पाया’, चौपाई 30 में ‘सातों तवा’ और चौपाई 38 में ‘क्या गुण तव गाऊँ’ (आपके गुण) है। चौपाई 8 का ‘ही साया’ और चौपाई 30 का ‘मिर्जो चीहां’ सभी स्रोतों में ऐसे ही है; इनका अर्थ प्रसंग से लिया गया है। पुस्तक में चालीसा के अंत में कोई समापन दोहा नहीं है। चौबीस परचों की कथाएँ लोक-परंपरा में प्रचलित हैं; चालीसा उन्हें संक्षेप में गिनाती है।