- दोहा 1
विश्वनाथ को सुमिर मन, धर गणेश का ध्यान।
भैरव चालीसा रचूं, कृपा करहु भगवान॥
मन में विश्वनाथ (शिव) का स्मरण करके और गणेश का ध्यान धरकर मैं भैरव चालीसा रचता हूँ। हे भगवान, कृपा कीजिए।
- दोहा 2
बटुकनाथ भैरव भजूं, श्री काली के लाल।
छीतरमल पर कर कृपा, काशी के कुतवाल॥
मैं श्री काली के लाल बटुकनाथ भैरव को भजता हूँ। हे काशी के कोतवाल, छीतरमल पर कृपा कीजिए। (‘छीतरमल’ कवि की छाप लगती है; दिल्ली के बटुक भैरव मंदिर की पुस्तिका में यहाँ ‘मुझ दास पर कृपा कर’ छपा है।)
- चौपाई 1
जय जय श्रीकाली के लाला।
रहो दास पर सदा दयाला॥
श्री काली के लाल, आपकी जय हो। इस दास पर सदा दया करते रहिए।
- चौपाई 2
भैरव भीषण भीम कपाली।
क्रोधवन्त लोचन में लाली॥
हे भैरव, आप भीषण, भीम (विशाल और भयंकर) और कपाली (खोपड़ी धारण करने वाले) हैं। क्रोध से भरी आपकी आँखों में लाली है।
- चौपाई 3
कर त्रिशूल है कठिन कराला।
गल में प्रभु मुण्डन की माला॥
आपके हाथ में कठोर और भयंकर त्रिशूल है, और हे प्रभु, आपके गले में मुंडों की माला है।
- चौपाई 4
कृष्ण रूप तन वर्ण विशाला।
पीकर मद रहता मतवाला॥
आपका शरीर विशाल और काले (कृष्ण) वर्ण का है। आप मद पीकर मस्त रहते हैं।
- चौपाई 5
रुद्र बटुक भक्तन के संगी।
प्रेत नाथ भूतेश भुजंगी॥
आप रुद्र हैं, बटुक (बालक रूप) हैं और भक्तों के साथी हैं। आप प्रेतों के नाथ, भूतों के ईश और सर्पों को धारण करने वाले हैं।
- चौपाई 6
त्रैल तेश है नाम तुम्हारा।
चक्र तुण्ड अमरेश पियारा॥
त्रैलतेश आपका नाम है; आप चक्रतुण्ड और प्यारे अमरेश भी कहलाते हैं। (इन नामों के अर्थ किसी स्रोत में नहीं दिए गए; मंदिर की पुस्तिका में ‘चक्रतुण्ड’ की जगह ‘चक्रदण्ड’ है।)
- चौपाई 7
शेखरचंद्र कपाल बिराजे।
स्वान सवारी पै प्रभु गाजे॥
आपके माथे पर चंद्रमा मुकुट की तरह शोभित है। कुत्ते की सवारी पर प्रभु गर्जना करते हैं।
- चौपाई 8
शिव नकुलेश चण्ड हो स्वामी।
बैजनाथ प्रभु नमो नमामी॥
हे स्वामी, आप शिव, नकुलेश और चण्ड हैं। हे बैजनाथ (वैद्यनाथ) प्रभु, आपको बार-बार नमस्कार है।
- चौपाई 9
अश्वनाथ क्रोधेश बखाने।
भैरों काल जगत ने जाने॥
आपको अश्वनाथ और क्रोधेश कहा गया है, और संसार आपको काल भैरव के रूप में जानता है।
- चौपाई 10
गायत्री कहैं निमिष दिगम्बर।
जगन्नाथ उन्नत आडम्बर॥
गायत्री आपको निमिष और दिगम्बर (दिशाएँ ही जिसके वस्त्र हैं) कहती है। आप जगन्नाथ हैं और आपका ठाट ऊँचा है।
- चौपाई 11
क्षेत्रपाल दसपाण कहाये।
मंजुल उमानन्द कहलाये॥
आप क्षेत्रपाल (स्थान के रक्षक) और दस हाथों वाले (दसपाण) कहलाते हैं। आप सुंदर (मंजुल) और उमा को आनंद देने वाले उमानन्द कहलाते हैं।
- चौपाई 12
चक्रनाथ भक्तन हितकारी।
कहैं त्र्यम्बक सब नर नारी॥
आप चक्रनाथ हैं और भक्तों का हित करने वाले हैं। सब स्त्री-पुरुष आपको त्र्यम्बक (तीन नेत्रों वाले) कहते हैं।
- चौपाई 13
संहारक सुनन्द तव नामा।
करहु भक्त के पूरण कामा॥
संहारक और सुनन्द आपके नाम हैं। अपने भक्त के सब काम पूरे कीजिए।
- चौपाई 14
नाथ पिशाचन के हो प्यारे।
संकट मेटहु सकल हमारे॥
हे पिशाचों के प्यारे नाथ, हमारे सब संकट मिटा दीजिए।
- चौपाई 15
कृत्यायू सुन्दर आनन्दा।
भक्त जनन के काटहु फन्दा॥
आप कृत्यायू, सुंदर और आनंद-रूप हैं। भक्तजनों के फंदे (बंधन) काट दीजिए। (‘कृत्यायू’ का अर्थ स्पष्ट नहीं है; मंदिर की पुस्तिका में ‘कत्यायू’ है।)
- चौपाई 16
कारण लम्ब आप भय भंजन।
नमोनाथ जय जनमन रंजन॥
आप ‘कारण लम्ब’ हैं और भय को तोड़ने वाले हैं। लोगों के मन को आनंद देने वाले नाथ, आपको नमस्कार और आपकी जय हो। (‘कारण लम्ब’ का अर्थ स्पष्ट नहीं है।)
- चौपाई 17
हो तुम देव त्रिलोचन नाथा।
भक्त चरण में नावत माथा॥
हे देव, आप तीन नेत्रों वाले नाथ हैं। भक्त आपके चरणों में माथा झुकाते हैं।
- चौपाई 18
त्वं अशतांग रुद्र के लाला।
महाकाल कालों के काला॥
आप अशतांग (असितांग, आठ भैरवों में से एक) हैं, रुद्र के लाल हैं। आप महाकाल हैं, कालों के भी काल। (मंदिर की पुस्तिका में ‘तुम अंसितांग’ छपा है।)
- चौपाई 19
ताप विमोचन अरि दल नासा।
भाल चन्द्रमा करहि प्रकाशा॥
आप दुखों के ताप से छुड़ाने वाले और शत्रुओं के दल का नाश करने वाले हैं। आपके माथे पर चंद्रमा प्रकाश करता है।
- चौपाई 20
श्वेत काल अरु लाल शरीरा।
मस्तक मुकुट शीश पर चीरा॥
आपके रूप श्वेत, काले और लाल शरीर वाले हैं। माथे पर मुकुट और सिर पर चीरा (पगड़ी) है।
- चौपाई 21
काली के लाला बलधारी।
कहाँ तक शोभा कहूँ तुम्हारी॥
हे काली के बलवान लाल, आपकी शोभा का वर्णन मैं कहाँ तक करूँ।
- चौपाई 22
शंकर के अवतार कृपाला।
रहो चकाचक पी मद प्याला॥
हे कृपालु, आप शंकर के अवतार हैं। मद का प्याला पीकर आप मस्त रहते हैं।
- चौपाई 23
काशी के कुतवाल कहाओ।
बटुक नाथ चेटक दिखलाओ॥
आप काशी के कोतवाल कहलाते हैं। हे बटुकनाथ, अपना चमत्कार (चेटक) दिखाइए।
- चौपाई 24
रवि के दिन जन भोग लगावें।
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावें॥
चालीसा के अनुसार रविवार के दिन लोग आपको भोग लगाते हैं और धूप, दीप और नैवेद्य चढ़ाते हैं।
- चौपाई 25
दरशन करके भक्त सिहावें।
दारुड़ा की धार पिलावें॥
आपके दर्शन करके भक्त प्रसन्न होते हैं और आपको दारू (मदिरा) की धार पिलाते हैं।
- चौपाई 26
मठ में सुन्दर लटकत झावा।
सिद्ध कार्य कर भैरों बाबा॥
आपके मठ में सुंदर झावा लटकता है। हे भैरों बाबा, हमारे काम सिद्ध कीजिए।
- चौपाई 27
नाथ आपका यश नहीं थोड़ा।
कर में सुभग सुशोभित कोड़ा॥
हे नाथ, आपका यश थोड़ा नहीं है। आपके हाथ में सुंदर कोड़ा शोभित है।
- चौपाई 28
कटि घूँघरा सुरीले बाजत।
कंचनमय सिंहासन राजत॥
आपकी कमर में घुँघरू सुरीले बजते हैं, और आप सोने के सिंहासन पर विराजते हैं।
- चौपाई 29
नर नारी सब तुमको ध्यावहिं।
मनवांछित इच्छाफल पावहिं॥
चालीसा कहती है कि सब स्त्री-पुरुष आपका ध्यान करते हैं और मनचाहा फल पाते हैं।
- चौपाई 30
भोपा हैं आपके पुजारी।
करें आरती सेवा भारी॥
भोपा आपके पुजारी हैं, जो आपकी आरती और बड़ी सेवा करते हैं। (राजस्थान की परंपरा में लोक-देवताओं के पुजारी-गायक भोपा कहलाते हैं।)
- चौपाई 31
भैरव भात आपका गाऊँ।
बार बार पद शीश नवाऊँ॥
हे भैरव, मैं आपके भात की कथा गाता हूँ और बार-बार आपके चरणों में सिर झुकाता हूँ। (भात, जिसे मायरा भी कहते हैं, विवाह के समय बहन के घर भाई की ओर से लाए जाने वाले उपहार हैं।)
- चौपाई 32
आपहि वारे छीजन धाये।
ऐलादी ने रूदन मचाये॥
पहली पंक्ति का अर्थ स्पष्ट नहीं है; प्रसंग से लगता है कि आप कहीं चले गए थे। तब ऐलादी रोने लगी।
- चौपाई 33
बहन त्यागि भाई कहाँ जावे।
तो बिन को मोहि भात पिन्हावे॥
(ऐलादी कहती है:) बहन को छोड़कर भाई कहाँ जाता है? तुम्हारे बिना मुझे भात कौन पहनाएगा?
- चौपाई 34
रोये बटुक नाथ करुणा कर।
गये हिवारे में तुम जाकर॥
करुणा से भरकर बटुकनाथ रो पड़े, और आप हिवारे में जा पहुँचे। (‘हिवारे’ किस स्थान को कहा गया है, यह स्पष्ट नहीं है; मंदिर की पुस्तिका में ‘गिरे हिवारे में’ है।)
- चौपाई 35
दुखित भई ऐलादी बाला।
तब हर का सिंहासन हाला॥
जब बाला ऐलादी दुखी हुई, तब हर (शिव) का सिंहासन डोल उठा।
- चौपाई 36
समय ब्याह का जिस दिन आया।
प्रभु ने तुमको तुरत पठाया॥
जिस दिन विवाह का समय आया, प्रभु ने आपको तुरंत भेजा।
- चौपाई 37
विष्णु कही मत विलम्ब लगाओ।
तीन दिवस को भैरव जाओ॥
विष्णु ने कहा, देर मत करो; हे भैरव, तीन दिन के लिए जाओ।
- चौपाई 38
दल पठान संग लेकर धाया।
ऐलादी को भात पिन्हाया॥
आप पठानों का दल साथ लेकर दौड़े आए और ऐलादी को भात पहनाया, यानी भात के उपहार दिए।
- चौपाई 39
पूरन आस बहन की कीनी।
सुर्ख चुन्दरी सिर धर दीनी॥
आपने बहन की आशा पूरी की और उसके सिर पर लाल चुनरी ओढ़ा दी।
- चौपाई 40
भात भरा लौटे गुण ग्रामी।
नमो नमामी अन्तर्यामी॥
भात भरकर गुणों के भंडार (भैरव) लौट आए। हे अंतर्यामी, आपको बार-बार नमस्कार है।
- समापन दोहा 1
जय जय जय भैरव बटुक, स्वामी संकट टार।
कृपा दास पर कीजिए, शंकर के अवतार॥
हे बटुक भैरव, आपकी जय हो। हे स्वामी, संकट टालिए। हे शंकर के अवतार, इस दास पर कृपा कीजिए।
- समापन दोहा 2
जो यह चालीसा पढ़े, प्रेम सहित सत बार।
उस घर सर्वानन्द हों, वैभव बढ़ें अपार॥
चालीसा कहती है कि जो इसे प्रेम से सौ बार पढ़ता है, उसके घर में हर तरह का आनंद होता है और अपार वैभव बढ़ता है।
यहाँ रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार की ‘51 चालीसा संग्रह’ (2004, पृ. 69 से 72) का पाठ दिया गया है, जिसे पन्नों की छवियाँ देखकर पढ़ा गया और श्री बटुक भैरव मंदिर, नेहरू पार्क, नई दिल्ली की पुस्तिका ‘श्री भैरव चालीसा’ तथा द्रिक पंचांग के पाठ से मिलाया गया। पुस्तक में दूसरे दोहे में ‘भजं’ और चौपाई 34 में ‘मैं’ छपा है, जो छपाई की भूलें हैं; यहाँ ‘भजूं’ और ‘में’ लिखा गया है। मंदिर की पुस्तिका का पाठ कई जगह अलग है: पहले दोहे में ‘भैरव चालीसा पढ़ूं’; दूसरे दोहे में ‘मुझ दास पर कृपा कर’ (कवि का नाम नहीं); चौपाई 6 में ‘चक्रदण्ड’; चौपाई 11 में ‘दशपाणि’; चौपाई 15 में ‘कत्यायू’; चौपाई 17 में ‘हो तुम मेष त्रिलोचन नाथा’; चौपाई 18 में ‘तुम अंसितांग’; चौपाई 19 में ‘ताप मोचन’; चौपाई 22 में ‘रहहुं चकाचक’; चौपाई 25 में ‘पियावें’; चौपाई 28 में ‘कंचन के सिंहासन’; चौपाई 34 में ‘रोये बटुकनाथ करुणाकर, गिरे हिवारे में तुम जाकर’; चौपाई 39 में ‘सुख चंदूरी सिर धरि दीन्हीं’। मंदिर की पुस्तिका में चालीसवीं चौपाई के बाद एक और चौपाई है: ‘मैं हूं प्रभु बस तुम्हारा चेरा, करुं आपकी शरण बसेरा’। त्रैलतेश, चक्रतुण्ड, कृत्यायू और कारण लम्ब जैसे कई नाम किसी स्रोत में समझाए नहीं गए हैं, इसलिए अर्थ में उन्हें नाम के रूप में ही रखा गया है। ऐलादी और भात की कथा हमें किसी पुराण में नहीं मिली; यह लोक-परंपरा की कथा लगती है।