चालीसाशिव

नर्मदा चालीसा

रचना: परंपरागत

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 7 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंदिर में संध्या आरती: पुजारी के हाथ में पाँच बत्ती वाला पीतल का दीपक, पीछे सजी प्रतिमाएँ और हाथ जोड़े भक्त
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. दोहा 1

    देवि पूजिता नर्मदा, महिमा बड़ी अपार। चालीसा वर्णन करत, कवि अरु भक्त उदार॥

    देवी के रूप में पूजी जाने वाली नर्मदा की महिमा बहुत बड़ी और अपार है। उदार कवि और भक्त इस चालीसा में उसी का वर्णन करते हैं।

  2. दोहा 2

    इनकी सेवा से सदा, मिटते पाप महान। तट पर कर जप दान नर, पाते हैं नित ज्ञान॥

    चालीसा कहती है कि इनकी सेवा से बड़े-बड़े पाप मिट जाते हैं, और जो लोग इनके तट पर जप और दान करते हैं, वे सदा ज्ञान पाते हैं।

  3. चौपाई 1

    जय-जय-जय नर्मदा भवानी। तुम्हरी महिमा सब जग जानी॥

    हे नर्मदा भवानी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आपकी महिमा सारा संसार जानता है।

  4. चौपाई 2

    अमरकण्ठ से निकलीं माता। सर्व सिद्धि नव निधि की दाता॥

    माँ नर्मदा अमरकंटक से निकली हैं। वे सब सिद्धियाँ और नौ निधियाँ देने वाली हैं। (नर्मदा का उद्गम मध्य प्रदेश का अमरकंटक है।)

  5. चौपाई 3

    कन्या रूप सकल गुण खानी। जब प्रकटीं नर्मदा भवानी॥

    जब नर्मदा भवानी प्रकट हुईं, तब वे कन्या के रूप में थीं और सब गुणों की खान थीं।

  6. चौपाई 4

    सप्तमी सूर्य मकर रविवारा। अश्वनि माघ मास अवतारा॥

    चालीसा के अनुसार उनका अवतरण माघ मास की सप्तमी को हुआ, जब सूर्य मकर राशि में था, दिन रविवार था और अश्विनी नक्षत्र था। (नर्मदा जयंती माघ शुक्ल सप्तमी को मनाई जाती है।)

  7. चौपाई 5

    वाहन मकर आपको साजैं। कमल पुष्प पर आप विराजैं॥

    मकर आपका वाहन है, और आप कमल के फूल पर विराजती हैं।

  8. चौपाई 6

    ब्रह्मा हरि हर तुमको ध्यावैं। तब ही मनवांछित फल पावैं॥

    ब्रह्मा, विष्णु (हरि) और शिव (हर) आपका ध्यान करते हैं, और तभी मनचाहा फल पाते हैं।

  9. चौपाई 7

    दर्शन करत पाप कटि जाते। कोटि भक्त गण नित्य नहाते॥

    आपके दर्शन से पाप कट जाते हैं। करोड़ों भक्त प्रतिदिन आपमें स्नान करते हैं।

  10. चौपाई 8

    जो नर तुमको नित ही ध्यावै। वह नर रुद्र लोक को जावै॥

    चालीसा कहती है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन आपका ध्यान करता है, वह रुद्रलोक (शिव के लोक) को जाता है।

  11. चौपाई 9

    मगरमच्छ तुम में सुख पावैं। अन्तिम समय परमपद पावैं॥

    आपके जल में रहने वाले मगरमच्छ भी सुख पाते हैं, और चालीसा के अनुसार अंत समय में वे भी परमपद पाते हैं।

  12. चौपाई 10

    मस्तक मुकुट सदा ही साजैं। पांव पैंजनी नित ही राजैं॥

    आपके मस्तक पर सदा मुकुट शोभा देता है और पाँवों में पैंजनी (पायल) सुशोभित रहती है।

  13. चौपाई 11

    कल-कल ध्वनि करती हो माता। पाप ताप हरती हो माता॥

    हे माता, आप कल-कल की ध्वनि करती हुई बहती हैं और पाप और ताप (दुःख) हर लेती हैं।

  14. चौपाई 12

    पूरब से पश्चिम की ओरा। बहती माता नाचत मोरा॥

    माँ नर्मदा पूरब से पश्चिम की ओर बहती हैं, और (तट पर) मोर नाचते हैं। (नर्मदा पश्चिम की ओर बहकर खंभात की खाड़ी में मिलती है।)

  15. चौपाई 13

    शौनक ऋषि तुम्हरौ गुण गावैं। सूत आदि तुम्हरौ यश गावैं॥

    शौनक ऋषि आपके गुण गाते हैं, और सूत जी आदि आपका यश गाते हैं।

  16. चौपाई 14

    शिव गणेश भी तेरे गुण गावैं। सकल देव गण तुमको ध्यावैं॥

    शिव और गणेश भी आपके गुण गाते हैं, और सारे देवता आपका ध्यान करते हैं।

  17. चौपाई 15

    कोटि तीर्थ नर्मदा किनारे। ये सब कहलाते दुःख हारे॥

    नर्मदा के किनारे करोड़ों तीर्थ हैं, और वे सब दुःख हरने वाले कहलाते हैं।

  18. चौपाई 16

    मनोकामना पूरण करती। सर्व दुःख माँ नित ही हरती॥

    माँ नर्मदा मन की कामनाएँ पूरी करती हैं और सदा सब दुःख हरती हैं।

  19. चौपाई 17

    कनखल में गंगा की महिमा। कुरुक्षेत्र में सरस्वति महिमा॥

    कनखल में गंगा की महिमा है और कुरुक्षेत्र में सरस्वती की।

  20. चौपाई 18

    पर नर्मदा ग्राम जंगल में। नित रहती माता मंगल में॥

    पर माँ नर्मदा गाँव हो या जंगल, हर जगह सदा मंगलमयी रहती हैं। (यही भाव मत्स्य पुराण के नर्मदा-माहात्म्य के श्लोक ‘पुण्या कनखले गङ्गा कुरुक्षेत्रे सरस्वती। ग्रामे वा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा॥’ में है।)

  21. चौपाई 19

    एक बार करके असनाना। तरत पीढ़ी है नर नाना॥

    चालीसा कहती है कि आपमें एक बार स्नान करने से मनुष्य की अनेक पीढ़ियाँ तर जाती हैं।

  22. चौपाई 20

    मेकल कन्या तुम ही रेवा। तुम्हीं भजन करें नित देवा॥

    आप ही मेकल पर्वत की कन्या (मेकलकन्या) हैं और आप ही रेवा हैं। देवता सदा आपका ही भजन करते हैं।

  23. चौपाई 21

    जटा शंकरी नाम तुम्हारा। तुमने कोटि जनों को तारा॥

    आपका एक नाम जटाशंकरी है, जिसमें शंकर (शिव) का नाम जुड़ा है। आपने करोड़ों लोगों का उद्धार किया है।

  24. चौपाई 22

    समोद्भवा नर्मदा तुम हो। पाप मोचनी रेवा तुम हो॥

    आप समोद्भवा नर्मदा हैं और पापों से छुड़ाने वाली रेवा हैं। (अमरकोश में नर्मदा का एक नाम ‘सोमोद्भवा’ है; ‘समोद्भवा’ उसी नाम का रूप लगता है।)

  25. चौपाई 23

    तुम महिमा कहि नहिं जाई। करत न बनती मातु बड़ाई॥

    आपकी महिमा कही नहीं जा सकती। हे माँ, आपकी बड़ाई करते नहीं बनती।

  26. चौपाई 24

    जल प्रताप तुममें अति माता। जो रमणीय तथा सुख दाता॥

    हे माता, आपके जल का प्रताप बहुत बड़ा है; वह सुंदर है और सुख देने वाला है।

  27. चौपाई 25

    चाल सर्पिणी सम है तुम्हारी। महिमा अति अपार है तुम्हारी॥

    आपकी चाल सर्पिणी जैसी (घुमावदार) है, और आपकी महिमा बहुत अपार है।

  28. चौपाई 26

    तुम में पड़ी अस्थि भी भारी। छुवत पाषाण होत वर वारी॥

    चालीसा कहती है कि आपमें पड़ी भारी अस्थियाँ भी आपके श्रेष्ठ जल (वर वारि) को छूकर पत्थर बन जाती हैं। (पंक्ति का यही अर्थ लगता है।)

  29. चौपाई 27

    यमुना में जो मनुज नहाता। सात दिनों में वह फल पाता॥

    जो मनुष्य यमुना में स्नान करता है, वह सात दिनों में (पवित्र होने का) फल पाता है।

  30. चौपाई 28

    सरसुति तीन दिनों में देती। गंगा तुरत बाद ही देती॥

    सरस्वती यह फल तीन दिनों में देती हैं, और गंगा स्नान के तुरंत बाद।

  31. चौपाई 29

    पर रेवा का दर्शन करके। मानव फल पाता मन भर के॥

    पर रेवा (नर्मदा) के तो दर्शन मात्र से मनुष्य भरपूर फल पाता है। (मत्स्य पुराण के नर्मदा-माहात्म्य में यही बात है: सरस्वती का जल तीन दिन में, यमुना का सात दिन में और गंगा का तुरंत पवित्र करता है, पर नर्मदा का जल दर्शन से ही।)

  32. चौपाई 30

    तुम्हरी महिमा है अति भारी। जिसको गाते हैं नर-नारी॥

    आपकी महिमा बहुत बड़ी है, जिसे स्त्री-पुरुष सब गाते हैं।

  33. चौपाई 31

    जो नर तुम में नित्य नहाता। रुद्र लोक में पूजा जाता॥

    चालीसा कहती है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन आपमें स्नान करता है, वह रुद्रलोक में सम्मान पाता है।

  34. चौपाई 32

    जड़ी बूटियां तट पर राजें। मोहक दृश्य सदा ही साजें॥

    आपके तट पर जड़ी-बूटियाँ उगती हैं, और वहाँ सदा मनमोहक दृश्य रहते हैं।

  35. चौपाई 33

    वायु सुगन्धित चलती तीरा। जो हरती नर तन की पीरा॥

    आपके किनारे सुगंधित हवा चलती है, जो मनुष्य के शरीर की पीड़ा हर लेती है।

  36. चौपाई 34

    घाट-घाट की महिमा भारी। कवि भी गा नहिं सकते सारी॥

    आपके हर घाट की महिमा बड़ी है; कवि भी उसे पूरा नहीं गा सकते।

  37. चौपाई 35

    नहिं जानूँ मैं तुम्हरी पूजा। और सहारा नहीं मम दूजा॥

    मैं आपकी पूजा की विधि नहीं जानता, पर आपके सिवा मेरा कोई दूसरा सहारा नहीं है।

  38. चौपाई 36

    हो प्रसन्न ऊपर मम माता। तुम ही मातु मोक्ष की दाता॥

    हे माता, मुझ पर प्रसन्न होइए। हे माँ, मोक्ष देने वाली आप ही हैं।

  39. चौपाई 37

    जो मानव यह नित है पढ़ता। उसका मान सदा ही बढ़ता॥

    चालीसा कहती है कि जो मनुष्य इसे प्रतिदिन पढ़ता है, उसका मान सदा बढ़ता है।

  40. चौपाई 38

    जो शत बार इसे है गाता। वह विद्या धन दौलत पाता॥

    यह भी कहा गया है कि जो इसे सौ बार गाता है, वह विद्या और धन-दौलत पाता है।

  41. चौपाई 39

    अगणित बार पढ़े जो कोई। पूरण मनोकामना होई॥

    और जो इसे अनगिनत बार पढ़ता है, उसकी मनोकामना पूरी होती है।

  42. चौपाई 40

    सबके उर में बसत नर्मदा। यहाँ वहाँ सर्वत्र नर्मदा॥

    नर्मदा सबके हृदय में बसती हैं; यहाँ, वहाँ, सब जगह नर्मदा ही हैं।

  43. समापन दोहा

    भक्ति भाव उर आनि के, जो करता है जाप। माता जी की कृपा से, दूर होत सन्ताप॥

    चालीसा कहती है कि जो मन में भक्ति-भाव लाकर इसका जाप करता है, माता जी की कृपा से उसका संताप (दुःख) दूर हो जाता है।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/narmada-chalisa/

संक्षेप में

नर्मदा चालीसा नर्मदा नदी को देवी मानकर की गई स्तुति है, जो ‘जय-जय-जय नर्मदा भवानी’ से शुरू होती है। इसमें आरंभ के दो दोहे, चालीस चौपाइयाँ और अंत में एक दोहा है। इसमें अमरकंटक से नर्मदा के निकलने, रेवा और मेकलकन्या जैसे नामों और तट के तीर्थों की महिमा है। परंपरा में नर्मदा जयंती (माघ शुक्ल सप्तमी) पर और नर्मदा तट पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है।

यहाँ रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार की पुस्तक ‘51 चालीसा संग्रह’ (2004) का पाठ लिया गया है, और उसे इसी प्रकाशन के एक दूसरे मुद्रण और कई वेबसाइटों से मिलाया गया है। सभी स्रोतों में पद और उनका क्रम एक ही है। मुख्य पाठभेद: पहले दोहे में कई वेबसाइटों पर ‘देवि पूजित, नर्मदा’ है; चौपाई 4 में कुछ जगह ‘सुर्य’ छपा है; चौपाई 19 में ‘एक बार कर के स्नाना, तरत पिढ़ी है नर नाना’ भी मिलता है; चौपाई 20 में छपी पुस्तक ‘तुम्हीं भजन’ पढ़ती है, जबकि वेबसाइटों पर ‘तुम्हरी भजन’ है; चौपाई 21 में कहीं ‘जनों को है तारा’ है; चौपाई 23 में कहीं ‘तुम्हरी महिमा कहि नहीं जाई’ है; चौपाई 17 और 28 में ‘सरस्वति’ और ‘सरसुति’ की जगह कई स्रोत ‘सरस्वती’ लिखते हैं; चौपाई 24 में एक स्रोत में ‘जल प्रताप’ की जगह ‘जलप्रपात’ है। रचयिता का नाम किसी स्रोत में नहीं मिलता।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नर्मदा चालीसा में कितनी चौपाइयाँ हैं?

इसमें आरंभ के दो दोहे, 40 चौपाइयाँ और अंत में एक दोहा है। छपी पुस्तक और वेबसाइटों में पदों की संख्या और क्रम एक ही है।

नर्मदा चालीसा का पाठ कब किया जाता है?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में नर्मदा जयंती पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है, जो माघ शुक्ल सप्तमी को मनाई जाती है; चालीसा की चौथी चौपाई भी माघ की सप्तमी को ही नर्मदा का अवतरण बताती है। नर्मदा के उद्गम अमरकंटक में यह पर्व बड़े उत्साह से मनाया जाता है।

चालीसा में गंगा, यमुना और सरस्वती से नर्मदा की तुलना क्यों है?

चौपाई 17 से 29 मत्स्य पुराण के नर्मदा-माहात्म्य के दो श्लोकों का भाव कहती हैं: गंगा कनखल में और सरस्वती कुरुक्षेत्र में पुण्य देती हैं, पर नर्मदा गाँव हो या वन, हर जगह; और सरस्वती का जल तीन दिन में, यमुना का सात दिन में, गंगा का तुरंत, पर नर्मदा का जल दर्शन मात्र से पवित्र करता है।

चालीसा में नर्मदा के कौन-कौन से नाम आते हैं?

रेवा, मेकल कन्या (मेकलकन्या), जटाशंकरी, समोद्भवा और पापमोचनी। अमरकोश में ‘रेवा’, ‘सोमोद्भवा’ और ‘मेकलकन्यका’ नर्मदा के नाम हैं।

नर्मदा चालीसा किसने लिखी?

रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है। पहला दोहा बस इतना कहता है कि उदार कवि और भक्त इसमें नर्मदा की महिमा का वर्णन करते हैं; छपी पुस्तक और वेबसाइटों में किसी का नाम नहीं दिया गया है।

स्रोत

  1. परंपरागत पाठ
  2. रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार: ‘51 चालीसा संग्रह’, आरतियों सहित (2004)
  3. रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार: आरती-चालीसा संग्रह का एक दूसरा मुद्रण
  4. भक्ति भारत, हिंदी पथ, प्रभु भक्ति और आरती ज्ञान (वेबसाइटें)
  5. मत्स्य पुराण, नर्मदा-माहात्म्य (आनंदाश्रम संस्कृत ग्रंथावली, ग्रंथांक 54)
  6. नर्मदा के नाम: अमरकोश (भारतकोश के ‘रेवा नदी’ लेख में उद्धृत)
  7. नर्मदा जयंती की तिथि: द्रिक पंचांग

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