मंत्रशिव

महामृत्युंजय मंत्र

रचना: ऋषि वसिष्ठ (ऋग्वेद 7.59)

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 2 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंदिर में संध्या आरती: पुजारी के हाथ में पाँच बत्ती वाला पीतल का दीपक, पीछे सजी प्रतिमाएँ और हाथ जोड़े भक्त
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. मंत्र

    ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

    शब्दार्थ: त्र्यम्बकम् = तीन नेत्रों वाले (शिव) को; यजामहे = हम पूजते हैं; सुगन्धिम् = सुगंध से भरे; पुष्टिवर्धनम् = पोषण और पुष्टि बढ़ाने वाले; उर्वारुकम् इव = ककड़ी जैसे फल (उर्वारुक) की तरह; बन्धनात् = (बेल के) बंधन से; मृत्योः = मृत्यु से; मुक्षीय = मैं छूट जाऊँ; मा अमृतात् = अमृत से नहीं। भावार्थ: हम सुगंध से भरे और पुष्टि बढ़ाने वाले त्र्यम्बक (शिव) का पूजन करते हैं। जैसे ककड़ी अपनी बेल के बंधन से छूट जाती है, वैसे ही मैं मृत्यु के बंधन से छूट जाऊँ, पर अमृत (अमरता) से मेरा नाता न छूटे।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/mahamrityunjaya-mantra/

संक्षेप में

महामृत्युंजय मंत्र ऋग्वेद के सातवें मंडल का मंत्र (7.59.12) है, जिसके ऋषि वसिष्ठ हैं और जिसमें त्र्यम्बक, यानी तीन नेत्रों वाले रुद्र (शिव) की उपासना है। यही मंत्र शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयि संहिता (3.60) में भी है। परंपरा में इसका जप शिव पूजा में, सोमवार और सावन में, और बीमारी या संकट के समय स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्रार्थना के रूप में होता है।

पाठ के बारे में: ऋग्वेद में मंत्र “त्र्यम्बकं” से आरंभ होता है; आरंभ का ‘ॐ’ परंपरा से जोड़ा जाता है। ऋग्वेद के इस सूक्त (7.59) के पहले ग्यारह मंत्र मरुतों के लिए हैं और यह बारहवाँ मंत्र रुद्र के लिए है। वाजसनेयि संहिता (3.60) में ‘माऽमृतात्’ (अवग्रह के साथ) छपा है; शब्द वही हैं। वहाँ इसके बाद एक और मंत्र है, जिसमें ‘पुष्टिवर्धनम्’ के स्थान पर ‘पतिवेदनम्’ (पति दिलाने वाले) शब्द है; वह अलग मंत्र है। ‘महामृत्युंजय’ नाम वेद में नहीं, परंपरा में है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महामृत्युंजय मंत्र कहाँ से है?

ऋग्वेद 7.59.12 से। इसके ऋषि वसिष्ठ और देवता रुद्र (त्र्यम्बक) हैं। शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयि संहिता (3.60) में भी यह मंत्र आता है।

“मामृतात्” का क्या अर्थ है?

यह ‘मा अमृतात्’ है, यानी ‘अमृत से नहीं’। प्रार्थना है कि मृत्यु के बंधन से छुटकारा मिले, पर अमृत (अमरता) से नहीं।

त्र्यम्बक का क्या अर्थ है?

परंपरा में इसका अर्थ है ‘तीन नेत्रों वाले’, यानी शिव। वेद में त्र्यम्बक रुद्र का नाम है।

इसका जप कब किया जाता है?

परंपरा में शिव पूजा में, सोमवार और सावन में, और बीमारी या संकट के समय किसी के स्वास्थ्य के लिए। बहुत से लोग रुद्राक्ष की माला पर 108 बार जप करते हैं; यह संख्या परंपरा की है। किसी विशेष अनुष्ठान के लिए अपने पुरोहित से पूछना अच्छा है।

स्रोत

  1. ऋग्वेद 7.59.12 (शाकल संहिता): संस्कृत विकिस्रोत, वैदिक हेरिटेज पोर्टल और GRETIL का पदपाठ
  2. शुक्ल यजुर्वेद, वाजसनेयि माध्यन्दिन संहिता 3.60 (संस्कृत विकिस्रोत)

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पाठ का मिलान: sa.wikisource.org, vedicheritage.gov.in, gretil.sub.uni-goettingen.de, sa.wikisource.org