- दोहा 1
श्री गुरु चरण सरोज छवि, निज मन मन्दिर धारि।
सुमरि गजानन शारदा, गहि आशिष त्रिपुरारि॥
श्री गुरु के चरण-कमलों की छवि को अपने मन-मंदिर में धारण करके, गजानन (गणेश) और शारदा (सरस्वती) का स्मरण करके और त्रिपुरारि (शिव) का आशीर्वाद लेकर (मैं यह चालीसा आरंभ करता हूँ)।
- दोहा 2
बुद्धिहीन जन जानिये, अवगुणों का भण्डार।
बरणौं परशुराम सुयश, निज मति के अनुसार॥
मुझे बुद्धिहीन और अवगुणों का भंडार जानिए। फिर भी मैं अपनी बुद्धि के अनुसार परशुराम के सुंदर यश का वर्णन करता हूँ।
- चौपाई 1
जय प्रभु परशुराम सुख सागर।
जय मुनीश गुण ज्ञान दिवाकर॥
सुख के सागर प्रभु परशुराम की जय हो। मुनियों के ईश्वर, गुण और ज्ञान के सूर्य, आपकी जय हो।
- चौपाई 2
भृगुकुल मुकुट बिकट रणधीरा।
क्षत्रिय तेज मुख संत शरीरा॥
आप भृगु कुल के मुकुट हैं, प्रचंड हैं और युद्ध में धीर हैं। आपके मुख पर क्षत्रिय का तेज है और शरीर संत का।
- चौपाई 3
जमदग्नी सुत रेणुका जाया।
तेज प्रताप सकल जग छाया॥
आप जमदग्नि के पुत्र हैं और रेणुका से जन्मे हैं। आपका तेज और प्रताप सारे जगत में छाया है।
- चौपाई 4
मास बैसाख सित पच्छ उदारा।
तृतीया पुनर्वसु मनुहारा॥
चालीसा के अनुसार आपका जन्म वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में, सुंदर तृतीया तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में हुआ।
- चौपाई 5
प्रहर प्रथम निशा शीत न घामा।
तिथि प्रदोष व्यापि सुखधामा॥
रात का पहला प्रहर था, न ठंड थी न धूप। तृतीया तिथि प्रदोष काल (संध्या) में थी; वह सुख देने वाला समय था।
- चौपाई 6
तब ऋषि कुटीर रुदन शिशु कीन्हा।
रेणुका कोखि जनम हरि लीन्हा॥
तब ऋषि की कुटिया में शिशु ने रुदन किया; रेणुका की कोख से हरि (विष्णु) ने जन्म लिया।
- चौपाई 7
निज घर उच्च ग्रह छः ठाढ़े।
मिथुन राशि राहु सुख गाढ़े॥
चालीसा कहती है कि (जन्म के समय) छह ग्रह अपने घर में उच्च के थे, और मिथुन राशि में राहु शुभ स्थिति में था।
- चौपाई 8
तेज-ज्ञान मिल नर तनु धारा।
जमदग्नी घर ब्रह्म अवतारा॥
तेज और ज्ञान ने मिलकर मनुष्य का शरीर धारण किया; जमदग्नि के घर में ब्रह्म (परमात्मा) का अवतार हुआ।
- चौपाई 9
धरा राम शिशु पावन नामा।
नाम जपत जग लह विश्रामा॥
शिशु का पवित्र नाम ‘राम’ रखा गया, जिस नाम को जपकर संसार विश्राम (शांति) पाता है।
- चौपाई 10
भाल त्रिपुण्ड जटा सिर सुन्दर।
कांधे मुंज जनेउ मनहर॥
माथे पर त्रिपुंड, सिर पर सुंदर जटा, और कंधे पर मूँज का मनोहर जनेऊ है।
- चौपाई 11
मंजु मेखला कटि मृगछाला।
रूद्र माला बर वक्ष बिशाला॥
कमर में सुंदर मेखला (करधनी) और मृगछाला है; चौड़ी छाती पर सुंदर रुद्राक्ष की माला है।
- चौपाई 12
पीत बसन सुन्दर तनु सोहें।
कंध तुणीर धनुष मन मोहें॥
सुंदर शरीर पर पीले वस्त्र शोभित हैं; कंधे पर तरकश और धनुष मन मोह लेते हैं।
- चौपाई 13
वेद-पुराण-श्रुति-स्मृति ज्ञाता।
क्रोध रूप तुम जग विख्याता॥
आप वेद, पुराण, श्रुति और स्मृति के ज्ञाता हैं, और अपने क्रोध-रूप के लिए जगत में प्रसिद्ध हैं।
- चौपाई 14
दायें हाथ श्रीपरशु उठावा।
बेद-संहिता बायें सुहावा॥
दाएँ हाथ में आपने श्री परशु (फरसा) उठाया है, और बाएँ हाथ में वेद-संहिता शोभित है।
- चौपाई 15
विद्यावान गुण ज्ञान अपारा।
शास्त्र-शस्त्र दोउ पर अधिकारा॥
आप विद्वान हैं, आपके गुण और ज्ञान अपार हैं; शास्त्र और शस्त्र, दोनों पर आपका अधिकार है।
- चौपाई 16
भुवन चारिदस अरू नवखंडा।
चहुं दिशि सुयश प्रताप प्रचंडा॥
चौदह भुवनों और नौ खंडों में, चारों दिशाओं में आपका यश और प्रचंड प्रताप फैला है।
- चौपाई 17
एक बार गणपति के संगा।
जूझे भृगुकुल कमल पतंगा॥
एक बार भृगु कुल रूपी कमल के सूर्य (परशुराम) गणपति से जूझ पड़े।
- चौपाई 18
दांत तोड़ रण कीन्ह विरामा।
एक दंत गणपति भयो नामा॥
उनका दाँत तोड़कर उन्होंने युद्ध रोका; तभी से गणपति का नाम ‘एकदंत’ हुआ। (यह परंपरा में प्रचलित कथा है।)
- चौपाई 19
कार्तवीर्य अर्जुन भूपाला।
सहस्त्रबाहु दुर्जन विकराला॥
राजा कार्तवीर्य अर्जुन, जिसे हजार भुजाओं वाला (सहस्रबाहु) कहते हैं, दुष्ट और भयंकर था।
- चौपाई 20
सुरगऊ लखि जमदग्नी पांहीं।
रखिहहुं निज घर ठानि मन मांहीं॥
जमदग्नि के पास देवताओं की गाय (सुरगऊ) देखकर उसने मन में ठान लिया कि उसे अपने घर रखेगा।
- चौपाई 21
मिली न मांगि तब कीन्ह लड़ाई।
भयो पराजित जगत हंसाई॥
माँगने पर गाय नहीं मिली तो उसने लड़ाई की, पर वह हार गया और जगत में उसकी हँसी हुई।
- चौपाई 22
तन खल हृदय भई रिस गाढ़ी।
रिपुता मुनि सौं अतिसय बाढ़ी॥
तब उस दुष्ट के हृदय में गहरा क्रोध भर गया और मुनि से उसकी शत्रुता बहुत बढ़ गई।
- चौपाई 23
ऋषिवर रहे ध्यान लवलीना।
तिन्ह पर शक्तिघात नृप कीन्हा॥
श्रेष्ठ ऋषि (जमदग्नि) ध्यान में लीन थे, तब राजा ने उन पर शक्ति (भाले जैसे अस्त्र) से वार किया।
- चौपाई 24
लगत शक्ति जमदग्नी निपाता।
मनहुं क्षत्रिकुल बाम विधाता॥
शक्ति लगते ही जमदग्नि गिर पड़े। मानो विधाता क्षत्रिय कुल के विरुद्ध हो गया।
- चौपाई 25
पितु-बध मातु-रूदन सुनि भारा।
भा अति क्रोध मन शोक अपारा॥
पिता का वध और माता का भारी विलाप सुनकर (परशुराम को) अत्यंत क्रोध और अपार शोक हुआ।
- चौपाई 26
कर गहि तीक्षण परशु कराला।
दुष्ट हनन कीन्हेउ तत्काला॥
तीखा और भयंकर फरसा हाथ में लेकर उन्होंने तुरंत उस दुष्ट का वध कर दिया।
- चौपाई 27
क्षत्रिय रुधिर पितु तर्पण कीन्हा।
पितु-बध प्रतिशोध सुत लीन्हा॥
क्षत्रियों के रक्त से उन्होंने पिता का तर्पण किया; पुत्र ने पिता के वध का बदला लिया।
- चौपाई 28
इक्कीस बार भू क्षत्रिय बिहीनी।
छीन धरा बिप्रन्ह कहँ दीनी॥
इक्कीस बार उन्होंने पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित किया, और धरती छीनकर ब्राह्मणों को दे दी।
- चौपाई 29
जुग त्रेता कर चरित सुहाई।
शिव-धनु भंग कीन्ह रघुराई॥
त्रेता युग की सुंदर कथा है: रघुराई (श्रीराम) ने शिव का धनुष तोड़ा।
- चौपाई 30
गुरु धनु भंजक रिपु करि जाना।
तब समूल नाश ताहि ठाना॥
गुरु (शिव) के धनुष को तोड़ने वाले को शत्रु मानकर परशुराम ने उसका जड़ से नाश करने की ठानी।
- चौपाई 31
कर जोरि तब राम रघुराई।
बिनय कीन्ही पुनि शक्ति दिखाई॥
तब रघुकुल के राजा राम ने हाथ जोड़कर विनय की, और फिर अपनी शक्ति दिखाई।
- चौपाई 32
भीष्म द्रोण कर्ण बलवन्ता।
भये शिष्या द्वापर महँ अनन्ता॥
द्वापर युग में भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे बलवान और अनगिनत लोग आपके शिष्य हुए।
- चौपाई 33
शस्त्र विद्या देह सुयश कमावा।
गुरु प्रताप दिगन्त फिरावा॥
आपसे शस्त्र-विद्या पाकर उन्होंने सुयश कमाया, और गुरु का प्रताप दिशाओं के छोर तक फैलाया।
- चौपाई 34
चारों युग तव महिमा गाई।
सुर मुनि मनुज दनुज समुदाई॥
चारों युगों में देवता, मुनि, मनुष्य और दानव, सबके समुदाय ने आपकी महिमा गाई।
- चौपाई 35
दे कश्यप सों संपदा भाई।
तप कीन्हा महेन्द्र गिरि जाई॥
कश्यप को (पृथ्वी की) संपदा देकर आपने महेंद्र पर्वत पर जाकर तप किया।
- चौपाई 36
अब लौं लीन समाधि नाथा।
सकल लोक नावइ नित माथा॥
हे नाथ, आप अब तक समाधि में लीन हैं, और सारा संसार नित्य आपको सिर झुकाता है।
- चौपाई 37
चारों वर्ण एक सम जाना।
समदर्शी प्रभु तुम भगवाना॥
आप चारों वर्णों को एक समान मानते हैं; हे प्रभु भगवान, आप सबको समान दृष्टि से देखते हैं।
- चौपाई 38
ललहिं चारि फल शरण तुम्हारी।
देव दनुज नर भूप भिखारी॥
देवता, दानव, मनुष्य, राजा और भिखारी, सब आपकी शरण में चारों फल (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) पाने को ललचाते हैं। (कुछ पाठों में ‘लहहिं’ है, यानी पाते हैं।)
- चौपाई 39
जो यह पढ़ै श्री परशु चालीसा।
तिन्ह अनुकूल सदा गौरीसा॥
चालीसा कहती है कि जो यह श्री परशुराम चालीसा पढ़ता है, गौरीश (शिव) उस पर सदा अनुकूल रहते हैं।
- चौपाई 40
पूर्णेन्दु निसि बासर स्वामी।
बसहु हृदय प्रभु अन्तरयामी॥
हे स्वामी, हे अंतर्यामी प्रभु, पूर्णेन्दु के हृदय में रात-दिन बसिए। (‘पूर्णेन्दु’ कवि की छाप लगती है; उसी पुस्तक में छपी परशुराम जी की आरती भी ‘पूर्णेन्दु’ नाम से समाप्त होती है।)
- समापन दोहा
परशुराम को चारू चरित, मेटत सकल अज्ञान।
शरण पड़े को देत प्रभु, सदा सुयश सम्मान॥
परशुराम का सुंदर चरित्र सारा अज्ञान मिटा देता है। चालीसा कहती है कि जो उनकी शरण में आता है, प्रभु उसे सदा यश और सम्मान देते हैं।
- श्लोक
भृगुदेव कुलं भानुं, सहसबाहुर्मर्दनम्।
रेणुका नयना नंदं, परशुंवन्दे विप्रधनम्॥
भृगु कुल के सूर्य, सहस्रबाहु का मर्दन करने वाले, रेणुका के नेत्रों को आनंद देने वाले और ब्राह्मणों के धन परशुधारी (परशुराम) की मैं वंदना करता हूँ।
यहाँ रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार की ‘51 चालीसा संग्रह’ (2004, पृ. 146 से 150) का पाठ दिया गया है, जिसे पन्नों की छवियाँ देखकर पढ़ा गया और कई वेबसाइटों के पाठ से शब्द-शब्द मिलाया गया। सभी स्रोतों में वही चौपाइयाँ उसी क्रम में हैं। मुख्य पाठभेद: चौपाई 38 में पुस्तक और अधिकतर वेबसाइटें ‘ललहिं’ पढ़ती हैं, एक पाठ-परंपरा में ‘लहहिं’ (पाते हैं) है; उसी परंपरा में चौपाई 20 में ‘रहिहहुं’ और चौपाई 32 में ‘शिष्य’ है। कुछ पाठों में चौपाई 17 में ‘गणपतिजी’, चौपाई 33 में ‘शास्त्र विद्या’ और चौपाई 35 में ‘देसी कश्यप’ छपा है, जो भूलें लगती हैं; कुछ वेबसाइटों पर समापन दोहा और श्लोक नहीं हैं। श्लोक पुस्तक की वर्तनी में दिया गया है (‘सहसबाहुर्मर्दनम्’, ‘नयना नंदं’, ‘परशुंवन्दे’); कुछ पाठों में ‘सहस्रबाहुर्मर्दनम्’ और ‘नयनानंदं’ है। अंतिम चौपाई में ‘पूर्णेन्दु’ नाम आता है, जो कवि की छाप लगती है; कवि के बारे में कोई और जानकारी नहीं मिलती।