श्रीभगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥ ११ ॥
aśocyānanvaśocastvaṃ prajñāvādāṃśca bhāṣase
gatāsūnagatāsūṃśca nānuśocanti paṇḍitāḥ
ashochyaananvashochastvam pragyaavaadaanshcha bhaashase
gataasoonagataasoonshcha naanushochanti panditaah
aśocyānanvaśocastvaṃ prajñāvādāṃśca bhāṣase
gatāsūnagatāsūṃśca nānuśocanti paṇḍitāḥ
पद-अर्थ
अनुवाद
श्रीभगवान बोले: तू उनके लिए शोक करता है जिनके लिए शोक नहीं करना चाहिए, और फिर भी ज्ञानियों जैसी बातें करता है। ज्ञानी न मरे हुओं के लिए शोक करते हैं, न जीवितों के लिए।
The Blessed Lord said: You grieve for those who should not be grieved for, and yet you speak words of wisdom. The wise grieve neither for the dead nor for the living.
भावार्थ
यहाँ से गीता का वास्तविक उपदेश शुरू होता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि अर्जुन की बातें विद्वानों जैसी हैं, पर उनका शोक अज्ञान से उपजा है। आगे के श्लोक (2.12–2.30) समझाते हैं कि आत्मा अमर है, इसलिए मृत्यु के लिए शोक करना ठीक नहीं।
यह श्लोक किससे जुड़ा है
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गीता का उपदेश किस श्लोक से शुरू होता है?
परंपरा में अध्याय 2 के श्लोक 11, "अशोच्यानन्वशोचस्त्वं...", को उपदेश का आरंभ माना जाता है; आदि शंकराचार्य का भाष्य भी यहीं से गीता-शास्त्र का आरंभ मानता है।
स्रोत
- मूल पाठ: भगवद्गीता (महाभारत, भीष्म पर्व)
- हिंदी व अंग्रेज़ी अनुवाद, भावार्थ: SanatanBodh संपादकीय टीम
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