देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ १३ ॥
dehino'sminyathā dehe kaumāraṃ yauvanaṃ jarā
tathā dehāntaraprāptirdhīrastatra na muhyati
dehinosminyathaa dehe kaumaaram yauvanam jaraa
tathaa dehaantarapraaptirdheerastatra na muhyati
dehino'sminyathā dehe kaumāraṃ yauvanaṃ jarā
tathā dehāntaraprāptirdhīrastatra na muhyati
पद-अर्थ
अनुवाद
जैसे इस शरीर में जीवात्मा को बचपन, जवानी और बुढ़ापा मिलते हैं, वैसे ही उसे दूसरा शरीर मिलता है। धीर पुरुष इस बात से मोहित नहीं होता।
Just as the embodied self passes through childhood, youth and old age in this body, so too it passes into another body; the wise are not deluded by this.
भावार्थ
एक सरल उदाहरण: बचपन का शरीर जवानी में और जवानी का शरीर बुढ़ापे में बदल जाता है, फिर भी "मैं" वही रहता है। मृत्यु के बाद नया शरीर मिलना भी इसी बदलाव जैसा है। जो इसे समझता है, वह मृत्यु से घबराता नहीं।
यह श्लोक किससे जुड़ा है
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गीता में पुनर्जन्म की बात कहाँ है?
अध्याय 2 के श्लोक 13 और 22 में: जैसे शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापा आते हैं, वैसे ही आत्मा को नया शरीर मिलता है; और जैसे मनुष्य पुराने कपड़े छोड़कर नए पहनता है।
स्रोत
- मूल पाठ: भगवद्गीता (महाभारत, भीष्म पर्व)
- हिंदी व अंग्रेज़ी अनुवाद, भावार्थ: SanatanBodh संपादकीय टीम
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