कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥ ४३ ॥
kāmātmānaḥ svargaparā janmakarmaphalapradām
kriyāviśeṣabahulāṃ bhogaiśvaryagatiṃ prati
kaamaatmaanah svargaparaa janmakarmaphalapradaam
kriyaavisheshabahulaam bhogaishvaryagatim prati
kāmātmānaḥ svargaparā janmakarmaphalapradām
kriyāviśeṣabahulāṃ bhogaiśvaryagatiṃ prati
पद-अर्थ
अनुवाद
कामनाओं से भरे और स्वर्ग को ही परम लक्ष्य मानने वाले वे लोग भोग और ऐश्वर्य पाने के लिए ऐसी वाणी कहते हैं, जो अनेक कर्मकांडों से भरी है और पुनर्जन्म तथा कर्मफल ही देती है।
Full of desires, with heaven as their highest goal, they speak words full of elaborate rites aimed at pleasure and power, which lead only to rebirth as the fruit of action.
भावार्थ
ऐसे कर्मकांड का फल स्वर्ग या सुख तो हो सकता है, पर वह अस्थायी है और फिर से जन्म के चक्र में ले आता है। गीता का लक्ष्य इससे ऊँचा है: बंधन से मुक्ति।
यह श्लोक किससे जुड़ा है
स्रोत
- मूल पाठ: भगवद्गीता (महाभारत, भीष्म पर्व)
- हिंदी व अंग्रेज़ी अनुवाद, भावार्थ: SanatanBodh संपादकीय टीम
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