योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ ४८ ॥
yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā dhanañjaya
siddhyasiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṃ yoga ucyate
yogasthah kuru karmaani sangam tyaktvaa dhananjaya
siddhyasiddhyoh samo bhootvaa samatvam yoga uchyate
yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā dhanañjaya
siddhyasiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṃ yoga ucyate
पद-अर्थ
अनुवाद
हे धनंजय, आसक्ति छोड़कर और सफलता-असफलता में समान रहकर, योग में स्थित होकर कर्म कर। यह समता ही योग कहलाती है।
Established in yoga, perform your actions, Dhananjaya, abandoning attachment and remaining the same in success and failure. This evenness of mind is called yoga.
भावार्थ
गीता में योग की पहली परिभाषा: "समत्वं योग उच्यते", यानी समता ही योग है। 2.47 ने बताया कि फल पर अधिकार नहीं; यह श्लोक बताता है कि कर्म किस मनःस्थिति में करें: परिणाम चाहे जो हो, मन का संतुलन न डगमगाए।
यह श्लोक किससे जुड़ा है
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गीता के अनुसार योग क्या है?
भगवद्गीता 2.48 में योग की परिभाषा है: "समत्वं योग उच्यते", सफलता और असफलता में समान रहना ही योग है। 2.50 में इसे "कर्मों में कुशलता" भी कहा गया है।
"समत्वं योग उच्यते" किस श्लोक में है?
भगवद्गीता अध्याय 2, श्लोक 48 में।
स्रोत
- मूल पाठ: भगवद्गीता (महाभारत, भीष्म पर्व)
- हिंदी व अंग्रेज़ी अनुवाद, भावार्थ: SanatanBodh संपादकीय टीम
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