भगवद्गीता 2.40

अध्याय 2 · सांख्य योगवक्ता: श्रीकृष्णश्रोता: अर्जुन
समीक्षक: Aditi Tripathiअंतिम समीक्षा: 2 स्रोतगलती बताएँ

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ ४० ॥

nehābhikramanāśo'sti pratyavāyo na vidyate
svalpamapyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt

पद-अर्थ

न इहइसमें नहीं
अभिक्रमनाशः अस्तिआरंभ का नाश होता है
प्रत्यवायः न विद्यतेउलटा फल (दोष) नहीं होता
स्वल्पम् अपिथोड़ा सा भी
अस्य धर्मस्यइस धर्म का (पालन)
त्रायतेरक्षा करता है
महतः भयात्बड़े भय से

अनुवाद

हिंदी

इस मार्ग में किया गया आरंभ कभी नष्ट नहीं होता और इसमें उलटा फल भी नहीं होता। इस धर्म का थोड़ा सा पालन भी बड़े भय से रक्षा करता है।

ENGLISH

On this path no effort is ever lost and no harm is done. Even a little of this practice protects one from great fear.

भावार्थ

कर्मयोग का आश्वासन: इसमें की गई थोड़ी सी भी कोशिश व्यर्थ नहीं जाती और अधूरी छूट जाने पर भी नुकसान नहीं करती। साधक को पूर्णता की प्रतीक्षा किए बिना आज से शुरुआत करने का साहस मिलता है।

यह श्लोक किससे जुड़ा है

स्रोत

  1. मूल पाठ: भगवद्गीता (महाभारत, भीष्म पर्व)
  2. हिंदी व अंग्रेज़ी अनुवाद, भावार्थ: SanatanBodh संपादकीय टीम

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