भगवद्गीता 2.64

अध्याय 2 · सांख्य योगवक्ता: श्रीकृष्णश्रोता: अर्जुन
समीक्षक: Aditi Tripathiअंतिम समीक्षा: 2 स्रोतगलती बताएँ

रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ ६४ ॥

rāgadveṣavimuktaistu viṣayānindriyaiścaran
ātmavaśyairvidheyātmā prasādamadhigacchati

पद-अर्थ

रागद्वेषविमुक्तैः तुराग और द्वेष से मुक्त
विषयान्विषयों में
इन्द्रियैः चरन्इंद्रियों से विचरते हुए
आत्मवश्यैःअपने वश में की हुई (इंद्रियों से)
विधेयात्माजिसका मन वश में है
प्रसादम्प्रसन्नता (मन की निर्मलता) को
अधिगच्छतिप्राप्त होता है

अनुवाद

हिंदी

पर जिसका मन वश में है, वह राग-द्वेष से मुक्त और अपने वश में की हुई इंद्रियों से विषयों का व्यवहार करते हुए भी मन की प्रसन्नता (निर्मलता) को प्राप्त होता है।

ENGLISH

But the self-controlled person, moving among sense objects with senses free from attachment and aversion and under his own control, attains serenity.

भावार्थ

गीता संसार छोड़ने को नहीं कहती। स्थितप्रज्ञ भी देखता, सुनता, खाता और काम करता है; अंतर यह है कि उसकी इंद्रियाँ राग-द्वेष से नहीं, उसके विवेक से चलती हैं। इसका फल है "प्रसाद", यानी मन की शांत, निर्मल अवस्था।

यह श्लोक किससे जुड़ा है

स्रोत

  1. मूल पाठ: भगवद्गीता (महाभारत, भीष्म पर्व)
  2. हिंदी व अंग्रेज़ी अनुवाद, भावार्थ: SanatanBodh संपादकीय टीम

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