कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७ ॥
karmaṇy evādhikāras te mā phaleṣu kadācana
mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo ’stv akarmaṇi
karmanye vaadhikaaraste maa phaleshu kadaachana
maa karmaphalaheturbhoor maa te sangostvakarmani
karmaṇy evādhikāras te mā phaleṣu kadācana
mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo ’stv akarmaṇi
पद-अर्थ
अनुवाद
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। तुम कर्मफल को अपना उद्देश्य मत बनाओ, और कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।
Your right is to action alone, never to its fruits. Do not make the fruit of action your motive, and do not be attached to inaction either.
भावार्थ
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मनुष्य के हाथ में केवल उसका कर्म है; परिणाम अनेक कारणों पर निर्भर करता है। इसलिए कर्म पूरी निष्ठा से करो, पर फल की चिंता को मन पर हावी न होने दो। साथ ही, फल की चिंता से डरकर कर्म छोड़ देना भी ठीक नहीं। यही निष्काम कर्म का सूत्र है, जिसे आगे गीता में कर्मयोग कहा गया है।
यह श्लोक किससे जुड़ा है
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कर्मण्येवाधिकारस्ते किस अध्याय का श्लोक है?
यह भगवद्गीता के दूसरे अध्याय (सांख्य योग) का 47वाँ श्लोक है।
क्या इसका अर्थ है कि फल की इच्छा ही न करें?
श्लोक फल को कर्म का उद्देश्य बनाने से मना करता है, और कर्म छोड़ने से भी। ध्यान कर्म की गुणवत्ता पर रहे, परिणाम पर नहीं।
यह श्लोक किसने, किससे कहा?
श्रीकृष्ण ने, कुरुक्षेत्र में अर्जुन से।
स्रोत
- मूल पाठ: भगवद्गीता (महाभारत, भीष्म पर्व)
- हिंदी व अंग्रेज़ी अनुवाद, भावार्थ: SanatanBodh संपादकीय टीम
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