भगवद्गीता 2.19

अध्याय 2 · सांख्य योगवक्ता: श्रीकृष्णश्रोता: अर्जुन
समीक्षक: Aditi Tripathiअंतिम समीक्षा: 2 स्रोतगलती बताएँ

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥

ya enaṃ vetti hantāraṃ yaścainaṃ manyate hatam
ubhau tau na vijānīto nāyaṃ hanti na hanyate

पद-अर्थ

यः एनम् वेत्ति हन्तारम्जो इसे मारने वाला समझता है
यः च एनम् मन्यते हतम्और जो इसे मरा हुआ मानता है
उभौ तौ न विजानीतःवे दोनों नहीं जानते
न अयम् हन्तियह नहीं मारता
न हन्यतेन मारा जाता है

अनुवाद

हिंदी

जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसे मरा हुआ मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते। यह न मारता है, न मारा जाता है।

ENGLISH

One who thinks this self a slayer, and one who thinks it slain, both fail to understand: it neither slays nor is slain.

भावार्थ

मारना और मरना शरीर के स्तर पर होते हैं, आत्मा के स्तर पर नहीं। यह बात लगभग इन्हीं शब्दों में कठोपनिषद् में भी आती है, जो दिखाता है कि गीता उपनिषदों के ज्ञान को आगे बढ़ाती है।

यह श्लोक किससे जुड़ा है

हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥
मारने वाला सोचे कि वह मारता है, और मरा हुआ सोचे कि वह मारा गया, तो दोनों नहीं जानते; यह न मारता है, न मारा जाता है।कठोपनिषद् 1.2.19

स्रोत

  1. मूल पाठ: भगवद्गीता (महाभारत, भीष्म पर्व)
  2. हिंदी व अंग्रेज़ी अनुवाद, भावार्थ: SanatanBodh संपादकीय टीम

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