भगवद्गीता 2.25

अध्याय 2 · सांख्य योगवक्ता: श्रीकृष्णश्रोता: अर्जुन
समीक्षक: Aditi Tripathiअंतिम समीक्षा: 2 स्रोतगलती बताएँ

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ २५ ॥

avyakto'yamacintyo'yamavikāryo'yamucyate
tasmādevaṃ viditvainaṃ nānuśocitumarhasi

पद-अर्थ

अव्यक्तः अयम्यह अव्यक्त (इंद्रियों से न दिखने वाला) है
अचिन्त्यः अयम्यह मन से न सोचा जा सकने वाला है
अविकार्यः अयम्यह विकार रहित है
उच्यतेकहा जाता है
तस्मात्इसलिए
एवम् विदित्वा एनम्इसे ऐसा जानकर
न अनुशोचितुम् अर्हसितुझे शोक नहीं करना चाहिए

अनुवाद

हिंदी

यह आत्मा अव्यक्त, अचिंत्य और विकार रहित कहा जाता है। इसलिए इसे ऐसा जानकर तुझे शोक नहीं करना चाहिए।

ENGLISH

This self is said to be unmanifest, beyond thought and unchanging. Knowing it to be so, you should not grieve.

भावार्थ

आत्मा को इंद्रियाँ देख नहीं सकतीं (अव्यक्त), मन उसकी कल्पना नहीं कर सकता (अचिंत्य) और उसमें कोई बदलाव नहीं होता (अविकार्य)। 2.11 से चला आ रहा तर्क यहाँ एक निष्कर्ष पर पहुँचता है: ऐसे आत्मा के लिए शोक का कोई कारण नहीं।

यह श्लोक किससे जुड़ा है

स्रोत

  1. मूल पाठ: भगवद्गीता (महाभारत, भीष्म पर्व)
  2. हिंदी व अंग्रेज़ी अनुवाद, भावार्थ: SanatanBodh संपादकीय टीम

कुछ गलत लगा? गलती बताएँ