भगवद्गीता 2.38

अध्याय 2 · सांख्य योगवक्ता: श्रीकृष्णश्रोता: अर्जुन
समीक्षक: Aditi Tripathiअंतिम समीक्षा: 2 स्रोतगलती बताएँ

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥ ३८ ॥

sukhaduḥkhe same kṛtvā lābhālābhau jayājayau
tato yuddhāya yujyasva naivaṃ pāpamavāpsyasi

पद-अर्थ

सुखदुःखेसुख और दुख को
समे कृत्वासमान मानकर
लाभालाभौलाभ और हानि को
जयाजयौजय और पराजय को
ततःफिर
युद्धाय युज्यस्वयुद्ध के लिए तैयार हो
न एवम् पापम् अवाप्स्यसिइस प्रकार तुझे पाप नहीं लगेगा

अनुवाद

हिंदी

सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान मानकर फिर युद्ध के लिए तैयार हो। इस प्रकार तुझे पाप नहीं लगेगा।

ENGLISH

Treating alike pleasure and pain, gain and loss, victory and defeat, prepare for battle. Thus you will incur no sin.

भावार्थ

यह श्लोक सांख्य और योग के बीच का पुल है। पाप कर्म से नहीं, बल्कि राग-द्वेष और स्वार्थ से भरी भावना से लगता है। जो परिणाम के प्रति सम रहकर कर्तव्य करता है, उसका कर्म उसे बाँधता नहीं। यही विचार आगे समत्व-योग (2.48) बनता है।

यह श्लोक किससे जुड़ा है

सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥
सफलता और असफलता में समान रहना ही योग कहलाता है।भगवद्गीता 2.48

स्रोत

  1. मूल पाठ: भगवद्गीता (महाभारत, भीष्म पर्व)
  2. हिंदी व अंग्रेज़ी अनुवाद, भावार्थ: SanatanBodh संपादकीय टीम

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