भगवद्गीता 2.71

अध्याय 2 · सांख्य योगवक्ता: श्रीकृष्णश्रोता: अर्जुन
समीक्षक: Aditi Tripathiअंतिम समीक्षा: 2 स्रोतगलती बताएँ

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥ ७१ ॥

vihāya kāmānyaḥ sarvānpumāṃścarati niḥspṛhaḥ
nirmamo nirahaṅkāraḥ sa śāntimadhigacchati

पद-अर्थ

विहायत्याग कर
कामान् यः सर्वान्जो सब कामनाओं को
पुमान् चरतिमनुष्य विचरता है
निःस्पृहःलालसा रहित होकर
निर्ममःममता रहित
निरहङ्कारःअहंकार रहित
सः शान्तिम् अधिगच्छतिवह शांति को प्राप्त होता है

अनुवाद

हिंदी

जो मनुष्य सब कामनाओं को त्यागकर, लालसा, ममता और अहंकार से रहित होकर विचरता है, वह शांति को प्राप्त होता है।

ENGLISH

One who gives up all desires and moves about free from longing, without the sense of "mine" and without ego, attains peace.

भावार्थ

शांति के तीन बाधक बताए गए हैं: स्पृहा (लालसा), ममता ("यह मेरा है") और अहंकार ("मैं करने वाला हूँ")। इनके छूटते ही व्यक्ति संसार में रहते हुए भी शांत रहता है।

यह श्लोक किससे जुड़ा है

स्रोत

  1. मूल पाठ: भगवद्गीता (महाभारत, भीष्म पर्व)
  2. हिंदी व अंग्रेज़ी अनुवाद, भावार्थ: SanatanBodh संपादकीय टीम

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