अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥ ५४ ॥
sthitaprajñasya kā bhāṣā samādhisthasya keśava
sthitadhīḥ kiṃ prabhāṣeta kimāsīta vrajeta kim
sthitapragyasya kaa bhaashaa samaadhisthasya keshava
sthitadheeh kim prabhaasheta kimaaseeta vrajeta kim
sthitaprajñasya kā bhāṣā samādhisthasya keśava
sthitadhīḥ kiṃ prabhāṣeta kimāsīta vrajeta kim
पद-अर्थ
अनुवाद
अर्जुन बोले: हे केशव, समाधि में स्थित स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति के क्या लक्षण हैं? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
Arjuna said: What are the marks of one whose wisdom is steady, who is established in contemplation, Keshava? How does such a person speak, how sit, how walk?
भावार्थ
यहाँ से अध्याय का अंतिम और बहुत प्रसिद्ध भाग शुरू होता है: स्थितप्रज्ञ के लक्षण (2.55–2.72)। अर्जुन का प्रश्न व्यावहारिक है: ज्ञानी व्यक्ति दैनिक जीवन में कैसा दिखता है? महात्मा गांधी ने इन श्लोकों को प्रतिदिन की प्रार्थना में रखा था।
यह श्लोक किससे जुड़ा है
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
स्थितप्रज्ञ के लक्षण गीता में कहाँ बताए गए हैं?
भगवद्गीता अध्याय 2 के श्लोक 54 से 72 तक। श्लोक 54 में अर्जुन प्रश्न पूछते हैं और 55 से 72 तक श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं।
स्रोत
- मूल पाठ: भगवद्गीता (महाभारत, भीष्म पर्व)
- हिंदी व अंग्रेज़ी अनुवाद, भावार्थ: SanatanBodh संपादकीय टीम
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